इसी राज्य के राजकुमार थे वीर प्रताप सिंह। वीर प्रताप केवल अपने नाम के ही वीर नहीं थे, बल्कि उनके कौशल की गाथाएं पड़ोसी राज्यों तक फैली थीं। चौड़ी छाती, तीखी नाक और आंखों में एक ऐसी चमक जो अंधेरे में भी रास्ता खोज ले। लेकिन उस रात, जब महल की दीवारों पर मशालें कांप रही थीं, राजकुमार के मन में एक अजीब सी बेचैनी थी।
राजसी सुख और जनता का दुख
महल के भीतर का तापमान गर्म था। सुगंधित लकड़ियाँ जल रही थीं और राजकुमार के बिस्तर पर पशमीने के कई गर्म लिहाफ बिछे थे। लेकिन वीर प्रताप को नींद नहीं आ रही थी। उन्होंने खिड़की से बाहर झांका। दूर तलहटी में बसे गांव 'धुंधपुर' की इक्का-दुक्का बत्तियां भी बुझ चुकी थीं।
उन्होंने सोचा, "मैं यहां रेशमी लिहाफों में हूँ, लेकिन क्या मेरे राज्य का हर बच्चा आज सुरक्षित सो पाया होगा? एक क्षत्रिय का धर्म केवल युद्ध के मैदान में रक्त बहाना नहीं, बल्कि अपनी प्रजा के आंसू पोंछना भी है।"
बिना किसी को बताए, राजकुमार ने अपनी राजसी पोशाक उतारी और एक साधारण ऊनी लोई (कंबल) ओढ़ ली। उन्होंने अपनी प्रिय तलवार कमर से बांधी और महल के गुप्त द्वार से बाहर निकल पड़े।
अंधेरी रात और एक परीक्षा
बाहर निकलते ही कड़ाके की ठंड ने उनका स्वागत किया। हवा इतनी ठंडी थी कि सांस लेना भी मुश्किल हो रहा था। वीर प्रताप चुपचाप गांव की ओर बढ़े। उन्होंने देखा कि ठंड ने जीवन की गति रोक दी है। पशु अपने बाड़ों में ठिठुर रहे थे और लोग फटे-पुराने कंबलों में सिमटे हुए थे।
तभी उन्हें गांव के छोर पर एक पुरानी कुटिया से सिसकियों की आवाज सुनाई दी। राजकुमार रुक गए। उन्होंने धीरे से दरवाजा खटखटाया। अंदर से एक बूढ़ी आवाज आई, "कौन है? क्या यमराज आ गए?"
राजकुमार ने भीतर प्रवेश किया। वहां एक वृद्ध महिला एक छोटे से बच्चे को अपनी छाती से लगाए बैठी थी। घर में न तो पर्याप्त ईंधन था और न ही अनाज। बच्चा ठंड से नीला पड़ रहा था।
वृद्धा ने राजकुमार को देखा (जो एक साधारण राहगीर लग रहे थे) और कहा, "बेटा, अगर तुम्हारे पास थोड़ी आग हो तो दे दो। मेरा पोता कल की सुबह नहीं देख पाएगा।"
क्षत्रिय का वास्तविक शस्त्र
वीर प्रताप का हृदय भर आया। उन्होंने तुरंत बाहर जाकर सूखी लकड़ियाँ और झाड़ियाँ तलाशनी शुरू कीं। लेकिन बर्फ के कारण सब कुछ गीला था। हार मानकर वे अंदर आए। उन्होंने अपनी बेशकीमती ऊनी लोई उतारी और उस बच्चे तथा वृद्धा को लपेट दी।
लेकिन यह काफी नहीं था। ठंड हड्डियों को चीर रही थी। तभी राजकुमार ने कुछ ऐसा किया जो उनके क्षत्रिय स्वाभिमान की एक नई परिभाषा थी। उन्होंने अपनी वह तलवार निकाली, जिससे उन्होंने कई युद्ध जीते थे। उन्होंने तलवार की मूठ से पत्थर रगड़कर चिंगारी पैदा करने की कोशिश की, और जब आग जल गई, तो उन्होंने पास पड़े लकड़ी के एक पुराने संदूक को तोड़कर आग में डाल दिया।
