Monday, December 15, 2025

वज्र और वीणा दो क्षत्रिय वीरों के धर्म की परीक्षा

प्राचीन समय में भारतवर्ष के सुदर दक्षिण में महिष्मति' से भी परे, घने जंगलों और ऊंची पर्वत श्रृंखलाओं के बीच एक समृद्ध राज्य बसा था—अश्मक. अश्मक अपनी अभेद्य सुरक्षा और न्यायप्रिय शासन के लिए प्रसिद्ध था। इस राज्य के राजा, महाराज भीष्मदेव सिंह, अब वृद्ध हो चले थे और उनके सामने एक यक्ष प्रश्न खड़ा था—अपना उत्तराधिकारी किसे चुनें?

उनके दो पुत्र थे—राजकुमार विक्रमजीत सिंह और राजकुमार सौम्येंद्र सिंह।
दोनों ही क्षत्रिय वीर थे, दोनों ही राजसी रक्त के थे, लेकिन उनका स्वभाव दिन और रात की तरह भिन्न था।

दो ध्रुवों का परिचय
ज्येष्ठ राजकुमार विक्रमजीत सिंह साक्षात आंधी का रूप थे। छह फुट से अधिक लंबा कद, चौड़ी छाती, और भुजाएं ऐसी जैसे लोहे की सलाखें। उनकी तलवार, जिसका नाम 'कालदंत' था, युद्ध के मैदान में बिजली की तरह चमकती थी। उन्होंने अकेले ही सीमा पर कई बार बर्बर कबीलों को खदेड़ा था। प्रजा उन्हें 'अश्मक का वज्र' कहती थी। विक्रमजीत सिंह का मानना था कि एक क्षत्रिय का परम धर्म शक्ति है; यदि राजा शक्तिशाली नहीं है, तो राज्य सुरक्षित नहीं रह सकता।
दूसरी ओर, कनिष्ठ राजकुमार सौम्येंद्र सिंह थे। वे शारीरिक रूप से विक्रमजीत सिंह जितने विशालकाय नहीं थे, लेकिन उनकी आंखों में एक गहरा तेज था। वे शस्त्र-विद्या में निपुण थे, लेकिन उनकी असली शक्ति उनका मस्तिष्क था। वे घंटों पुस्तकालय में पुराने शास्त्रों, कूटनीति और वास्तुकला का अध्ययन करते। जहाँ विक्रमजीत सिंह समस्या को तलवार से काटने में विश्वास रखते थे, वहीं सौम्येंद्र सिंह समस्या की जड़ को सुलझाने में। उन्हें लोग प्यार से 'शांति की वीणा' कहते थे।
सेना विक्रमजीत सिंह के साथ थी, तो मंत्री परिषद सौम्येंद्र सिंह की बुद्धिमत्ता की कायल थी।

महाराज की चुनौती
महाराज भीष्मदेव सिंह जानते थे कि केवल शक्ति से राज्य निरंकुश हो सकता है और केवल बुद्धि से राज्य कमजोर पड़ सकता है। उत्तराधिकारी के निर्णय के लिए उन्होंने 'दिग्विजय' या युद्ध की घोषणा नहीं की, बल्कि एक अनोखी परीक्षा का आयोजन किया।
एक सुबह, भरे दरबार में महाराज ने घोषणा की।
"पुत्रों," महाराज की गंभीर आवाज गूंजी, "हमारे राज्य की उत्तरी सीमा पर स्थित 'नीलगिरि' की गुफाओं में हमारे कुलदेवता का एक प्राचीन मंदिर है जो अब खंडहर हो चुका है। किंवदंतियों के अनुसार, वहाँ एक 'स्फटिक मणि' है जो स्वयं सूर्य की ऊर्जा को धारण करती है। जो भी पुत्र उस मणि को लाकर मेरे सिंहासन पर रखेगा, वही अश्मक का अगला राजा होगा।"
लेकिन महाराज ने एक शर्त जोड़ी: "तुम्हें यह यात्रा बिना किसी सेना, बिना किसी सेवक और बिना अपने शाही घोड़ों के करनी होगी। तुम्हें एक साधारण यात्री की भांति जाना होगा।"

