Tuesday, December 9, 2025

कांच के टुकड़े और हीरे का मोल मजबूरी का फायदा

वो सर्दी के दिन दिसंबर की वह रात शहर के लिए साल की सबसे सर्द रातों में से एक थी। इतना घना कोहरा था कि सड़क की पीली लाइटें भी धुंधली पड़ चुकी थीं। ठंड हड्डियों को गलाने वाली थी, ऐसी ठंड जो अमीरों के लिए खूबसूरत मौसम' होता है और गरीबों के लिए 'यमराज का संदेश'।
शहर के सबसे पॉश इलाके, सिविल लाइन्स के एक कोने में, 65 वर्षीय दीनानाथ जी अपनी पुरानी साइकिल के कैरियर पर एक छोटा सा संदूक बांधे खड़े थे। वह संदूक उनकी पूरी दुनिया था। उसमें न तो सोने के सिक्के थे और न ही ज़ेवर, बल्कि उसमें थी उनकी जीवन भर की कला—मिट्टी और लकड़ी से बने हस्तनिर्मित खिलौने।
दीनानाथ जी का शरीर कांप रहा था, लेकिन वह कम्पन ठंड से ज्यादा डर का था। उनकी पत्नी, सावित्री, सरकारी अस्पताल के जनरल वार्ड में वेंटिलेटर पर थी। डॉक्टर ने साफ कह दिया था, "बाबा, अगर सुबह तक ३,००० रुपये का इंजेक्शन नहीं आया, तो हम कुछ नहीं कह सकते।

३,००० रुपये! दीनानाथ जी के लिए यह रकम किसी पहाड़ से कम नहीं थी। दिन भर की बिक्री के बाद उनकी जेब में सिर्फ ४०० रुपये थे। अब रात के १० बज चुके थे। बाज़ार बंद हो रहे थे, और उनकी उम्मीदें भी।
तभी सड़क पर एक चमचमाती काली लग्जरी कार उनके पास आकर रुकी। कार का शीशा नीचे हुआ। अंदर से एक युवक ने झांका। नाम था—विक्रम। कॉर्पोरेट दुनिया का एक उभरता हुआ सितारा। उसके लिए हर चीज़ का एक ही मतलब था—'प्रॉफिट' (मुनाफा)। उसे मोल-भाव करने की आदत नहीं, बल्कि लत थी। उसे लगता था कि अगर उसने किसी चीज़ को उसकी बताई गई कीमत से आधी कीमत पर खरीद लिया, तो उसने जंग जीत ली।
विक्रम की नज़र दीनानाथ जी के संदूक पर रखे एक लकड़ी के घोड़े पर पड़ी। वह घोड़ा दीनानाथ जी ने सागौन की लकड़ी से हफ्तों की मेहनत के बाद बनाया था। उस पर की गई नक्काशी अद्भुत थी।
"बाबा, यह घोड़ा कितने का है?" विक्रम ने कार की हीटर की गर्मी का आनंद लेते हुए पूछा।

दीनानाथ जी की आँखों में एक चमक आई। शायद यह भगवान का भेजा हुआ कोई फरिश्ता हो। उन्होंने कांपते हाथों से घोड़े को उठाया और कहा, "साहब, यह मेरी सबसे बेहतरीन कारीगरी है। इसकी कीमत २,५०० रुपये है। एकदम असली सागौन है साहब, और नक्काशी..."
विक्रम ने बात काटते हुए हँसकर कहा, "अरे बाबा, रहने दो। बाज़ार में ऐसे खिलौने ५०० में मिलते हैं। मैं तुम्हें ८०० रुपये दूंगा। देना है तो दो, वरना मैं चला।"
दीनानाथ जी का दिल बैठ गया। २,५०० की चीज़ के ८०० रुपये? यह तो लूट थी। उन्होंने गिड़गिड़ाते हुए कहा, "साहब, मेरी मजबूरी समझिए। घर में बहुत परेशानी है। मेरी पत्नी अस्पताल में है। यह घोड़ा बनाने में मुझे एक महीना लगा है। कम से कम २,००० दे दीजिये।"

