Friday, December 12, 2025

राजधर्म की कसौटी एक क्षत्रिय का अंतिम युद्ध

इतिहास गवाह है कि एक क्षत्रिय का धर्म तलवार चलाना या युद्ध के मैदान में पराक्रम दिखाना नहीं होता एक क्षत्रिय का धर्म न्याय की रक्षा करना चाहे उस न्याय की वेदी पर उसे अपने सबसे प्रिय रिश्तों की आहुति ही क्यों न देनी पड़े। यह कहानी है अवंतिकापुरी के महाराज विक्रमजीत सिंह की, जिनके लिए उनका राजधर्म उनके प्राणों से भी बढ़कर था।

शांति का भ्रम
अवंतिकापुरी राज्य अपनी सुख-समृद्धि के लिए पूरे आर्यावर्त में प्रसिद्ध था। महाराज विक्रमजीत सिंह न केवल एक कुशल योद्धा थे, बल्कि एक न्यायप्रिय शासक भी थे। उनकी ख्याति यह थी कि उनके दरबार में एक रंक और एक राजा को एक ही तराजू में तौला जाता था।
महाराज के जीवन का सबसे अनमोल रत्न उनका एकमात्र पुत्र था—युवराज अभयसिंह। अभयसिंह रूपवान थे, शस्त्र विद्या में निपुण थे और प्रजा भी उन्हें बहुत प्रेम करती थी। महाराज विक्रमजीत अपनी वृद्धावस्था की ओर बढ़ रहे थे और वे जल्द ही अपना राज-काज अभयसिंह को सौंपकर वानप्रस्थ आश्रम की ओर जाना चाहते थे।
लेकिन नियति ने पिता और पुत्र के लिए कुछ और ही लिख रखा था।

वह काली शाम
वसंत ऋतु का समय था। युवराज अभयसिंह अपने मित्रों के साथ शिकार के लिए जंगल की ओर गए। उत्साह और युवावस्था के जोश में, युवराज ने अपने घोड़े की लगाम ढीली छोड़ दी। उनका रथ वायु के वेग से बातें कर रहा था।
गांव के बाहरी इलाके में, एक वृद्ध किसान, जिसका नाम रामदीन था, अपनी पूरे वर्ष की फसल को बैलगाड़ी पर लादकर मंडी ले जा रहा था। वह फसल ही उसके परिवार के साल भर के भोजन और उसकी बेटी के विवाह का एकमात्र सहारा थी।
अचानक, एक तीखे मोड़ पर युवराज का अनियंत्रित रथ रामदीन की बैलगाड़ी से टकराया। टक्कर इतनी भीषण थी कि बैलगाड़ी के परखच्चे उड़ गए, दोनों बैल गंभीर रूप से घायल हो गए और रामदीन का पैर रथ के पहिये के नीचे कुचल गया।
युवराज के मित्रों ने मामला रफा-दफा करने की कोशिश की। उन्होंने रामदीन की ओर स्वर्ण मुद्राओं की एक थैली फेंकी और वहां से भाग निकले। युवराज ने एक पल के लिए पीछे मुड़कर देखा, उनकी आँखों में भय था, लेकिन वे रुके नहीं। वे राजमहल की सुरक्षा में लौट आए।

 दरबार में सन्नाटा
अगले दिन महाराज विक्रमजीत का दरबार लगा। फरियादियों की कतार में सबसे पीछे बैसाखी के सहारे खड़ा एक व्यक्ति था—रामदीन।
जब रामदीन ने अपनी व्यथा सुनाई, तो पूरे दरबार में सन्नाटा छा गया। उसने किसी सामान्य नागरिक पर नहीं, बल्कि भावी राजा, युवराज अभयसिंह पर आरोप लगाया था। उसने बताया कि कैसे युवराज के अहंकार और लापरवाही ने उसकी जीविका और शरीर दोनों को नष्ट कर दिया, और वे उसे मरने के लिए छोड़कर भाग गए।
महामंत्री ने संकोच करते हुए कहा, "महाराज, संभव है कि यह एक दुर्घटना हो। युवराज अभी युवा हैं, उनसे भूल हो सकती है।"

महाराज विक्रमजीत का चेहरा पत्थर की तरह सख्त था। उन्होंने युवराज को दरबार में तलब किया। अभयसिंह आए, उनका सिर झुका हुआ था। जब महाराज ने प्रश्न किया, तो युवराज ने स्वीकार किया कि रथ वही चला रहे थे और भय के कारण वे वहां से भाग आए थे।
अपराध सिद्ध हो चुका था। अब बारी थी दंड की।

 पिता बनाम राजा
उस रात महाराज विक्रमजीत की आंखों में नींद नहीं थी। वे अपने कक्ष में टहल रहे थे। तभी महारानी सुनयना वहां आईं। उनकी आंखों में आंसू थे।
"स्वामी," महारानी ने कांपते हुए स्वर में कहा, "अभय हमारा एकमात्र पुत्र है। वह इस राज्य का भविष्य है। यदि आप उसे कठोर दंड देंगे, तो प्रजा क्या कहेगी? क्या एक दुर्घटना के लिए भावी राजा को अपराधी माना जाएगा? उसे क्षमा कर दीजिये। हम रामदीन को उसके नुकसान से सौ गुना अधिक धन दे देंगे।"
महाराज ने महारानी के आंसुओं को पोंछा, लेकिन उनका स्वर अडिग था।

