हम इस प्रचलित कथा को यथार्थता के निकट मानते हैं, परंतु इसकी जन्म प्रक्रिया को पुरुष-स्त्री संसर्ग के बिना स्वयं उत्पन्न होने का 'कल्पित रूपक' कहकर रहस्यमय बना दिया गया है। इस संदेह को दूर करने और इस गाथा का ऐतिहासिक आधार समझने के लिए, हमें विष्णु की पृष्ठभूमि पर विचार करना होगा।
1. विष्णु का मूल निवास और करतार वंश
पुरातन लेखों का सूक्ष्म विश्लेषण यह बताता है कि विष्णु की उत्पत्ति एक विशिष्ट वंश और स्थान से हुई थी:
मूल निवास: विष्णु क्षीर सागर के निवासी थे, जिसे पुरातन लेखों के अनुसार वर्तमान अराल सागर (Aral Sea) कहा जाता था। यह स्थान कैस्पियन सागर के पूर्वोत्तर में है, जो कभी नागवंशियों का निवास स्थान था।
वंश: यह क्षेत्र चाक्षुष मनु के पुत्र महाराज 'उर' के राज्य में आता था। उर के वंशजों की तीन शाखाओं में से, विष्णु का जन्म करतार नामक स्थान (संभवतः वर्तमान कतार/क़तर) के समीप रहने वाले 'करतार वंश' में हुआ था।
वीर्यवान योद्धा: विष्णु केवल एक देवता नहीं, बल्कि एक महान शौर्यवान, प्रतिभाशाली, और अजेय योद्धा थे। उन्होंने अराल सागर के नागवंश और गहण वंशियों को पराजित कर अपना विशाल राज्य स्थापित किया।
पदवी: विष्णु के वंशज भी 'विष्णु' कहलाते थे। उन्हें आज भी 'कर्ता' की उपाधि से संबोधित किया जाता है। पुरातन ग्रंथों में प्रथम विष्णु से लेकर इस वंश की 45 पीढ़ियों तक का उल्लेख मिलता है, जिसका अस्तित्व त्रेता युग में रावण के काल तक रहा।
लंका विजय: रावण काल से पहले, इसी विष्णु वंश के 44वें विष्णु ने लंका पर आक्रमण कर उसके संस्थापक हेति और प्रहेति नामक दैत्य राजाओं को पराजित किया था।
2. ब्रह्मा की उत्पत्ति: विष्णु वंश की एक शाखा
ब्रह्मा की उत्पत्ति विष्णु की नाभि से कमल निकलने की पौराणिक कथा को ऐतिहासिक वंश वृक्ष से समझा जा सकता है:
उत्पत्ति का क्रम: प्रथम विष्णु की पाँचवी पीढ़ी में जन्मे विष्णु के पुत्र का नाम नाभि विष्णु करतार था। नाभि विष्णु के पुत्र कमल करतार हुए, और कमल करतार से ब्रह्मा करतार की उत्पत्ति हुई।
काल: ब्रह्मा की उत्पत्ति का समय सतयुग और त्रेता युग का संधिकाल माना जाता है, जिसका अनुमान ईसा पूर्व 3000 वर्ष है।
3. वेद रचना और 'चतुरानन' की उपाधि
वेद धारी: ब्रह्मा करतार ने वेदों की ऋचाओं को अपनी स्मृति में रखा और उनका संकलन किया, जिससे वे 'वेद धारी' कहलाए।
चतुरानन का प्रतीक: उन्हें चार मुखों वाला (चतुरानन) कहा जाता है, जो वास्तव में उनके चारों वेदों को धारण और संकलन करने का प्रतीक है, न कि शाब्दिक रूप से चार मुखों का होना।
4. ब्रह्मा के मानस पुत्र और क्षत्रिय वंश
ब्रह्मा के दस पुत्रों का उल्लेख मिलता है, जिन्हें उनका 'मानस पुत्र' भी कहा गया है (अर्थात 'माना हुआ पुत्र' या 'इच्छा मात्र से उत्पन्न')।
क्षत्रिय वंश की नींव: ब्रह्मा के पुत्रों ने ब्राह्मणत्व धारण नहीं किया, बल्कि वे स्वायंभुव मनु की पत्नी सतरूपा के नाम पर शत्रिपी या क्षत्रप कहलाए, जो कालान्तर में क्षत्रिय के रूप में विख्यात हुए।
तीन मुख्य शाखाएँ: ब्रह्मा के वंशधरों की तीन मुख्य शाखाएँ विश्व के विभिन्न भागों में फैली:
शाकद्वीपीय: ईरान में।
सिंघल द्वीपीय: आन्त्रालय (ऑस्ट्रेलिया) और पूर्वी एशिया में।
जम्बू द्वीपीय: शाकद्वीप और आन्ध्रालय के मध्यवर्ती भाग (आर्यावर्त) में।
मरीचि वंश: ब्रह्मा के पुत्र मरीचि की शाखा सबसे महत्वपूर्ण हुई। मरीचि का विवाह राजा दक्ष की पुत्री कला से हुआ था।
अत्रि: मरीचि के पुत्र अत्रि से चन्द्र वंश का आरंभ हुआ। (यह उस अत्रि से भिन्न थे, जो राम के समकालीन थे।)
कश्यप: मरीचि के दूसरे पुत्र कश्यप से सूर्यवंश की प्रतिष्ठा हुई।
इस प्रकार, मरीचि सूर्यवंश और चंद्रवंश दोनों की मूल 'शिखा' बन गए।
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