Sunday, December 7, 2025

झूठ का अहंकार टूटा विश्वास और क्षमा की एक गौरव गाथा

बहुत समय पहले की बात है विंध्याचल की पहाड़ियों के बीच 'रत्नगढ़' नाम का एक वैभवशाली राज्य हुआ करता था। रत्नगढ़ के युवराज, कुंवर प्रताप सिंह, अपनी वीरता के साथ-साथ अपनी सौम्यता के लिए भी बहुत प्रसिद्ध थे। उनका व्यक्तित्व सूर्य के समान तेजस्वी था, जो सबके जीवन में प्रकाश भर देता था। प्रताप का एक बाल सखा था, जिसका नाम था—विक्रांत।

विक्रांत और प्रताप की मित्रता की मिसालें पूरे राज्य में दी जाती थीं। वे एक ही गुरु के आश्रम में पढ़े थे और एक ही थाली में भोजन करते थे। जहाँ प्रताप राजघराने के थे, वहीं विक्रांत मंत्री का पुत्र था। वह बुद्धिमान तो था, लेकिन उसके मन के किसी अंधेरे कोने में ईर्ष्या का एक बीज अंकुरित हो चुका था। उसे लगता था कि प्रताप को सब कुछ विरासत में मिला है, जबकि उसे अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। इसी हीन भावना ने धीरे-धीरे उसे कुटिल बना दिया था, लेकिन प्रताप के लिए उसका प्रेम और सम्मान का दिखावा इतना सजीव था कि कोई भी उसके असली चेहरे को पहचान नहीं सकता था।

कहानी में नया मोड़ तब आया जब रत्नगढ़ पर पड़ोसी राज्य ने गुप्तचरों के माध्यम से अशांति फैलाने की कोशिश की गई। महाराज ने राज्य की सुरक्षा को और पुख्ता करने के लिए सीमा पर एक अभेद्य किला, 'विजय-दुर्ग', बनवाने का निर्णय लिया। यह परियोजना राज्य के अस्तित्व के लिए महत्वपूर्ण थी। महाराज ने इस महती कार्य की जिम्मेदारी युवराज प्रताप को सौंपी।
प्रताप ने स्वाभाविक रूप से अपने सबसे विश्वासपात्र मित्र विक्रांत को इस परियोजना का मुख्य निरीक्षक (Chief Overseer) नियुक्त किया। प्रताप ने विक्रांत के कंधे पर हाथ रखकर कहा, "मित्र, यह दुर्ग केवल पत्थर और चूने की दीवार नहीं, बल्कि रत्नगढ़ का कवच है। मुझे तुम्हारी निष्ठा पर स्वयं से अधिक विश्वास है।"

विक्रांत के पास यह एक सुनहरा अवसर था—धन कमाने का भी और प्रताप की नजरों में महान बनने का भी। लेकिन उसके भीतर के लोभ ने उसे घेर लिया। उसने सोचा, "प्रताप तो राजधानी में व्यस्त रहेगा। अगर मैं निर्माण सामग्री में थोड़ी हेराफेरी कर लूं और बचा हुआ धन गुप्त रूप से अपने नाम कर लूं, तो मेरा भविष्य सुरक्षित हो जाएगा। किसी को कानों-कान खबर नहीं होगी।"
विक्रांत ने योजनाबद्ध तरीके से काम शुरू किया। उसने उच्च कोटि के पत्थरों की जगह कमजोर पत्थर मंगवाए और मजदूरों के वेतन का एक बड़ा हिस्सा हड़पना शुरू कर दिया। वह प्रताप को झूठी रिपोर्ट भेजता कि काम बहुत तेजी से और मजबूती से चल रहा है। जब भी प्रताप निरीक्षण के लिए आने वाला होता, विक्रांत पहले से ही सब कुछ व्यवस्थित कर देता। दीवारों पर ऐसा लेप चढ़वा देता कि वे नई और मजबूत दिखें।

विक्रांत का झूठ एक विशाल मकड़जाल बन चुका था। वह उस चुराए हुए धन से दूसरे राज्य में अपनी संपत्तियां खरीदने लगा। उसे अपने कपट पर इतना अहंकार हो गया था कि उसे लगने लगा कि सत्य को हमेशा के लिए दबाया जा सकता है। वह अक्सर मन ही मन हँसता कि कैसे उसने भोले राजकुमार को मूर्ख बनाया है।
लेकिन, नियति के अपने न्याय होते हैं। झूठ चाहे कितना भी चतुर क्यों न हो, सत्य की एक किरण उसके अस्तित्व को मिटाने के लिए काफी होती है।

