Saturday, December 27, 2025

ममता की कोई भाषा नहीं होती, कामधेनु का त्याग

प्रस्तावना
अक्सर हम कहते हैं कि इंसान सबसे बुद्धिमान प्राणी है, लेकिन जब बात भावनाओं की करुणा और निस्वार्थ प्रेम की आती है, तो बेजुबान जानवर हमें बहुत पीछे छोड़ देते हैं। यह कहानी 'सुंदरपुर' नामक एक छोटे से गाँव की है, जहाँ की हवाओं में मिट्टी की सौंधी खुशबू और रिश्तों की गर्माहट हुआ करती थी। उसी गाँव में एक गाय रहती थी, जिसका नाम था—कामधेनु। लेकिन गाँव वाले उसे प्यार से 'कामो' बुलाते थे।

रामदीन का परिवार
रामदीन काका, एक 60 वर्षीय बुजुर्ग किसान थे, जिनका अपना कोई परिवार नहीं था। उनकी पत्नी का देहांत बरसों पहले हो चुका था और बच्चे शहर जाकर बस गए थे। ऐसे में, रामदीन काका के अकेलेपन की साथी केवल कामो थी। कामो कोई साधारण गाय नहीं थी। उसका रंग बादलों जैसा सफेद था, और माथे पर एक छोटा सा काला टीका, जो उसे नजर लगने से बचाने जैसा प्रतीत होता था। लेकिन उसकी असली सुंदरता उसकी आँखों में थी—बड़ी, काली और इतनी गहरी आँखें, मानो उनमें पूरी दुनिया का दर्द और प्यार समाया हो।

रामदीन काका उसे अपनी बेटी की तरह रखते थे। सुबह उठते ही सबसे पहले कामो के लिए ताज़ा चारा तैयार करना, उसे नहलाना और घंटों उससे बातें करना उनकी दिनचर्या थी। कामो भी उनकी हर बात समझती थी। जब काका खुश होते, तो वह अपनी पूंछ हिलाती और जब वे उदास होते, तो वह अपना सिर उनके कंधे पर रख देती। पूरे गाँव में रामदीन और कामो का रिश्ता एक मिसाल था।

अभिमानी पड़ोसी और नई चुनौती
रामदीन काका के घर के ठीक सामने जगत सेठ का बड़ा पक्का मकान था। जगत सेठ गाँव के सबसे अमीर व्यक्ति थे, लेकिन स्वभाव से उतने ही कठोर और व्यापाारी। उनके पास भी कई गाय-भैंसें थीं, लेकिन उनके लिए वे जानवर नहीं, बल्कि मुनाफे की मशीनें थीं। जो गाय दूध देना बंद कर देती, जगत उसे तुरंत कसाई को बेच देते या बेसहारा छोड़ देते।
एक बार जगत सेठ शहर से एक बहुत ही महंगी नस्ल की जर्सी गाय खरीदकर लाए। उन्होंने उसका नाम 'लक्ष्मी' रखा, क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि वह बहुत दूध देगी और उनकी तिजोरी भरेगी। लक्ष्मी के स्वभाव में एक अजीब सी बेचैनी थी, शायद इसलिए कि उसे कभी प्यार नहीं मिला था। कुछ महीनों बाद, लक्ष्मी ने एक बछड़े को जन्म दिया। लेकिन दुर्भाग्यवश, प्रसव के दौरान संक्रमण फैलने से दो दिन बाद ही लक्ष्मी की मृत्यु हो गई।

अनाथ बछड़े का दर्द
लक्ष्मी के जाने के बाद उसका दो दिन का बछड़ा भूख से बिलखने लगा। जगत सेठ परेशान हो गए। उन्होंने बछड़े को बोतल से दूध पिलाने की कोशिश की, दूसरे जानवरों का दूध पिलाना चाहा, लेकिन बछड़ा न तो बोतल मुँह में लेता और न ही किसी और चीज को स्वीकार करता। वह अपनी माँ की गंध खोज रहा था और भूख से तड़प रहा था।
दो दिन बीत गए। बछड़े की हालत खराब होने लगी। वह अब रंभा भी नहीं पा रहा था, बस जमीन पर पड़ा हाफ रहा था। जगत सेठ ने झुंझलाकर अपने नौकर से कहा, "इसे बाड़े के पीछे डाल आओ, अब यह नहीं बचेगा। मैं इस पर और पैसा बर्बाद नहीं कर सकता।"
रामदीन काका ने अपनी चारपाई से यह सब देखा और सुना। उनका दिल पसीज गया। वे जानते थे कि जगत सेठ उनकी बात नहीं सुनेंगे, फिर भी वे हिम्मत करके उनके पास गए।

