खेत दरक चुके थे, कुएं सूखकर पाताल से बातें करने लगे थे और पशु-पक्षी प्यास से दम तोड़ रहे थे। इस संकट की घड़ी में राजकोष खाली हो रहा था क्योंकि अन्न बाहर से मंगवाना पड़ रहा था। इसी बीच, पड़ोसी राज्य 'दुर्गपुर' के महत्वाकांक्षी राजा दुर्जन सिंह ने चंद्रगढ़ की इस कमजोरी का फायदा उठाने की योजना बनाई। उसने संदेश भिजवाया—"या तो चंद्रगढ़ हमारी अधीनता स्वीकार करे, या युद्ध के लिए तैयार रहे।"
महाराजा महेंद्र प्रताप चिंतित थे। उनकी सेना भूख से कमजोर हो चुकी थी। ऐसे में युद्ध का अर्थ था निश्चित विनाश। तभी राजसभा में महाराजा के छोटे पुत्र, राजकुमार विक्रम ने प्रवेश किया। विक्रम अन्य राजकुमारों की तरह केवल शस्त्र विद्या में ही निपुण नहीं थे, उन्हें स्थापत्य कला और जल-संरक्षण के प्राचीन ग्रंथों का गहरा ज्ञान था।
एक कठिन संकल्प
विक्रम ने सिंहासन के सामने झुककर कहा, "पिताजी, युद्ध समस्याओं का समाधान नहीं, बल्कि समस्याओं की जननी है। मुझे केवल एक माह का समय दें। यदि मैं इस सूखे का समाधान निकाल सका, तो हमें न झुकना पड़ेगा और न ही लड़ना पड़ेगा।"
दरबार में कानाफूसी होने लगी। सेनापति ने उपहास उड़ाते हुए कहा, "राजकुमार, जब आसमान से आग बरस रही हो, तो किताबी ज्ञान पानी नहीं बरसा सकता।" लेकिन महाराजा को अपने पुत्र की आँखों में एक अजीब सी चमक दिखी। उन्होंने अनुमति दे दी।
विक्रम ने राजसी वस्त्र त्याग दिए और साधारण धोती पहनकर राज्य के सबसे सूखे इलाके 'रेतीली घाटी' की ओर चल दिए। उनके साथ केवल चार वफादार साथी थे। उन्होंने गाँव-गाँव जाकर लोगों को इकट्ठा किया। लोग निराश थे, पर विक्रम ने उनके भीतर उम्मीद की लौ जलाई। उन्होंने कहा, "धरती माता ने हमें सदियों से पाला है, आज जब वह प्यासी है, तो क्या हम उसे छोड़ देंगे? पानी ऊपर से नहीं गिरेगा, पानी हमारे परिश्रम से नीचे से निकलेगा।"
पसीने से सींचा गया इतिहास
विक्रम ने पुराने नक्शों का अध्ययन किया था। उन्हें पता था कि पहाड़ियों के नीचे एक सुप्त जलधारा (Aquifer) बहती है, जो सदियों पहले मार्ग बदल चुकी थी। उन्होंने एक विशाल 'बावड़ी' (Stepwell) और नहरों का जाल बिछाने की योजना बनाई।
दिन-रात काम शुरू हुआ। राजकुमार खुद कुदाल लेकर मिट्टी खोदते। चिलचिलाती धूप में जब उनके हाथों में छाले पड़ जाते, तो वे उसे गंगाजल समझकर माथे से लगा लेते। उन्हें देखकर गाँव के युवा, वृद्ध और यहाँ तक कि महिलाएँ भी इस श्रमदान में जुड़ गईं। यह केवल एक निर्माण नहीं था, यह एक राज्य के पुनर्जन्म की तपस्या थी।
उधर, दुर्जन सिंह की सेना सीमा पर आ डटी थी। उसे खबर मिली कि राजकुमार विक्रम पागल हो गए हैं और रेगिस्तान में गड्ढे खोद रहे हैं। दुर्जन सिंह हँसा और बोला, "जो राजा लड़ने के बजाय मिट्टी ढो रहा हो, उसे हराना कैसा?" उसने आक्रमण की तिथि निश्चित कर दी।
जब प्रकृति ने शीश नवाया
काम पूरा होने में अभी तीन दिन शेष थे और दुर्जन सिंह की सेना चंद्रगढ़ के द्वार पर पहुँच चुकी थी। महाराजा महेंद्र प्रताप ने विक्रम को संदेश भेजा, "पुत्र, सीमा पर संकट है, वापस लौट आओ।"