पूरी रात राजकुमार वीर प्रताप बिना किसी कंबल के, केवल अपनी इच्छाशक्ति के दम पर उस आग को जलाए रखते हुए फर्श पर बैठे रहे। वे उस बच्चे को अपनी गोद में लेकर उसे अपनी देह की गर्मी देते रहे।
सुबह का उजाला और एक नई शपथ
जब भोर की पहली किरण धुंध को चीरती हुई खिड़की से अंदर आई, तो बच्चे के गालों पर गुलाबी रंगत लौट आई थी। वह मुस्कुराते हुए सो रहा था। वृद्धा की आंखें खुलीं, तो उन्होंने देखा कि वह साधारण राहगीर अब वहां नहीं था। लेकिन वहां उनकी कुटिया के बाहर राजसी मोहर वाली सोने की तीन मुद्राएं और एक पत्र पड़ा था।
पत्र पर लिखा था,
"माते, क्षत्रिय वह नहीं जो केवल सिर काटना जानता हो, क्षत्रिय वह है जो दूसरों को जीवन देने के लिए खुद को ठंड में गला सके। आपके आशीर्वाद ने आज एक राजकुमार को उसका वास्तविक धर्म सिखा दिया।"
महल में परिवर्तन
राजकुमार जब महल लौटे, तो वे पहले वाले वीर प्रताप नहीं थे। उन्होंने तुरंत अपने पिता, महाराज विक्रम सिंह से भेंट की और एक अभूतपूर्व निर्णय लिया।
उन्होंने कहा, "पिताजी, हमारे शस्त्रागार में तलवारें तो बहुत हैं, लेकिन हमारे अन्न भंडार और वस्त्र भंडार प्रजा के लिए छोटे पड़ रहे हैं। मैं चाहता हूँ कि आज से पूरे राज्य में 'अलाव सेवा' शुरू की जाए। हर चौराहे पर लकड़ी का प्रबंध हो और राजकोष से हर निर्धन को कंबल दिया जाए।"
महाराज ने अपने पुत्र की आंखों में वह तेज देखा जो किसी युद्ध को जीतने के बाद भी नहीं दिखा था। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "पुत्र, आज तुमने रजतपुर का असली गौरव सिद्ध कर दिया है।"
कहानी का सार
उस साल की सर्दी बहुत लंबी चली, लेकिन रजतपुर में किसी की जान ठंड से नहीं गई। पूरे राज्य में चर्चा थी कि एक 'अदृश्य मसीहा' रात को निकलता है और गरीबों की झोपड़ियों के बाहर लकड़ियां छोड़ जाता है।
राजकुमार वीर प्रताप ने अपनी तलवार को म्यान में रख दिया था, क्योंकि उन्होंने समझ लिया था कि दुनिया को जीतने के लिए लोहे की नहीं, बल्कि पिघले हुए मोम जैसे कोमल और साहसी हृदय की आवश्यकता होती है।
ठंड अभी भी थी, लेकिन रजतपुर के लोगों के दिलों में जो गर्मी थी, वह किसी भी अलाव से कहीं अधिक शक्तिशाली थी। यह एक क्षत्रिय की जीत थी—खून बहाकर नहीं, बल्कि प्यार और करुणा की लौ जलाकर।
निष्कर्ष
यह कहानी हमें सिखाती है कि नेतृत्व और वीरता का असली अर्थ दूसरों की पीड़ा को समझना है। इस कड़ाके की ठंड में, क्या हम भी किसी के जीवन में राजकुमार वीर प्रताप की तरह 'गर्मी' ला सकते हैं?
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