1. दैत्य वंश: ज्येष्ठता और प्राचीन सभ्यता
ऋषि कश्यप की ज्येष्ठ पत्नी दिति से दो पुत्र हुए: देव और दैत्य। दैत्य को उनकी माता के कारण कश्यप के सभी वंशजों में ज्येष्ठ माना गया।
मूल राज्य और विस्तार: दैत्यों का मूल निवास क्षेत्र काश्यप समुद्र (संभवतः कास्पियन सागर तट के आस-पास) था। इसी क्षेत्र में आदित्यों (अदिति के पुत्रों) और देवों के राज्य भी थे, जिसने तीनों वंशों के बीच संघर्ष की नींव रखी।
सभ्यता का विकास: पुरातत्ववेत्ता जिसे "हीलियोलिथिक" सभ्यता कहते हैं, वह दैत्यों की ही संस्कृति मानी जाती है। इस सभ्यता ने विभिन्न क्षेत्रों में विस्तार किया:
इसकी एक शाखा अमेरिका तक पहुँची, जहाँ इसने दानवों के साथ मिलकर 'मय सभ्यता' को जन्म दिया।
अन्य शाखाएँ मिस्र और मेसोपोटामिया में 'असुरों' के नाम से स्थापित हुईं।
दैत्य वंश के मुख्य स्तंभ:
हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष: ये दैत्य वंश के दो महान प्रतापी शासक थे, जिन्होंने कई देवताओं को हराकर अपने साम्राज्य का विस्तार किया।
प्रह्लाद का उदय: हिरण्यकश्यप के पुत्र प्रह्लाद ने श्री विष्णु जी की सहायता ली। इस संघर्ष में, राजा नृसिंह (नृग) ने हिरण्यकश्यप का वध किया। इसके बाद प्रह्लाद को बेबिलोनिया का शासक बनाया गया, पर अब वह देवताओं के अधीन एक करद राजा बन गया था।
लंका का निर्माण: प्रह्लाद के भाई हाद के पौत्र, हेति और प्रहेति नामक दो शक्तिशाली दैत्य बंधुओं ने सर्वप्रथम स्वर्ण लंका नगर की नींव रखी।
रावण का शासन:
इन दैत्यों के नष्ट होने के बाद, लंका सूनी पड़ गई। बाद में पुलस्त्य के पोते कुबेर ने लंका को बसाया। यह बात दैत्य सुमाली को सहन नहीं हुई। सुमाली ने अपनी चार पुत्रियों (कैकसी, कुम्भीनसी, राका, और पुष्पोत्कटा) का विवाह पुलस्त्य पुत्र वैश्रवा से कराया, जिससे रावण, कुम्भकर्ण, विभीषण और सूपर्णखा का जन्म हुआ। रावण में आर्य और दैत्य दोनों वंशों के संस्कार और शक्ति मौजूद थी। उसने कुबेर से लंका लेकर वहाँ 'रक्ष संस्कृति' स्थापित की।
चक्रवर्ती राजा बलि:
प्रह्लाद के पुत्र विरोचन के पुत्र राजा बलि अत्यंत अजेय, न्यायप्रिय और दानी थे। विष्णु ने छल से उन्हें बांधकर केरल (पौराणिक 'पाताल') में रहने को विवश किया। उनके पुरोहित महाविद्वान शुक्राचार्य थे।
2. दानव वंश: शौर्य, कला और वैवाहिक संबंध
ऋषि कश्यप की दूसरी पत्नी दनु से उत्पन्न पुत्र दनुज के वंशज दानव कहलाए। यह जाति अपनी वीरता और युद्ध कौशल के लिए प्रसिद्ध थी।
दानव वंश की प्रमुख शाखाएँ:
वीर योद्धा: दानव वंश में शंवर, तारक, विप्रचित्ति और वृषपर्वा जैसे अनेक शौर्यवान और महायोद्धा हुए।
कालिकेय: दनु की पुत्री कालिका से कालिकेय जाति की उत्पत्ति हुई, जो लंका के पूर्वाचल के द्वीपों में निवास करती थी। कालिकेय नेता विद्युजिन्ह का विवाह रावण की बहन सूपर्णखा से हुआ, लेकिन विवाद के कारण रावण ने उसका वध कर दिया।
शची और इंद्र: दनु की दूसरी पुत्री पुलोमी से उत्पन्न वंश की कन्या शची का विवाह देवराज इंद्र से हुआ था, जो अंतर-वंश विवाह संबंधों को दर्शाता है।
मय सभ्यता के निर्माता: दानव वंश के महान शिल्पकार 'मय' दानव थे। उनके वंशज अमेरिका में बसे और वहाँ 'मय सभ्यता' का प्रचार किया। इसी मयरिका को आज अमेरिका कहा जाता है।
राहु-केतु और अन्य वीर: दानव विप्रचित्ति का विवाह प्रह्लाद की बहन तिहिका से हुआ, जिनसे राहु-केतु, शल्य आदि प्रसिद्ध वीर उत्पन्न हुए।
3. सुर, असुर और खर जाति
सुर और असुर की संज्ञा: देवों और दानवों को सामूहिक रूप से सुर और दैत्य-दानवों को असुर कहा गया।
खर जाति का विस्तार: असुरों में से एक शक्तिशाली शाखा खर जाति की निकली। इन्होंने कई विशाल राज्य स्थापित किए और अपने नाम पर नगर बसाए, जैसे: खसान (खुरासान), खरक द्वीप, इष्ट खर, खरन प्रदेश, खर गिर्द, खरखर (असीरिया), और खरतम (मिस्र)।
विवाह संबंध: प्राचीन काल में दैत्य, दानव, देव और आर्यों में वैवाहिक संबंध होते थे। दानव वंश के वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा का विवाह चंद्रवंशी ययाति से हुआ था, जिससे पुरु, अनु और द्रह्म वंश का चलन हुआ।
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