Wednesday, December 10, 2025

स्वर्ण कलश क्षत्रिय धर्म और मंत्री का विश्वासघात

प्राचीन समय में भारतवर्ष के दक्षिण में महेंद्रगिरी नाम का एक वैभवशाली कुशल साम्राज्य था। वहाँ के राजा महाराज विक्रमसेन एक प्रतापी क्षत्रिय थे। उनका न्याय इतना प्रसिद्ध था कि पड़ोसी राज्यों के लोग भी अपने विवाद सुलझाने उनके दरबार में आते थे। विक्रमसेन का मानना था कि "राजा केवल राज्य का रक्षक है, स्वामी नहीं।"

राजा का दाहिना हाथ था उनका महामंत्री—आचार्य विद्रथ। विद्रथ अत्यंत बुद्धिमान, नीति-निपुण और कूटनीति का ज्ञाता था। राज्य की समृद्धि के पीछे राजा के बाहुबल के साथ-साथ विद्रथ की बुद्धि का भी बड़ा हाथ था। लेकिन विद्रथ के मन के एक कोने में एक अंधेरी गुफा थी—असंतोष। उसे लगता था कि वह राजा से अधिक चतुर है, फिर भी उसे राजा के सामने झुकना पड़ता है। वह महलों में रहता था, लेकिन उसे राजा का सिंहासन चाहिए था। धीरे-धीरे यह असंतोष भयंकर लालच में बदल गया।

देवदूत का वरदान
एक बार राज्य में भयंकर अकाल पड़ा। वर्षा न होने के कारण नदियाँ सूख गईं और प्रजा त्राहि-त्राहि करने लगी। महाराज विक्रमसेन ने अपने खजाने के द्वार खोल दिए, लेकिन अन्न की कमी को धन से पूरा नहीं किया जा सकता था। राजा अत्यंत चिंतित थे।
उसी समय, हिमालय से एक तपस्वी महर्षि भार्गव राज्य में पधारे। राजा की सेवा और प्रजा के प्रति उनकी निष्ठा देखकर महर्षि प्रसन्न हुए। जाने से पूर्व उन्होंने राजा को एक विचित्र "अक्षय स्वर्ण-कलश" दिया।
महर्षि ने कहा, "राजन, यह कलश साधारण नहीं है। संकट के समय, यदि कोई पवित्र हृदय वाला व्यक्ति पूर्ण निष्ठा से प्रजा के कल्याण की कामना करते हुए इसमें हाथ डालेगा, तो यह कलश उसे उतना ही स्वर्ण देगा जितना उस समय अन्न खरीदने के लिए आवश्यक होगा। लेकिन स्मरण रहे, यदि किसी ने अपने निजी भोग-विलास या सत्ता के लालच में इसका उपयोग किया, तो यह कलश उस व्यक्ति के लिए 'मृत्यु-पाश' बन जाएगा।"
राजा ने कलश को राजकोष के सबसे सुरक्षित कक्ष में रखवाया, जिसकी चाबी केवल दो लोगों के पास थी—स्वयं महाराज और महामंत्री विद्रथ।

लालच का जाल
कलश के आते ही राज्य की समस्या हल हो गई। राजा उसमें से स्वर्ण निकालते और पड़ोसी राज्यों से अनाज मंगवाते। प्रजा को जीवनदान मिल गया।
लेकिन महामंत्री विद्रथ की आँखों में वह कलश खटकने लगा। वह सोचने लगा, "इस कलश में अनंत संपत्ति है। राजा मूर्ख है जो इसे केवल अनाज के लिए प्रयोग कर रहा है। यदि यह कलश मेरा हो जाए, तो मैं दुनिया की सबसे बड़ी सेना खड़ी कर सकता हूँ। मैं महेंद्रगिरी ही नहीं, पूरे आर्यावर्त का सम्राट बन सकता हूँ।"
बुद्धिमान विद्रथ की बुद्धि पर लालच का पर्दा पड़ गया। उसे महर्षि की चेतावनी याद थी, लेकिन उसके अहंकार ने उसे समझा दिया कि, "मैं तो महामंत्री हूँ, राज्य का शुभचिंतक हूँ। अगर मैं राजा बनता हूँ तो यह भी तो प्रजा का ही कल्याण होगा? इसलिए यह मेरा निजी स्वार्थ नहीं, बल्कि मेरी योग्यता का इनाम है।" लालची मन अक्सर अपने पाप को पुण्य का चोला पहना देता है।

