Friday, December 26, 2025

दर्पण और दीमक :- दो राजकुमारों की कहानी जो सिखाती है कि असली जीत किसकी होती है।

हम अक्सर सुनते हैं कि प्रतिस्पर्धा हमे बेहतर बनाती है लेकिन क्या हो जब यह प्रतिस्पर्धा एकतरफा हो? क्या हो जब एक व्यक्ति दौड़ में सबसे आगे निकलने के लिए दौड़ रहा हो, और दूसरा सिर्फ इसलिए दौड़ रहा हो क्योंकि उसे दौड़ने में आनंद आता है?
आज मैं आपको सूरजगढ़ के दो राजकुमारों की एक पुरानी कहानी सुनाता हूँ। यह कहानी सिर्फ राजपाट की नहीं, बल्कि मन की स्थिति की है। यह कहानी है ईर्ष्या की उस दीमक की जो धीरे-धीरे सब कुछ खोखला कर देती है, और उस बड़प्पन की जो दर्पण की तरह साफ और बेदाग रहता है।

सूरज और छाया
सूरजगढ़ राज्य अपने नाम के अनुरूप ही तेजस्वी था। वहां के राजा महाराज हर्षवर्धन के दो पुत्र थे - बड़ा राजकुमार विक्रमजीत और छोटा राजकुमार सत्यजीत।
दोनों राजकुमार देखने में एक जैसे ही प्रभावशाली थे। तलवारबाजी हो, घुड़सवारी हो या शास्त्रों का ज्ञान, दोनों को सर्वश्रेष्ठ गुरुओं ने शिक्षा दी थी। लेकिन उनके स्वभाव में जमीन-आसमान का अंतर था।
विक्रमजीत, जैसा कि उसका नाम था, हमेशा जीतना चाहता था। उसके लिए जीवन एक युद्धक्षेत्र था जहाँ हर कोई उसका प्रतिद्वंद्वी था। उसकी सबसे बड़ी समस्या यह थी कि वह अपनी योग्यता अपनी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि दूसरों की हार से मापता था। और उसकी ईर्ष्या का केंद्र कोई और नहीं, बल्कि उसका अपना छोटा भाई सत्यजीत था।
दूसरी ओर, सत्यजीत शांत जल की तरह था। वह कर्मठ था, वीर था, लेकिन उसमें 'सर्वश्रेष्ठ' होने का अहंकार नहीं था। यदि वह तीरंदाजी में चूक जाता, तो वह अपनी तकनीक सुधारने पर ध्यान देता, न कि इस पर कि किसने उसे हराया।

ईर्ष्या की अग्नि
विक्रमजीत के मन में ईर्ष्या का बीज बचपन में ही पड़ गया था। अगर सत्यजीत किसी घायल पक्षी की सेवा करता और लोग उसकी दयालुता की तारीफ करते, तो विक्रमजीत को लगता कि उसकी वीरता की उपेक्षा हो रही है।
जैसे-जैसे वे बड़े हुए, विक्रम की यह जलन द्वेष में बदल गई। वह हर पल इसी फिराक में रहता कि कैसे सत्यजीत को नीचा दिखाया जाए।
एक बार राज्य के वार्षिक उत्सव में घुड़सवारी की प्रतियोगिता थी। विक्रमजीत ने शानदार प्रदर्शन किया। उसने सबसे तेज और सबसे ऊँची बाधाओं को पार किया। दर्शकों ने तालियों से उसका स्वागत किया। विक्रमजीत का सीना गर्व से फूल गया। उसने तिरछी नजरों से सत्यजीत की ओर देखा, जैसे कह रहा हो,

 "अब तुम क्या करोगे?"
सत्यजीत की बारी आई। उसका घोड़ा भी हवा से बातें कर रहा था। लेकिन दौड़ के बीच में, एक छोटा बच्चा अनजाने में ट्रैक पर आ गया। सत्यजीत ने पल भर में अपनी जीत की परवाह छोड़ दी। उसने घोड़े की लगाम इतनी जोर से खींची कि घोड़ा वहीं रुक गया। सत्यजीत घोड़े से गिरा, उसे चोट भी आई, लेकिन बच्चा बच गया।
भीड़ कुछ पल शांत रही, फिर तालियों की गड़गड़ाहट विक्रमजीत की जीत से कहीं ज्यादा तेज थी। लोग सत्यजीत के कौशल की नहीं, उसके चरित्र की जयकार कर रहे थे।
विक्रमजीत आगबबूला हो गया। उसे लगा कि सत्यजीत ने जानबूझकर यह नाटक किया है ताकि वह महान बन सके। उस रात, विक्रमजीत ने अपनी जीत का जश्न नहीं मनाया, बल्कि अंधेरे कमरे में बैठकर सत्यजीत के प्रति अपनी नफरत को और गहरा किया।