विक्रमजीत सिंह मुस्कुराए। उनके लिए यह शारीरिक शक्ति का प्रदर्शन था। सौम्येंद्र सिंह शांत रहे, वे समझ रहे थे कि यह यात्रा इतनी सीधी नहीं होगी।
यात्रा का आरंभ: शक्ति बनाम संयम
अगले ही दिन दोनों भाई निकल पड़े। विक्रमजीत सिंह ने सबसे छोटा रास्ता चुना—जो घने, खतरनाक जंगलों और खड़ी चट्टानों से होकर गुजरता था। उन्हें अपनी शक्ति पर भरोसा था। सौम्येंद्र सिंह ने थोड़ा लंबा रास्ता चुना जो गांवों और बस्तियों से होकर जाता था।
जंगल में विक्रमजीत सिंह को कई जंगली जानवरों और लुटेरों का सामना करना पड़ा। अपनी तलवार के बल पर उन्होंने सबको परास्त किया। वे तेजी से आगे बढ़े, लेकिन उनके मन में अहंकार घर कर गया था। उन्हें लगा कि प्रकृति और मनुष्य, सब उनकी शक्ति के आगे नतमस्तक हैं। लेकिन बिना विश्राम और उचित भोजन के, वे थकने लगे थे।
दूसरी ओर, सौम्येंद्र सिंह गांवों में रुकते, लोगों से बात करते और उनसे रास्तों की जानकारी लेते। उन्होंने जाना कि नीलगिरि के पास की नदी में बाढ़ आई हुई है। जहाँ विक्रमजीत सिंह सीधे नदी में कूद पड़े और अपनी अपार शक्ति से तैरकर पार तो कर गए लेकिन अपनी रसद और जूते गँवा बैठे, वहीं सौम्येंद्र सिंह ने ग्रामीणों की मदद से एक छोटी डोंगी बनाई और सुरक्षित नदी पार की।

मंदिर का द्वार और अंतिम रक्षक
अंततः, दोनों भाई एक ही समय पर नीलगिरि के शिखर पर स्थित उस खंडहर मंदिर के द्वार पर पहुंचे। दोनों के वस्त्र फटे हुए थे, लेकिन विक्रमजीत सिंह अधिक घायल और थके हुए लग रहे थे।
मंदिर के गर्भगृह के द्वार पर कोई ताला नहीं था, लेकिन वहां एक विचित्र 'यंत्र-मानव' खड़ा था। यह लोहे और लकड़ी से बना एक विशाल पुतला था, जिसके हाथ में एक भारी गदा थी। उसके सीने पर लिखा था: "केवल वह जो पूर्ण है, भीतर जा सकता है।"

विक्रमजीत सिंह ने आव देखा न ताव, अपनी तलवार निकाली और उस यंत्र पर टूट पड़े। "हटो मेरे रास्ते से!" उन्होंने गर्जना की।
विक्रमजीत सिंह के प्रहार शक्तिशाली थे। उन्होंने यंत्र की एक भुजा काट दी, लेकिन वह यंत्र जादुई था। जैसे ही उस पर प्रहार होता, वह और उग्र हो जाता। विक्रमजीत सिंह जितना बल लगाते, यंत्र उतनी ही तेजी से पलटवार करता। अंततः, एक जोरदार प्रहार ने विक्रमजीत सिंह की तलवार को दो टुकड़ों में तोड़ दिया और उन्हें धक्का देकर दूर फेंक दिया। अश्मक का वज्र, निहत्था और परास्त, ज़मीन पर पड़ा था।
विक्रमजीत सिंह ने सौम्येंद्र सिंह की तरफ देखा और चिल्लाया, "भाग जाओ सौम्येंद्र सिंह! यह लोहे का राक्षस अजेय है।"
सौम्येंद्र सिंह धीरे से आगे बढ़े। उन्होंने अपनी तलवार नहीं निकाली। उन्होंने उस यंत्र की गतिविधियों को ध्यान से देखा था। जब विक्रमजीत सिंह लड़ रहे थे, तब सौम्येंद्र सिंह देख रहे थे कि यंत्र के पैरों के पास एक छोटा सा 'लीवर' (उत्तोलक) है जो हर वार के साथ हिलता है।
सौम्येंद्र सिंह यंत्र के पास गए। यंत्र ने गदा उठाई। सौम्येंद्र सिंह ने वार रोका नहीं, बल्कि फुर्ती से झुककर यंत्र के पैरों के बीच से निकल गए और अपनी कटार से उस छोटे से लीवर को खींच दिया।
एक तेज खड़खड़ाहट हुई, और वह विशालकाय यंत्र अपने आप रुक गया। उसका आक्रामक रूप शांत हो गया और वह घुटनों के बल बैठ गया, जैसे नमन कर रहा हो।

