Wednesday, August 2, 2023

🌎 कश्यप वंश और देवों के साम्राज्य का विमर्श


यह खंड ब्रह्मा के पौत्र और मरीचि के पुत्र महान प्रजापति कश्यप से आरंभ होने वाले विशाल वंश, उनके साम्राज्य की सीमाओं और उनके वंशजों (देवों, दैत्यों, दानवों) के बीच हुए महासंग्रामों का ऐतिहासिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
1. कश्यप: महाविजेता और प्रजापति
भौगोलिक प्रभुत्व: कश्यप का मूल निवास कश्यपी प्रदेश था, जो वर्तमान में कैस्पियन सागर (Caspia Province) के नाम से विख्यात है। यह सागर ईरान के उत्तर और काला सागर के पूर्व में स्थित है। कश्यप इस विशाल क्षेत्र के अधिपति थे, जिसके साम्राज्य में आधुनिक तेहरान, बगदाद, बाकू, बुखारा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र सम्मिलित थे।
प्रताप और पदवी: कश्यप अपने समय के महाविजेता, शौर्यवान और प्रजापालक थे। उनकी उत्कृष्ट राज्य व्यवस्था के कारण उन्हें एक अवतार मान लिया गया, जिन्हें संभवतः पुराणों में कच्छप अवतार कहा गया है। उन्हें प्रजापति की उपाधि मिली, क्योंकि उनके द्वारा कई विशाल वंशों और जातियों की नींव रखी गई।
तेरह पत्नियाँ और वंश: कश्यप का विवाह दक्ष वंश की तेरह कन्याओं से हुआ, और प्रत्येक पत्नी से एक भिन्न जाति का उदय हुआ:
अदिति: इनसे आदित्य या सूर्य उत्पन्न हुए, जिससे सूर्यवंश चला।
दिति: इनसे देव और दैत्य नामक दो पुत्र हुए।
दनु: इनसे दानव वंश चला।
अन्य पत्नियाँ: काष्टा, अरिष्टा, सुरसा, इड़ा, मुनी, क्रोधवशा, ताम्रा, सुरभी, सरमा, और तिमि—इनसे शेष जातियाँ बनीं।
2. देव वंश का उदय और इंद्र की प्रतिष्ठा
कश्यप की पत्नी दिति के पुत्र देव के नाम पर ही देव वंश की स्थापना हुई।
देव वंश का संस्थापक: इंद्र प्रथम ने देव वंश की स्थापना की और उसका प्रथम सम्राट बना। इंद्र ने अपने राज्य का विस्तार किया और उसकी मुख्य गद्दी को इन्द्रासन कहा गया। इस गद्दी पर पीढ़ी-दर-पीढ़ी बैठने वाले सभी उत्तराधिकारी भी इंद्र ही कहलाते थे।
मरुत गण: दिति के पुत्र देव से मरुत गण भी उत्पन्न हुए। ये पहले एक अलग वंश था, जिसकी 49 शाखाएँ थीं, लेकिन बाद में ये देवों के प्रभाव में आकर देव कहलाने लगे।
इंद्र का साम्राज्य: इंद्र का राज्य मुख्य रूप से एलाम (ईरान) नामक स्थान पर था, जिसे देव लोक कहा जाता था। उन्होंने सप्त सिंधु (पंजाब और सिंध) तक अपने राज्य का विस्तार किया।
3. देवों और असुरों का द्वंद्व
यह इतिहास बताता है कि असुर और देव शुरुआत में एक-दूसरे से भिन्न नहीं थे, बल्कि बाद में मतभेदों के कारण अलग हुए।
असुरों का मूल: प्राचीन वैदिक साहित्य में, इंद्र, वरुण जैसे प्रमुख आदित्यों को भी पहले असुर कहा जाता था।
देवों में विलय: वैदिक काल में इंद्र ने इन आदित्यों की संज्ञा बदलकर देव रख दी, और स्वयं देवेन्द्र बन गया।
भौगोलिक साक्ष्य: इतिहासकार मेसोपोटामिया (सुमेर और अक्काड) में बसी सुमेरियन और सेमेटिक जातियों को इन प्राचीन देवों और असुरों से जोड़ते हैं।
संघर्ष के प्रमुख बिंदु:
वाराह अवतार की व्याख्या: राजा वाराह नामक आदित्य राजा ने ही हिरण्याक्ष दैत्य का वध किया था, जिसका वर्णन ऋग्वेद में है। पौराणिक भाष्यकारों ने इसे पृथ्वी के उद्धार के लिए वाराह अवतार के रूप में चित्रित किया।
नृसिंह अवतार की व्याख्या: राजा नृसिंह (जो सूर्य के पौत्र इक्ष्वाकु के छोटे भाई थे) ने हिरण्यकशिपु का वध किया। पुराणों ने इसे नृसिंह अवतार की कल्पना के रूप में प्रस्तुत किया।
अंतर्विरोध: ईसा पूर्व 10वीं शताब्दी के आस-पास ही देवों और असुरों को अलग समझा जाने लगा। मतभेद बढ़ने पर ईसा पूर्व 1300 के लगभग दोनों के बीच रोटी-बेटी (विवाह) का संबंध भी बंद हो गया।
देव साम्राज्य का अंत: असुर राजाओं ने लगातार युद्ध किए। असुर राजा मणिपाल ने ईसा पूर्व 648 में बेबीलोनिया और 645 में सुषा को जीतकर शाकद्वीप (ईरान) में देवों का राज्य और इन्द्रासन का अंत कर दिया। इस प्रकार, सुरों का यह साम्राज्य ईसा पूर्व 2400 से 345 तक चला।
4. धर्म, संस्कृति और आर्यों का आगमन
धर्म विभाजन: सुरों के प्रधान देव विष्णु थे, जबकि असुरों के उपास्य देव शिव थे (शैव धर्म)। धर्म और राजनैतिक विरोध के कारण ही दोनों में भारी अलगाव हुआ।
राम का सेतुबंध: दाशरथि राम ने इस नीति को समझते हुए रामेश्वरम में सेतुबंध के समय वैष्णव और शैव में कोई भिन्नता न होने की नीति स्पष्ट की। इससे रावण की रक्ष संस्कृति के उपासक राम के पक्ष में हो गए, जिससे राम ने रावण को मारकर आर्य सभ्यता को निष्कंटक बनाया।
देव धर्म का विस्तार: 'देव' पहले एक जाति थी, जो बाद में धर्म बन गई। इसने कई अदेव जातियों को सम्मिलित किया, जिनमें सूर्यवंश, चन्द्रवंश की शाखाएँ, अष्ट वसु, रुद्र शिव, विष्णु वंश और नाग वंश भी शामिल थे।
हिन्दू धर्म की स्थापना: देव धर्म पर वैदिक धर्म का प्रभाव था, और यही धर्म आर्यों के साथ आर्यावर्त में प्रचारित हुआ, जिससे हिन्दू धर्म की स्थापना हुई। बाद में ब्राह्मण धर्म की शाखा का उदय हुआ, जिसने क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र जातियों के बीच एक नई जाति के रूप में अपना प्रभाव स्थापित किया।

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