उत्तराधिकार की परीक्षा
समय बीता और महाराज हर्षवर्धन वृद्ध होने लगे। उत्तराधिकारी चुनने का समय आ गया था। राजा दोनों पुत्रों के स्वभाव को भलीभांति जानते थे। उन्होंने घोषणा की कि वे दोनों राजकुमारों की अंतिम परीक्षा लेंगे और जो प्रजा के हित के लिए सबसे उपयुक्त होगा, वही अगला राजा बनेगा।

तीन परीक्षाएं तय हुईं।
पहली परीक्षा थी - शक्ति की। दोनों को राज्य के सबसे खतरनाक जंगली सूअर का शिकार करना था। विक्रमजीत ने इसे एक व्यक्तिगत लड़ाई बना लिया। उसने दिन-रात एक कर दिया और अंततः एक विशाल सूअर को मारकर दरबार में ले आया।
सत्यजीत खाली हाथ लौटा। जब कारण पूछा गया, तो उसने बताया कि उसे एक मादा सूअर दिखी थी, लेकिन उसके साथ छोटे बच्चे थे। उसने उनका शिकार करना उचित नहीं समझा।
विक्रमजीत हंसा। "राजा बनने के लिए हृदय में कठोरता चाहिए, सत्यजीत। तुम तो एक जानवर को मारने से भी डरते हो।"
सत्यजीत मुस्कुराया, "भैया, शक्ति का प्रदर्शन निर्बल को मारने में नहीं, बल्कि उसकी रक्षा करने में है।"
दूसरी परीक्षा थी - बुद्धि की। राज्य के दो पड़ोसी गांवों में पानी को लेकर विवाद हो गया था। मामला इतना बढ़ गया कि खूनी संघर्ष की नौबत आ गई।

विक्रमजीत पहले गया। उसने अपनी सेना की टुकड़ी के साथ गांव को घेर लिया और दोनों गांवों के मुखिया को धमकाकर समझौता करने पर मजबूर किया। उसने आकर पिता से कहा, "मैंने डर स्थापित कर दिया है, अब वे कभी नहीं लड़ेंगे।"
फिर सत्यजीत गया। वह बिना किसी हथियार के, साधारण वेशभूषा में वहां पहुंचा। उसने दोनों गांवों के लोगों के साथ बैठकर खाना खाया, उनकी समस्याएं सुनीं। उसने पाया कि समस्या पानी की कमी नहीं, बल्कि पानी के बंटवारे की खराब व्यवस्था थी। उसने दोनों गांवों के लोगों को साथ मिलाकर एक नई नहर खुदवाई। जो लोग कल तक एक-दूसरे के खून के प्यासे थे, वे आज साथ मिलकर काम कर रहे थे।
सत्यजीत ने लौटकर कहा, "पिताजी, मैंने डर नहीं, विश्वास स्थापित किया है।"

अंतिम प्रहार
विक्रमजीत समझ गया था कि वह बुद्धि की लड़ाई हार चुका है। उसकी जलन अब पागलपन की हद तक पहुंच चुकी थी। उसे लगा कि यदि सत्यजीत जीवित रहा, तो वह कभी राजा नहीं बन पाएगा।
तीसरी परीक्षा थी - धैर्य की। दोनों राजकुमारों को 'भूलभुलैया के जंगल' में एक रात बितानी थी और वहां छिपे एक प्राचीन मंदिर का कलश लाना था।
विक्रमजीत ने एक भयानक योजना बनाई। वह जानता था कि सत्यजीत किस रास्ते से जाएगा। उसने रास्ते में एक गहरा गड्ढा खुदवाया और उसे पत्तियों से ढक दिया। उसमें उसने नुकीली लकड़ियां भी गड़वा दीं।
रात के अंधेरे में, सत्यजीत उस रास्ते से गुजरा और गड्ढे में जा गिरा। उसके पैर में गहरी चोट आई। वह दर्द से कराह उठा।