"सेठ जी," रामदीन ने हाथ जोड़कर कहा, "अगर आप बुरा न मानें, तो क्या मैं उस बछड़े को अपनी कामो के पास ले जाऊं? शायद वह उसे अपना ले।"
जगत सेठ ने हिकारत से देखा और हँसे, "रामदीन, तुम सठिया गए हो क्या? तुम्हारी कामो ने छह महीने पहले बछड़ा दिया था, उसका दूध अब सूखने को है। और दूसरी बात, जानवर अपनी औलाद के अलावा किसी और को दूध नहीं पिलाते। ले जाओ, वैसे भी वह मरने वाला है।"

कामो की परीक्षा
रामदीन काका ने उस मरणासन्न बछड़े को अपनी गोद में उठाया। वह रुई के फाहों जैसा हल्का हो चुका था। वे उसे अपने घर लाए और कामो के सामने लिटा दिया।
कामो उस समय अपनी नाद में चारा खा रही थी। उसने अजनबी गंध महसूस की और पीछे हटी। रामदीन काका का दिल धक-धक करने लगा। आमतौर पर गायें किसी दूसरे के बछड़े को पास नहीं आने देतीं, कई बार तो वे उसे लात भी मार देती हैं।

रामदीन ने कामो की गर्दन सहलाई और आँखों में आँसू भरकर बोले, "कामो बेटी... देख, यह अनाथ है। इसकी माँ नहीं रही। इसे तेरी ममता की जरूरत है। अगर तूने इसे नहीं अपनाया, तो यह आज रात नहीं देख पाएगा। मेरी लाज रख ले बेटी।"
कामो ने पहले बछड़े को सूंघा। फिर उसने रामदीन काका की ओर देखा। उस पल, उस मूक प्राणी की आँखों में जो भाव थे, उसे शब्दों में पिरोना असंभव था। कामो ने एक गहरी सांस ली और धीरे से अपनी खुरदरी जीभ से उस अनाथ बछड़े को चाटना शुरू किया। यह स्वीकारोक्ति का संकेत था।

जैसे ही कामो ने उसे चाटा, बछड़े में मानो जान आ गई। वह लड़खड़ाते हुए खड़ा हुआ और कामो के थनों को टटोलने लगा। विज्ञान के नियमों के विपरीत, उस दिन कामो के थनों में ममता का ऐसा ज्वार आया कि दूध की धारा फूट पड़ी। बछड़ा गट-गट करके दूध पीने लगा और कामो अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से उसे निहारती रही, जैसे वह उसका अपना ही अंश हो।

 परिवर्तन की लहर
यह दृश्य जिसने भी देखा, वह दंग रह गया। जगत सेठ, जो अपनी बालकनी से यह तमाशा देख रहे थे कि कब कामो बछड़े को लात मारेगी, अब पत्थर की मूरत बने खड़े थे। उन्होंने देखा कि एक जानवर, जिसे वे सिर्फ मुनाफा समझते थे, उसके भीतर कितनी करुणा थी। एक 'बेजुबान' ने उस बच्चे को अपनाया जिसे 'बुद्धिमान' इंसान ने मरने के लिए छोड़ दिया था।
अगले दिन सुबह, जगत सेठ रामदीन काका के घर आए। उनकी नज़रें झुकी हुई थीं। वे कामो के पास गए, जिसने बछड़े को अपने पैरों के बीच सुरक्षित बैठा रखा था। जगत सेठ ने पहली बार किसी जानवर को मुनाफे की नज़र से नहीं, बल्कि सम्मान की नज़र से देखा।
उन्होंने कामो के माथे पर हाथ फेरा और फिर रामदीन काका के पैर पकड़ लिए। "काका, मैं बहुत अमीर हूँ, लेकिन दिल से बहुत गरीब निकला। आज आपकी इस गाय ने मुझे इंसानियत का पाठ पढ़ा दिया। ममता की कोई भाषा नहीं होती, न ही कोई व्यापार होता है।"

उस दिन के बाद से सुंदरपुर में बहुत कुछ बदल गया। जगत सेठ ने अपने तबेले में जानवरों के साथ क्रूरता बंद कर दी। वह बछड़ा, जिसे कामो ने जीवनदान दिया, 'भोला' के नाम से बड़ा हुआ और पूरे गाँव का लाडला बना।

दोस्तों, कामधेनु की यह कहानी हमें सिखाती है कि दयालुता किसी विशेष प्रजाति की जागीर नहीं है। कभी-कभी हमें जानवरों से वह सीखना पड़ता है जो हम अपनी भागदौड़ भरी जिंदगी में भूल चुके हैं—निस्वार्थ प्रेम और अपनापन।

अगर एक गाय किसी दूसरे के बच्चे के लिए माँ बन सकती है, तो हम इंसान होकर एक-दूसरे के दुख-दर्द क्यों नहीं बांट सकते? अगली बार जब आप किसी जानवर को देखें, तो याद रखिएगा, उनके पास भले ही शब्द न हों, लेकिन उनके पास एक ऐसा दिल है जो कई बार हमारे दिलों से बड़ा होता है।

क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है जब किसी जानवर ने आपको दयालुता का पाठ पढ़ाया हो? अपने अनुभव कमेंट्स में जरूर साझा करें।

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