Tuesday, August 8, 2023

प्राचीन भारतीय इतिहास के दो महान वंश: नाग और गरुड़ - पौराणिक कथा और ऐतिहासिक यथार्थ


यह लेख भारतीय प्राचीन इतिहास के दो प्रमुख और रहस्यमय वंशों, नाग (Naga) और गरुड़ (Garuda) के उद्भव, विस्तार और आपसी संघर्ष पर एक विशिष्ट दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। इन वंशों को अक्सर पुराणों में सर्प और पक्षी के रूप में चित्रित किया गया है, लेकिन यहाँ उन्हें मानव समुदायों/वंशों के रूप में देखा गया है जिनके विशाल राज्य थे।

1. नाग वंश का उद्भव और विस्तार
पुराणों के अनुसार, नागों की उत्पत्ति ऋषि कश्यप और उनकी पत्नी क्रोधदशा (या कद्रू) से हुई मानी जाती है। ये ही नागवंशी कहलाए।
शाखाएँ और मूल पुरुष:
माना जाता है कि नागवंश आगे चलकर सात मुख्य शाखाओं में विभाजित हुआ, जिनके मूल पुरुष इस प्रकार थे:



भौगोलिक विस्तार और ऐतिहासिक दावे:
तुर्किस्तान (नाग लोक): यह दृष्टिकोण प्रस्तावित करता है कि वर्तमान तुर्किस्तान का प्राचीन नाम नाग लोक था और तुर्क लोग (जैसे सवासक) संभवतः नागवंशी थे, जिनके उपनाम शेष और वासुकी नाग पर आधारित थे।
मध्य एशिया से पलायन: प्राचीन नाग वंश का मूल निवास स्थान उत्तरी तुर्किस्तान (जिसे पहले गिरगिस और फिर कम्बोज कहा गया) माना जाता है। गरुड़ वंशियों के आक्रमण के बाद, मुख्य नाग वंश को अपना नाग लोक छोड़कर क्षीर सागर (संभवतः अराल सागर) के क्षेत्र में विस्थापित होना पड़ा था।

भारत और पश्चिम एशिया में राज्य: कुछ संदर्भों के अनुसार, अश्वतर नाग का राज्य सिंधु के उत्तर में था। काबुल, यूसेफजाई, तोर्चारिस्तान और सीरिया के कुछ हिस्सों पर भी नागों का शासन रहा। सीरिया में इशहाक और अजदाहक परिवार का उल्लेख मिलता है, तथा ईलाम (Elam) में शेषनाग (Shashnok) परिवार का शासन 2400 ईसा पूर्व के आसपास बताया जाता है।

विष्णु और शेषनाग:
दावा है कि बाद में विष्णु वंशियों ने शेषनाग वंश पर अधिकार कर लिया, जिसके कारण विष्णु को शेषशायी कहा जाने लगा। विष्णु की दो राजधानियाँ थीं:
क्षीर सागर (नागों का निवास स्थान): संभवतः अरल सागर।
गिरेडीसिया / वैकुण्ठ धाम: संभवतः शुवा नगर, जहाँ गरुड़ वंशियों का निवास था।
नागों के उप-शाखाएँ:
सात मुख्य शाखाओं से बाद में कई उप-शाखाएँ बनीं जो पूरे विश्व में फैल गईं। इन उप-शाखाओं में एक कद्रू (नागों की माता) का भी वर्णन पुराणों में मिलता है।

2. नागों के भारतीय राज्य और महाभारत के बाद का काल
महाभारत युद्ध के बाद जब भारत में सत्ता का केंद्रीकरण कमजोर हुआ, तो नागवंशियों ने विभिन्न स्थानों पर अपने स्वतंत्र राज्य स्थापित किए।
मथुरा और तक्षशिला: तैत्तिरीय आरण्यक के अनुसार, कृष्ण के द्वारका जाने और जरासंध की मृत्यु के बाद, नागों ने मथुरा पर अधिकार कर लिया। पंजाब में भी तक्षशिला सहित नागवंशियों ने अपने राज्य स्थापित किए।
प्रमुख नाग राजा/सेनानायक: वायु और ब्रह्म पुराणों में मथुरा और तक्षशिला के आसपास सात से ग्यारह नाग राज्यों का संकेत मिलता है। कुछ प्रमुख नाग राजाओं और सेनानायकों के नाम वासुकि, कालदंतक (तक्षक वंश), शिशुरोम, महाहनु और महानाग आदि थे।
परीक्षित और जन्मेजय का युद्ध:
ऐतिहासिक दृष्टिकोण में, राजा परीक्षित का युद्ध तक्षकों/नागों से हुआ था, जिसमें परीक्षित की मृत्यु हुई। उनके पुत्र जनमेजय ने युद्ध में नागों को पराजित किया।