विक्रम ने अपनी कलाई घड़ी देखी। उसे पार्टी में जाने के लिए देर हो रही थी, लेकिन उसका 'बिजनेस माइंड' उसे हार मानने नहीं दे रहा था। उसने पर्स निकाला और कड़कड़ाते हुए १००० रुपये का एक नोट बाहर निकाला।
"देखो बाबा, यह आखिरी ऑफर है। १००० रुपये। लेना है तो लो, वरना मैं जा रहा हूँ। और हाँ, रोना-धोना मत शुरू करना, यह सब नाटक मैं बहुत देखता हूँ।" विक्रम के शब्दों में एक अजीब सी क्रूरता थी।

दीनानाथ जी की आँखों के सामने अपनी पत्नी का चेहरा घूम गया। वह साँसें जो उखड़ रही थीं। डॉक्टर की चेतावनी। अगर वह मना करते हैं, तो शायद रात भर कोई ग्राहक न मिले। और अगर वह बेचते हैं, तो यह उनकी कला का अपमान था। लेकिन उस वक्त कला से बड़ी 'सांसें' थीं।
दीनानाथ जी ने कांपते हाथों से वह घोड़ा विक्रम को पकड़ा दिया और १००० रुपये का नोट थाम लिया। उनकी आँखों से दो बूंद आँसू टपके और उस नोट पर गिर गए।

विक्रम ने जीत की मुस्कान के साथ शीशा चढ़ाया और कार आगे बढ़ा दी। उसने मन ही मन सोचा, "बेवकूफ बुड्ढा! २,५०० की चीज़ १००० में ले आया। इसे कहते हैं डील!"
कार आगे बढ़ गई, लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई थी।

विक्रम जब घर पहुंचा, तो उसका ५ साल का बेटा, आरव, जाग रहा था। विक्रम ने वह घोड़ा आरव को दिया। आरव खुशी से झूम उठा। वह घोड़े को ध्यान से देखने लगा। अचानक आरव ने घोड़े के पेट के नीचे एक छोटा सा कागज़ का टुकड़ा चिपका हुआ देखा।
उसने उसे उखाड़ा और विक्रम को दिया। "पापा, इस पर कुछ लिखा है।"
विक्रम ने बेरुखी से वह चिट पढ़ी। उस पर कांपते हुए अक्षरों में लिखा था:
"मेरे पोते 'राजू' के लिए। बेटा, जब तुम बड़े होकर यह घोड़ा देखोगे, तो याद रखना कि तुम्हारे दादाजी ने इसे तुम्हारे जन्मदिन के लिए बनाया था। पर शायद वक्त को यह मंजूर न हो। अगर यह खिलौना किसी और के हाथ में है, तो समझ लेना कि उस वक्त तुम्हारे दादाजी की मजबूरी उनकी मोहब्बत से जीत गई थी।"

विक्रम सन्न रह गया। उसे लगा जैसे किसी ने उसके गाल पर जोरदार तमाचा मारा हो। वह 'डील' जिसे वह अपनी जीत समझ रहा था, दरअसल वह एक हारी हुई बाजी थी। उसने एक दादा की आखिरी निशानी, एक कलाकार की मेहनत और एक पति की लाचारी को सिर्फ चंद रुपयों के लिए रौंद दिया था।
उसका नशा, उसका अहंकार, सब उस एक चिट ने चकनाचूर कर दिया था। उसने १००० रुपये में घोड़ा नहीं खरीदा था, उसने १००० रुपये में किसी की आत्मा को छलनी किया था।
रात के १२ बज चुके थे। बाहर बारिश शुरू हो चुकी थी। विक्रम ने अपनी पत्नी को सब बताया। उसकी पत्नी ने कहा, "विक्रम, पैसा तो हम और कमा लेंगे, लेकिन अगर आज उस बुजुर्ग की बद्दुआ हमारे साथ रह गई, तो हम कभी खुश नहीं रह पाएंगे।"