विक्रम ने उत्तर भेजा, "पिताजी, बस दो दिन और। यदि मैं विफल रहा, तो मैं खुद रणभूमि में सबसे आगे खड़ा मिलूँगा।"
तभी एक चमत्कार हुआ। खुदाई के दौरान एक विशाल चट्टान टूटी और उसके भीतर से शीतल जल की एक प्रचंड धारा फूट पड़ी। वह सुप्त जलधारा मिल चुकी थी। देखते ही देखते सूखी बावड़ी पानी से लबालब भर गई। विक्रम ने उसे नहरों के माध्यम से खेतों तक पहुँचाने का द्वार खोल दिया।
अगली रात, जब काली घटाएँ छाईं (जो शायद श्रम के पसीने की गंध से प्रभावित होकर आई थीं), तो मूसलाधार वर्षा शुरू हो गई। विक्रम की बनाई नहरों ने उस वर्षा जल को भी सहेज लिया। चंद्रगढ़ की प्यासी धरती ने तृप्त होकर ऐसी हरियाली ओढ़ी कि लगा जैसे प्रकृति ने स्वयं उत्सव मनाया हो।
युद्ध के मैदान में शांति का संदेश
अगली सुबह, जब दुर्जन सिंह अपनी विशाल सेना के साथ किले पर हमला करने बढ़ा, तो उसने देखा कि चंद्रगढ़ के सैनिक तलवारें लेकर नहीं, बल्कि हाथों में कलश और फूल लेकर खड़े हैं। खुद राजकुमार विक्रम घोड़े पर सवार होकर दुर्जन सिंह के सामने पहुँचे।
दुर्जन सिंह ने तलवार म्यान से बाहर निकाली और गरजकर कहा, "युद्ध के लिए तैयार हो, राजकुमार?"
विक्रम ने शांत स्वर में कहा, "महाराज दुर्जन सिंह, युद्ध तो अभाव में लड़ा जाता है। चंद्रगढ़ के पास अब अभाव नहीं है। हमने वह जलधारा खोज ली है जो आपके राज्य दुर्गपुर की ओर भी जाती थी, जिसे आपके पूर्वजों ने पत्थरों से ढक दिया था। यदि आप युद्ध करते हैं, तो लाशें गिरेंगी। यदि आप संधि करते हैं, तो हम मिलकर इस जलधारा को आपके सूखे राज्य तक भी पहुँचाएंगे।"
दुर्जन सिंह स्तब्ध रह गया। उसने देखा कि चंद्रगढ़ के लोग भूखे-प्यासे नहीं थे, बल्कि उनके चेहरों पर एक नई चमक और स्वाभिमान था। उसे अहसास हुआ कि एक सच्चा राजा वह नहीं जो जमीन जीतता है, बल्कि वह है जो अपने लोगों का जीवन जीतता है।
उसने अपनी तलवार नीचे झुका दी और कहा, "राजकुमार, मैंने सुना था कि शूरवीर केवल रक्त बहाते हैं, आज पहली बार देखा कि शूरवीर मरुस्थल में हरियाली भी ला सकते हैं।"
कहानी से सीख
चंद्रगढ़ की यह कहानी हमें सिखाती है कि नेतृत्व केवल आदेश देने का नाम नहीं है, बल्कि संकट के समय सबसे आगे खड़े होकर रास्ता बनाने का नाम है। राजकुमार विक्रम ने शस्त्रों के बजाय 'सृजन' को चुना।
आज के युग में हमारे सामने कई चुनौतियाँ हैं—पर्यावरण, मानसिक स्वास्थ्य या करियर की बाधाएं। हमें भी विक्रम की तरह अपनी 'आंतरिक जलधारा' को खोजने की जरूरत है। याद रखिए, जब इरादों में सच्चाई और पसीने में ईमानदारी होती है, तो पत्थर से भी पानी निकल आता है और शत्रु भी मित्र बन जाते हैं।
इस कहानी से मिलने वाली शिक्षा:
बुद्धि बल, शारीरिक बल से श्रेष्ठ होता है।
नेतृत्व (Leadership) का अर्थ है स्वयं उदाहरण पेश करना।
संसाधन हमारे पास ही होते हैं, बस उन्हें खोजने की दृष्टि चाहिए।
तो दोस्तों आज की कहानी आपको कैसी लगी हमें कमेंट करके जरूर बताएं हम ऐसी ही प्रेरणादायक कहानियां आप सभी तक पहुंचाते रहेंगे। 🙏❤️
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