💡 एक वैकल्पिक व्याख्या: यह दृष्टिकोण मानता है कि राजा परीक्षित को तक्षक द्वारा डसने और जन्मेजय द्वारा नागों को अग्निकुंड में जलाने की पौराणिक कथाएँ बाद में काल्पनिक आधार पर गढ़ी गईं। कुछ विद्वान मानते हैं कि जनमेजय से हारकर कुछ नागवंशी असम की ओर भागे, जहाँ उन्हें अब नागा कहा जाता है, हालाँकि इसका स्पष्ट प्रमाण नहीं है।

3. गरुड़ वंश तथा जटायु वंश
गरुड़ वंश की उत्पत्ति भी ऋषि कश्यप और उनकी पत्नी ताम्रा (या विनता) से मानी जाती है।
शाखाएँ:
गरुड़ के वंशजों की छह मुख्य शाखाएँ बताई जाती हैं:
गरुड़ वंशी
तार्क्ष्य गरुड़
अरिष्ट नेमि गरुड़
असित ध्वज गरुड़
अरुण तथा आरुणि गरुड़
जटायु वंशी गरुड़
विष्णु और गरुड़:
पुराणों में विष्णु के गरुड़ वाहन का वृत्तांत प्राप्त होता है। यह तर्क दिया जाता है कि बाद की पीढ़ियों (संभवतः 22वीं या 23वीं पीढ़ी) के विष्णु ने इन वंशों को अपने अधीन किया। गरुड़ वैकुण्ठ धाम (गिरेडीसिया) में विष्णु की सेवा करते थे।

नाग-गरुड़ शत्रुता:
नाग और गरुड़ वंशियों के बीच घोर शत्रुता थी। इसी कारण विष्णु को दो राजधानियाँ (नागों के लिए क्षीर सागर और गरुड़ों के लिए वैकुण्ठ) स्थापित करनी पड़ी थीं।

जटायु का भारत आगमन:
गरुड़ों की एक शाखा, जटायु वंश, भारत आई और दक्षिणी तटों पर बस गई।
जटायु और राम: रामायण के अनुसार, जटायु (गरुड़ वंश की 36वीं या 40वीं पीढ़ी के पुरुष) ने सीता हरण के दौरान रावण से युद्ध किया था। जटायु राम के ही वंशज (कश्यप वंश) थे, इसलिए उन्होंने अपनी कुलवधू सीता की रक्षा के लिए युद्ध किया।

4. निष्कर्ष: पौराणिक रहस्यवाद बनाम ऐतिहासिकता
इस विशिष्ट अध्ययन का निष्कर्ष है कि नाग और गरुड़ वंशों को पुराणों के भाष्यकारों ने क्रमशः साँप और पक्षी मानकर प्रतीकात्मक कथाएँ लिख डाली हैं, जिससे समाज में अंधविश्वास गहरा होता गया।

💡 मौलिक दावा: ये वास्तव में कश्यप के वंशधर मनुष्य थे। इनका मुख्य निवास वर्तमान अफगानिस्तान के उत्तर में मुख्य तुर्किस्तान के उत्तरी मैदानों में था। आज के समय में, इन वंशों के लोग ईसाई या मुस्लिम धर्म अपनाकर अपना नाम बदल चुके हैं।
यह दृष्टिकोण पौराणिक आख्यानों के रहस्यों को ऐतिहासिक और भौगोलिक प्रमाणों (जैसे पर्शिया का इतिहास) के आधार पर समझने का प्रयास करता है, और इस बात पर जोर देता है कि पुराणों में वर्णित कथाओं में ऐतिहासिक आधार के अंश सुरक्षित हैं।

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