सत्य का साक्षात्कार
रास्ता साफ था। सामने वेदी पर 'स्फटिक मणि' चमक रही थी।
विक्रमजीत सिंह लज्जा और ग्लानि से सिर झुकाए खड़े थे। "जाओ सौम्येंद्र सिंह," उन्होंने भारी मन से कहा। "तुमने मुझे जीवनदान दिया है। तुम ही इसके अधिकारी हो। मेरी शक्ति व्यर्थ थी, तुम्हारी बुद्धि जीती।"
सौम्येंद्र सिंह मणि की ओर बढ़े, उसे उठाया। लेकिन फिर वे रुके और वापस विक्रमजीत सिंह के पास आए।
"भैया," सौम्येंद्र सिंह ने कहा, "आपने उस यंत्र की एक भुजा काट दी थी, इसीलिए मैं उसके पैरों तक पहुँच पाया। यदि आप उसका ध्यान न भटकाते और उसके वार न झेलते, तो मैं उस तक पहुँचने से पहले ही कुचल दिया जाता। मेरी बुद्धि को आपकी शक्ति के आवरण की आवश्यकता थी।"
सौम्येंद्र सिंह ने मणि विक्रमजीत सिंह की ओर बढ़ाई। "राजा को रक्षक होना चाहिए, और आपसे बड़ा रक्षक कोई नहीं।"
विक्रमजीत सिंह की आँखों में आंसू आ गए। उन्होंने मणि को वापस सौम्येंद्र सिंह की ओर धकेला। "नहीं, राजा को दृष्टा होना चाहिए। जो यह देख सके कि कब तलवार चलानी है और कब लीवर खींचना है।"

सिंहासन का निर्णय
दोनों भाई राजदरबार में लौटे। महाराज भीष्मदेव सिंह सिंहासन पर विराजमान थे। पूरा दरबार उत्सुकता से परिणाम की प्रतीक्षा कर रहा था।
दोनों भाइयों ने एक साथ कदम बढ़ाया। उन्होंने 'स्फटिक मणि' को एक साथ अपने हाथों में थाम रखा था। उन्होंने जाकर उसे महाराज के चरणों में रख दिया।
"कौन लाया इसे?" महाराज ने पूछा।
"हम दोनों," विक्रमजीत सिंह ने कहा। "पिताजी, वन में मैंने सीखा कि बिना दिशा के वेग विनाश का कारण बनता है।"
"और मैंने सीखा," सौम्येंद्र सिंह ने जोड़ा, "कि बिना शक्ति के विचार केवल एक सपना बनकर रह जाता है।"
महाराज भीष्मदेव सिंह मुस्कुराए। उन्होंने खड़े होकर दोनों पुत्रों को गले लगा लिया।

निष्कर्ष: एक नया अध्याय
उस दिन अश्मक के इतिहास में एक अभूतपूर्व निर्णय लिया गया। महाराज ने घोषणा की कि सिंहासन पर सौम्येंद्र सिंह बैठेंगे, क्योंकि शासन के लिए दूरदर्शिता और संयम की आवश्यकता है। राजा सौम्येंद्र सिंह'मस्तिष्क' होंगे।
किंतु, विक्रमजीत सिंह को 'महासेनापति' और 'राज्य रक्षक' का पद दिया गया, जो राजा के समान ही शक्तिशाली होगा। वे राज्य की 'भुजा' होंगे।
उस दिन अश्मक के लोगों ने जाना कि एक सच्चे क्षत्रिय का धर्म केवल लड़ना नहीं, बल्कि यह जानना है कि कब लड़ना है और कब झुकना है। विक्रम सिंह और सौम्येंद्र सिंह ने सिद्ध कर दिया कि पूर्णता प्रतिद्वंद्विता में नहीं, बल्कि पूरकता (complementing each other) में है।

यह कहानी हमें सिखाती है कि जीवन में हम अक्सर 'हार्ड स्किल्स' (तकनीकी कौशल/शक्ति) और 'सॉफ्ट स्किल्स' (व्यवहार/बुद्धि) के बीच तुलना करते हैं। परंतु, सफलता की मणि तभी हासिल होती है जब शौर्य और धैर्य साथ चलते हैं। क्या आपके जीवन में भी कोई ऐसा 'विक्रम सिंह' या 'सौम्येंद्र सिंह' है जो आपकी कमियों को पूरा करता है?

दोस्तों आज की कहानी आपको कैसी लगी हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं। 

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