"सुनयना," महाराज ने कहा, "एक पिता के रूप में मेरा हृदय फट रहा है। मैं चाहता हूं कि उसे गले लगा लूं और कहूं कि कोई बात नहीं। लेकिन मैं एक क्षत्रिय हूं और इस सिंहासन पर बैठा राजा हूं। एक क्षत्रिय का धर्म केवल शत्रुओं से रक्षा करना नहीं है, बल्कि अपनी ममता का गला घोंटकर न्याय की रक्षा करना भी है।"
उन्होंने आगे कहा, "यदि आज मैंने अपने पुत्र को बचा लिया, तो कल मेरा कोई भी सामंत या सैनिक किसी गरीब को कुचलकर चला जाएगा और कहेगा कि जब राजा का बेटा बच सकता है, तो हम क्यों नहीं? उस दिन अवंतिकापुरी का 'न्याय' मर जाएगा। और जिस राज्य में न्याय मर जाता है, वहां का राजा जीवित होकर भी मुर्दा है।"

 राजधर्म का निर्णय
अगली सुबह, दरबार खचाखच भरा हुआ था। हर किसी के मन में यही प्रश्न था—क्या एक पिता अपने पुत्र को दंड देगा?
महाराज विक्रमजीत सिंह सिंहासन पर बैठे। उनकी आवाज़ में न कंपन था, न ही कोई हिचकिचाहट।
उन्होंने घोषणा की:
"युवराज अभयसिंह ने दो अपराध किए हैं। पहला, एक निरीह प्रजा की आजीविका और शरीर को क्षति पहुंचाना। दूसरा, और उससे भी बड़ा अपराध—अपनी जिम्मेदारी से भागना। एक क्षत्रिय 'रक्षक' होता है, 'भक्षक' नहीं। जो अपनी प्रजा को घायल अवस्था में छोड़कर भाग जाए, वह राजा बनने योग्य नहीं है।"
दरबार में सांसें थम गईं।

महाराज ने अपना निर्णय सुनाया
"मैं, राजा विक्रमजीत सिंह, युवराज अभयसिंह को उनके पद से निष्कासित करता हूं। उन्हें अगले तीन वर्षों तक सामान्य नागरिक का जीवन व्यतीत करना होगा। उन्हें अपने हाथों से श्रम करना होगा। और चूंकि उन्होंने रामदीन को अपाहिज किया है, इसलिए अगले तीन वर्षों तक वे रामदीन के घर में एक सेवक की भांति रहेंगे, उसकी खेती करेंगे और उसके परिवार का भरण-पोषण करेंगे। राजकोष से उन्हें एक भी मुद्रा नहीं मिलेगी।"
महारानी बेहोश हो गईं। मंत्री स्तब्ध रह गए। लेकिन प्रजा की आंखों में आंसू और हाथ आदर में जुड़ गए।

 प्रायश्चित और परिवर्तन
यह दंड केवल एक सजा नहीं थी, यह एक भट्ठी थी जिसमें तपकर अभयसिंह को कुंदन बनना था।
पहले कुछ महीने युवराज के लिए नरक समान थे। छाले पड़ गए हाथों से हल चलाना, धूप में जलना और रूखा-सूखा खाना। लेकिन धीरे-धीरे, उन्हें उस पसीने की कीमत समझ में आने लगी जो एक किसान अपनी फसल उगाने में बहाता है। उन्हें समझ आया कि जब फसल बर्बाद होती है, तो दिल पर क्या गुजरती है।
रामदीन के परिवार ने पहले तो डर के मारे उनसे बात नहीं की, लेकिन अभयसिंह के सेवाभाव और पश्चाताप ने उनका दिल जीत लिया। तीन साल बाद, जब अभयसिंह वापस लौटे, तो वे अब वह अहंकारी राजकुमार नहीं थे। उनकी त्वचा धूप से झुलसी थी, लेकिन आंखों में एक ऐसा तेज था जो महलों में रहने से नहीं आता।

असली क्षत्रिय
तीन वर्ष बाद जब अभयसिंह दरबार में लौटे, तो महाराज विक्रमजीत ने सिंहासन से उतरकर उन्हें गले लगा लिया।
महाराज ने भरी सभा में कहा, "तीन साल पहले, मेरे पास केवल एक पुत्र था जो अज्ञानी था। आज, मेरे पास एक ऐसा उत्तराधिकारी है जो जानता है कि एक दाना उगाने में कितना कष्ट होता है। अब यह राज्य सुरक्षित है, क्योंकि अब इसका राजा वह है जिसने 'पीड़ा' को भोगा है।"

क्षत्रिय होने का अर्थ केवल उच्च कुल में जन्म लेना नहीं है। क्षत्रिय वह है जो अपने 'स्व' से ऊपर उठकर 'सर्व' के लिए सोच सके। महाराज विक्रमजीत ने सिद्ध किया कि एक राजा के लिए उसका राजधर्म, उसके रक्त संबंधों से कहीं ऊपर होता है। यही वह त्याग है, जो एक साधारण शासक को 'महानायक' बनाता है।
ब्लॉग पाठकों के लिए एक विचार
आज के दौर में हम राजा नहीं हैं, लेकिन हम सभी के पास अपने-अपने कर्तव्य हैं। कई बार हमारे सामने भी ऐसी स्थिति आती है जब हमें 'सही' और 'प्रिय' में से किसी एक को चुनना होता है। महाराज विक्रमजीत की कहानी हमें याद दिलाती है कि जब हम कठिन रास्ता चुनते हैं और ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाते हैं, तो अंततः वही हमारे चरित्र की असली जीत होती है। सदैव क्षत्रिय धर्म का पालन परिस्थितियां चाहे कैसी भी हों। 
दोस्तों आपको आज की कहानी कैसे लगी हमें कमेंट में बताएं। 

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