भारतीय इतिहास और पुराणों में कई ऐसे वंशों का वर्णन मिलता है, जो आज भौगोलिक सीमाओं के बदलने के कारण विस्मृत हो गए हैं। ऐसा ही एक इतिहास है गंधर्व जाति और द्विस फेतर जाति का, जिनका संबंध सीधा महर्षि कश्यप से है।
1. द्विस फेतर जाति (वनस्पतियों के अधिपति)
यह जाति महर्षि कश्यप और उनकी पत्नी काष्टा की संतानों से चली। इतिहास में इनके विषय में बहुत अधिक विवरण तो प्राप्त नहीं होता, किन्तु पुराणों में 'द्विस फेतर जाति' को वनस्पतियों का अधिपति कहा गया है। इनका संबंध प्रकृति और वन-संपदा से गहरा रहा है।
2. गंधर्व जाति (गांधार के योद्धा)
महर्षि कश्यप की पत्नी अरिष्टा से 'गंधर्व' नाम का पुत्र पैदा हुआ। इसी गंधर्व के वंशधरों से गंधर्व जाति का विकास हुआ।
भौगोलिक विस्तार: भारत की पश्चिमोत्तर सीमा पर (जहाँ आज अफरीदी, बलूची और काबुली पठान रहते हैं) प्राचीन काल में 'गांधार देश' था। इसी गांधार वंश की कन्या गांधारी (कौरवों की माता) थीं। प्राचीन गांधार को ही आज कंधार कहा जाता है।
शारीरिक संरचना: पुरातन लेखों के अनुसार गंधर्व जाति के लोग महा-बलशाली और विशाल डील-डौल वाले होते थे। आज भी उस क्षेत्र (काबुल/पठान) के लोगों की शारीरिक कद-काठी और शक्ति सामान्य से अधिक होती है, जिसका मुख्य कारण वहाँ की जलवायु है।
गुण और कौशल: प्राचीन गंधर्व केवल योद्धा ही नहीं थे, बल्कि वे संगीत, नृत्यकला और अश्वारोहण (घुड़सवारी) में भी निपुण थे। देवराज इन्द्र के दरबार से लेकर पृथ्वी के अनेक राज्यों तक इनका सम्मान था।
क्षत्रिय से 'अफगान' बनने का सफर
कालान्तर में गंधर्व लोग पठानवंशी क्षत्रिय बन गए। महाभारत काल तक इनका आर्यों के साथ रोटी-बेटी का सम्बन्ध बना रहा।
जब ये क्षत्रिय थे, तभी चन्द्रवंशियों की प्राचीन राजधानी प्रतिष्ठानपुर (झूँसी) से चन्द्रवंश की एक शाखा जाकर इन पाठन क्षत्रियों में मिल गई।
बाद में आई इस नई शाखा को "अपगण" (अर्थात बाद में आये हुए) कहा जाने लगा।
इन्होंने वहाँ प्रजा सत्तात्मक शासन स्थापित किया। 'अपगण' शब्द ही कालान्तर में बदलते-बदलते 'अफगण' और फिर 'अफगान' हो गया, जिससे उस देश का नाम अफगानिस्तान पड़ा।
ईसा की पाँचवी शताब्दी के बाद, समय के चक्र और परिस्थितियों के कारण इन लोगों ने इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया।
गंधर्व वंश की 28 प्रमुख शाखाएं
पुराणों में गंधर्वों के 28 नाम और शाखाओं का उल्लेख मिलता है, जो इस प्रकार हैं:
तुम्बरू, 2. भीमसेन, 3. उग्रसेन, 4. अर्णायु, 5. अनध, 6. गोपति, 7. धृतराष्ट्र, 8. सूर्यवर्चा, 9. युगप, 10. तृणप, 11. काणि, 12. नन्दि, 13. चित्ररथ, 14. शालिशिरा, 15. पर्जन्य, 16. कलि, 17. नादे, 18. ऋत्वा, 19. वृहत्वा, 20. वृहक, 21. कराल, 22. सुवर्ण, 23. विश्वावसु, 24. भूमन्यु, 25. सुचन्द्र, 26. शरू, 27. संगीतज्ञ (इसकी दो उपशाखाएं हुईं- हाहा और हूहू)।

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