विश्वासघात की रात्रि
अमावस्या की काली रात थी। राजा विक्रमसेन सीमा सुरक्षा के निरीक्षण के लिए राजधानी से दूर गए हुए थे। महल की सुरक्षा का भार विद्रथ पर था।
विद्रथ ने राजकोष के पहरेदारों को विशेष आदेश देकर दूसरी ओर भेज दिया। वह हाथ में मशाल लिए राजकोष के भारी दरवाजों के पास पहुँचा। उसके हाथों में कंपन था, लेकिन आँखों में सिंहासन की चमक थी। उसने अपनी चाबी लगाई और भारी द्वार खोला।
सामने वह दिव्य कलश रखा था। अँधेरे में भी उससे एक मंद-मंद आभा निकल रही थी। विद्रथ उसके पास गया। सन्नाटे में उसे अपनी साँसों की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
उसने सोचा, "बस आज की रात। मैं इस कलश को लेकर गुप्त मार्ग से निकल जाऊँगा। पड़ोसी शत्रु राजा से संधि करूँगा और फिर अपनी सेना लेकर विक्रमसेन को परास्त कर दूँगा।"

कलश का प्रकोप
विद्रथ ने कांपते हाथों से कलश को उठाया। उसे आश्चर्य हुआ कि कलश बहुत हल्का था। उसने मन ही मन महर्षि की चेतावनी का उपहास किया। "देखो! कुछ नहीं हुआ। ऋषि-मुनि बस डराना जानते हैं।"
उसने अपनी झोली फैलाई और सोचा कि पहले थोड़ा स्वर्ण निकालकर देखूँ। जैसे ही उसने 'सत्ता और भोग' की कामना करते हुए अपना हाथ कलश के अंदर डाला, एक भयानक घटना घटी।
कलश के अंदर उसे कोई स्वर्ण मुद्रा नहीं मिली, बल्कि उसे लगा जैसे किसी ने उसका हाथ भीतर से जकड़ लिया हो। उसने हाथ बाहर खींचने की कोशिश की, लेकिन वह असफल रहा। तभी कलश का आकार बढ़ने लगा। देखते ही देखते वह छोटा सा कलश भारी होने लगा।

विद्रथ चिल्लाया, लेकिन उसकी आवाज़ गले में ही अटक गई। वह कलश अब सोने का नहीं, बल्कि तपते हुए लोहे जैसा लाल हो गया था। विद्रथ का हाथ अंदर फँसा हुआ था और कलश की तपिश उसके शरीर को झुलसा रही थी।
महर्षि ने कहा था—'लालच में यह मृत्यु-पाश बन जाएगा।'
कलश का वजन इतना बढ़ गया कि विद्रथ उसे संभाल न सका और जमीन पर गिर पड़ा। उसका हाथ अभी भी कलश के भीतर फँसा था। वह जितना जोर लगाता, कलश उतना ही भारी और गर्म होता जाता। उसे ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वह कलश उसके शरीर का सारा रक्त और प्राण-शक्ति चूस रहा हो।

राजा का न्याय
अगली सुबह जब राजा विक्रमसेन वापस लौटे, तो उन्हें राजकोष के द्वार खुले मिले। वे अंदर दौड़े। वहाँ का दृश्य देखकर वे स्तब्ध रह गए।
महामंत्री विद्रथ जमीन पर पड़े थे। उनका शरीर काला पड़ चुका था, और वह अभी भी उस कलश से जुड़े हुए थे। कलश अब शांत और ठंडा हो चुका था, लेकिन उसने विद्रथ का हाथ नहीं छोड़ा था। विद्रथ की साँसें चल रही थीं, लेकिन उनकी आँखों में मृत्यु का भय और असहनीय पीड़ा थी।