तभी गड्ढे के ऊपर विक्रमजीत का चेहरा दिखाई दिया। उसके हाथ में एक मशाल थी और चेहरे पर एक क्रूर मुस्कान।
"देख लिया अपना बड़प्पन, सत्यजीत?" विक्रमजीत फुफकारा। "अब यहाँ तड़प-तड़प कर मरो। कल सुबह मैं वह कलश लेकर जाऊँगा और राजा बनूँगा।"
सत्यजीत ने ऊपर देखा। दर्द के बावजूद उसकी आँखों में विक्रम के लिए गुस्सा नहीं, बल्कि गहरा दुख था।
सत्यजीत ने शांत स्वर में कहा, "भैया, आप मुझे इस गड्ढे में गिराकर जीत सकते हैं, लेकिन उस गड्ढे से कैसे बाहर निकलेंगे जो आपने अपने मन के अंदर बना लिया है? मैं तो शायद यहाँ से निकल जाऊँगा, लेकिन आप अपनी ईर्ष्या की कैद से कभी आजाद नहीं हो पाएंगे।"
विक्रमजीत सन्न रह गया। वह अपेक्षा कर रहा था कि सत्यजीत गिड़गिड़ाएगा, रोएगा या क्रोधित होगा। लेकिन सत्यजीत की आँखों में उस समय भी एक अजीब सी शांति थी, जिसने विक्रमजीत को अंदर तक झकझोर दिया।

विक्रमजीत वहां से भाग खड़ा हुआ। वह मंदिर पहुंचा, उसने कलश उठाया, लेकिन उसे कोई खुशी महसूस नहीं हुई। सत्यजीत के शब्द उसके कानों में गूंज रहे थे। उसे पहली बार अपनी जीत खोखली लग रही थी।

दर्पण का सच
सुबह दरबार लगा। विक्रमजीत कलश लेकर पहुंचा। महाराज ने पूछा, "सत्यजीत कहाँ है?"
इससे पहले कि विक्रम कुछ बोल पाता, सत्यजीत लंगड़ाता हुआ दरबार में दाखिल हुआ। उसके कपड़े फटे थे और पैर से खून बह रहा था।
महाराज ने चिंतित होकर पूछा, "यह क्या दशा है पुत्र?"
विक्रमजीत की सांसें थम गईं। उसे लगा अब सत्यजीत सब बता देगा।
लेकिन सत्यजीत ने कहा, "क्षमा करें पिताजी, मैं अंधेरे में रास्ता भटक गया था और एक पुराने गड्ढे में गिर गया। मुझे आने में देर हो गई।"
उसने विक्रमजीत की ओर देखा और हल्की सी मुस्कान दी। उस मुस्कान में कोई व्यंग्य नहीं था, सिर्फ क्षमा थी।
उस एक पल में विक्रमजीत टूट गया। उसका अहंकार, उसकी ईर्ष्या, उसका द्वेष - सब कुछ उस निस्वार्थ क्षमा के सामने धराशायी हो गया। वह दौड़कर गया और सत्यजीत के पैरों में गिर पड़ा।
"मुझे क्षमा कर दो सत्यजीत! मुझे क्षमा कर दो!" विक्रमजीत फूट-फूट कर रोने लगा। उसने सबके सामने अपना पूरा षड्यंत्र स्वीकार कर लिया।
दरबार में सन्नाटा छा गया। महाराज हर्षवर्धन अपने सिंहासन से उठे।

उन्होंने कहा, "आज तीनों परीक्षाएं पूरी हुईं। विक्रमजीत, तुमने शक्ति दिखाई, लेकिन संयम नहीं। तुमने बुद्धि दिखाई, लेकिन करुणा नहीं। और आज तुमने धैर्य खो दिया और अपने ही भाई के विरुद्ध षड्यंत्र रचा।"
राजा सत्यजीत की ओर मुड़े, "और सत्यजीत, तुमने सिद्ध कर दिया कि एक सच्चा राजा वह नहीं होता जो दूसरों को हराता है, बल्कि वह होता है जो स्वयं को जीत लेता है। जो अपने शत्रु को भी क्षमा करने का साहस रखता है।"
सत्यजीत को सूरजगढ़ का नया राजा घोषित किया गया।
लेकिन कहानी का सबसे सुखद अंत यह नहीं था। सबसे सुखद अंत यह था कि उस दिन के बाद से, विक्रमजीत बदल गया। उसने अपनी तलवार सत्यजीत के चरणों में रख दी। वह सत्यजीत का सबसे वफादार सेनापति बना।
उसने समझ लिया था कि जीवन में असली मुकाबला दूसरों से नहीं, बल्कि अपने आप से होता है। ईर्ष्या आपको जलाती है, जबकि बड़प्पन आपको रोशन करता है। सत्यजीत वह दर्पण था जिसने विक्रमजीत को उसका असली चेहरा दिखाया, और अंततः उसे दीमक से मुक्त किया।

दोस्तों आज की कहानी से आपने क्या सिखा और आपको यह कहानी कैसी लगी हमें कमेंट करके जरूर बताएं। 🙏🙏

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