विक्रम उसी वक्त अपनी कार लेकर वापस उसी जगह भागा। बारिश मूसलाधार हो रही थी। सड़कें वीरान थीं। जब वह उस जगह पहुंचा, तो वहाँ कोई नहीं था। उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उसने सोचा, शायद वह अस्पताल चले गए होंगे।
वह शहर के सरकारी अस्पताल पहुंचा। रिसेप्शन पर पूछताछ की। जनरल वार्ड की तरफ भागते हुए उसे वही बूढ़े बाबा एक बेंच पर सिर झुकाए बैठे दिखे।
विक्रम उनके पास गया और धीरे से उनके कंधे पर हाथ रखा। दीनानाथ जी ने सिर उठाया। उनकी आँखें सूजी हुई थीं, लेकिन उनमें एक अजीब सी शांति थी।
"बाबा..." विक्रम की आवाज़ रुंध गई। "मुझे माफ़ कर दीजिये। मैंने आपकी मजबूरी का फायदा उठाया। मैं आपकी कला की कीमत नहीं समझ पाया। यह लीजिये..." विक्रम ने अपनी जेब से १०,००० रुपये निकालकर उनकी ओर बढ़ाए। "यह उस घोड़े की सही कीमत है, और मेरी गलती का प्रायश्चित।"
दीनानाथ जी ने नोटों की गड्डी को देखा, फिर विक्रम को। उन्होंने एक फीकी मुस्कान के साथ पैसे वापस विक्रम की ओर धकेल दिए।

विक्रम हैरान था। "बाबा, रख लीजिये। आपको पत्नी के इलाज के लिए चाहिए ना?"
दीनानाथ जी ने आसमान की तरफ इशारा किया और भारी आवाज़ में बोले, "बेटा, अब इन कागज़ के टुकड़ों की ज़रूरत नहीं है। मेरा सौदा ऊपर वाले से हो गया है। वो १००० रुपये दवाई के लिए कम पड़ गए थे... डॉक्टर ने जवाब दे दिया। मेरी सावित्री अब नहीं रही।"
विक्रम के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह वहीं घुटनों के बल बैठ गया। उसके हाथ से नोटों की गड्डी छूटकर अस्पताल के ठंडे फर्श पर बिखर गई।
दीनानाथ जी ने उठते हुए कहा, "बेटा, तुम अपनी जीत पर खुश हो रहे थे ना? याद रखना, जब हम किसी की मजबूरी को उसकी कमजोरी समझकर उसे निचोड़ते हैं, तो हम पैसे तो बचा लेते हैं, लेकिन इंसानियत खो देते हैं। वह घोड़ा अब तुम्हारे पास है, उसे अपने बच्चे को देना और सिखाना कि किसी की लाचारी का मोल कभी नहीं लगाना चाहिए।"

दीनानाथ जी धीरे-धीरे कॉरिडोर के अंधेरे में ओझल हो गए, अपने पीछे छोड़ गए एक ऐसा सन्नाटा जो विक्रम को जीवन भर कचोटने वाला था।
विक्रम बारिश में भीगता हुआ अपनी कार तक आया। आज उसके पास महंगी कार थी, बैंक बैलेंस था, लेकिन वह खुद को दुनिया का सबसे गरीब इंसान महसूस कर रहा था। उसे समझ आ गया था कि बाज़ार में हर चीज़ की कीमत लग सकती है, लेकिन आंसुओं और मजबूरी का कोई मोल नहीं होता।
निष्कर्ष:
दोस्तों, हम अक्सर सब्जी वाले से, रिक्शे वाले से या किसी छोटे दुकानदार से १०-२० रुपये के लिए घंटों बहस करते हैं और उसे अपनी 'स्मार्टनेस' समझते हैं। लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि शायद वे १० रुपये उनके लिए उस वक्त लाखों के बराबर हों। मजबूरी का फायदा उठाना व्यापार नहीं, बल्कि रूह का पतन है। किसी की मदद न कर सको तो मत करो, लेकिन कम से कम उसकी लाचारी का तमाशा या सौदा मत बनाओ।
आपको आज की कहानी कैसे लगी हमें कमेंट में बताएं। 

No comments:

Post a Comment

चित्तौड़ का स्वाभिमान: चिराड़ क्षत्रियों का गौरवशाली इतिहास और संघर्ष की गाथा

चिराड़ क्षत्रियों का बहुत ही गौरवमय इतिहास रहा है क्या आप जानते हैं कि चिराड़ क्षत्रिय कौन हैं? क्या आपको पता है कि यह समाज इतिह...