राजा को देखते ही विद्रथ ने क्षीण स्वर में कहा, "महाराज... मुझे बचाइए... यह कलश मुझे खा रहा है।"
महाराज विक्रमसेन समझ गए कि क्या हुआ है। उन्होंने दुखी होकर कहा, "विद्रथ! तुम मेरे भाई के समान थे। मेरे बाद इस राज्य का सर्वाधिक शक्तिमान व्यक्ति तुम ही थे। तुम्हारे पास धन, यश, आदर—सब कुछ था। फिर भी लालच ने तुम्हें अंधा कर दिया? क्षत्रिय का धर्म रक्षा करना है, और मंत्री का धर्म नीति का पालन करना। तुमने दोनों का अपमान किया।"

राजा ने महर्षि का स्मरण किया और हाथ जोड़कर प्रार्थना की, "हे देव! यदि मेरे मंत्री ने अपने अपराध का दंड पा लिया हो, तो इसे मुक्त करें, ताकि इसे राजदंड दिया जा सके।"
प्रार्थना करते ही कलश ने विद्रथ का हाथ छोड़ दिया। लेकिन विद्रथ का वह हाथ अब किसी काम का नहीं रहा था—वह पूरी तरह सूख चुका था, जैसे किसी वृक्ष की मृत शाखा हो।

परिणाम और सीख
विद्रथ को राजसभा में लाया गया। उसका अपराध सिद्ध हो चुका था—चोरी और राजद्रोह।
महाराज विक्रमसेन ने सिंहासन से फैसला सुनाया, "महामंत्री विद्रथ का लालच केवल धन का नहीं था, बल्कि विश्वास का हनन था। एक साधारण चोर केवल धन चुराता है, लेकिन एक लालची शासक या मंत्री पूरे राष्ट्र के भविष्य को चुराता है।"
राजा ने विद्रथ को मृत्युदंड नहीं दिया। उन्होंने कहा, "मृत्यु तो तुम्हें पीड़ा से मुक्त कर देगी। तुम्हारा दंड यह है कि तुम इसी अवस्था में एक साधारण किसान का जीवन धारण करके प्रजा की सेवा करो। आने-जाने वाला हर नागरिक तुम्हें देखेगा और याद रखेगा कि जब 'बुद्धि' पर 'लालच' हावी हो जाता है, तो इंसान का हश्र क्या होता है।"
विद्रथ, जो कभी रेशमी वस्त्रों में राजदरबार की शोभा बढ़ाता था, अब खेतों में खूब मेहनत करता है और प्रजा की सेवा कर रहा है। उसका सूखा हुआ हाथ हमेशा ऊपर की ओर उठा रहता, मानो वह माँग रहा हो, लेकिन अब उसे लालच की आस नहीं सिर्फ प्रजा के हित और जन कल्याण में ईश्वर से प्रार्थना करता। 
महेंद्रगिरी राज्य में यह कहावत प्रसिद्ध हो गई—"बुद्धिमान वह नहीं जो अधिक बटोरे, बुद्धिमान वह है जो संतोष को समझे।"

कहानी का विश्लेषण (Moral):
यह कहानी सिखाती है कि जब उच्च पदों पर बैठे लोग लालच करते हैं, तो वे न केवल अपना विनाश करते हैं, बल्कि अपने पद और प्रतिष्ठा को भी कलंकित करते हैं। विद्रथ के पास सब कुछ था, लेकिन 'और पाने' की चाह ने उसका 'जो है' वह भी छीन लिया। लालच सोने की बेड़ियाँ हैं, जो चमकती तो हैं, लेकिन इंसान को गुलाम बना देती हैं।
आप सभी को या कहानी कैसी लगी हमें कमेंट बॉक्स में बताएं। 

No comments:

Post a Comment

चित्तौड़ का स्वाभिमान: चिराड़ क्षत्रियों का गौरवशाली इतिहास और संघर्ष की गाथा

चिराड़ क्षत्रियों का बहुत ही गौरवमय इतिहास रहा है क्या आप जानते हैं कि चिराड़ क्षत्रिय कौन हैं? क्या आपको पता है कि यह समाज इतिह...