एक दिन, मानसून पूर्व की भारी वर्षा हुई। मूसलाधार बारिश ने न केवल धरती की प्यास बुझाई, बल्कि विक्रांत के पापों की परतें भी उधेड़ दीं। 'विजय-दुर्ग' की पश्चिमी दीवार, जिसका निर्माण हाल ही में हुआ था और जिसे विक्रांत ने सबसे मजबूत बताया था, बारिश के दबाव को झेल न सकी और भरभराकर गिर पड़ी। दुर्भाग्य से, उस समय कुछ श्रमिक वहां काम कर रहे थे जो मलबे में दब गए।

समाचार राजधानी पहुँचा। प्रताप तुरंत घटनास्थल के लिए रवाना हुए। विक्रांत घबरा गया। उसने बचने की एक और चाल चली। उसने सारा दोष एक पुराने और ईमानदार वास्तुकार (Architect), पंडित दीनानाथ, पर मढ़ दिया। विक्रांत ने प्रताप से कहा, "युवराज! मैंने दीनानाथ को कई बार चेतावनी दी थी कि मिश्रण सही नहीं है, लेकिन उसने मेरी नहीं सुनी। यह उसकी लापरवाही का नतीजा है।"

प्रताप ने दीनानाथ को देखा। वृद्ध वास्तुकार की आँखों में आंसू थे, लेकिन वह मौन था क्योंकि विक्रांत ने उसे धमकी दी थी कि अगर उसने मुँह खोला तो उसके परिवार को नुकसान पहुँचाया जाएगा। प्रताप को कुछ खटका। वह जानता था कि दीनानाथ ने उनके पिता के समय में भी कई महल बनाए थे जो आज भी अडिग खड़े हैं।

प्रताप ने उस रात कोई निर्णय नहीं सुनाया। उन्होंने गुप्त रूप से वेश बदला और मलबे की जाँच करने स्वयं गए। उन्होंने टूटी हुई दीवार के पत्थरों को हाथ में उठाया। पत्थर इतने कच्चे थे कि हाथ के दबाव से ही भुरभुरा रहे थे। यह दीनानाथ की गलती नहीं, बल्कि जानबूझकर किया गया भ्रष्टाचार था। फिर प्रताप श्रमिक बस्ती में गए। वहां घायल मजदूरों ने, जो प्रताप को पहचान नहीं पाए, बताया कि कैसे "बड़े साहब" (विक्रांत) ने सस्ता सामान मंगवाया था और विरोध करने पर उन्हें काम से निकालने की धमकी दी थी।

सत्य, सूर्य की भांति बादलों को चीरकर बाहर आ चुका था। प्रताप का हृदय विदीर्ण हो गया। धन की चोरी का दुःख उन्हें नहीं था, दुःख इस बात का था कि जिस मित्र को उन्होंने अपनी परछाई माना, उसने राज्य की सुरक्षा और निर्दोष लोगों की जान के साथ खिलवाड़ किया।
अगले दिन राजसभा लगी। विक्रांत आत्मविश्वास से भरा हुआ था, उसे लगा कि दीनानाथ को बलि का बकरा बना दिया जाएगा। लेकिन प्रताप की आँखों में आज क्रोध नहीं, बल्कि गहरी पीड़ा थी।

प्रताप सिंह ने भरे दरबार में टूटी हुई दीवार का एक पत्थर विक्रांत के सामने मेज पर रखा। पत्थर रखते ही वह टूटकर बिखर गया। पूरे दरबार में सन्नाटा छा गया।
प्रताप ने शांत स्वर में पूछा, "विक्रांत, क्या हमारी मित्रता इस कच्चे पत्थर की तरह थी? जो जरा सा दबाव पड़ते ही बिखर गई?"

विक्रांत का चेहरा फक पड़ गया। प्रताप ने आगे कहा, "दीनानाथ निर्दोष हैं। मेरे गुप्तचरों ने उस व्यापारी को भी पकड़ लिया है जिसे तुमने चोरी का माल बेचा था। तुम्हारे द्वारा दूसरे राज्य में खरीदी गई हवेलियों के दस्तावेज भी मेरे पास हैं।

विक्रांत का झूठ आज पूरी तरह से पराजित हो चुका था। उसका अहंकार चकनाचूर हो गया। वह कांपने लगा। उसे अब अपने किए पर ग्लानि हो रही थी, लेकिन उससे ज्यादा उसे प्रताप की आँखों में देखने में शर्म आ रही थी। वह जानता था कि राजद्रोह के लिए उसे मृत्युदंड मिल सकता है।

विक्रांत, जो कभी सिर उठाकर चलता था, आज प्रताप के पैरों में गिर पड़ा। उसका कंठ रुंध गया था। "मुझे मार डालो प्रताप! मैं मित्र कहलाने योग्य नहीं हूँ। मेरे लालच ने मुझे अंधा कर दिया था। मैंने सिर्फ धन नहीं चुराया, मैंने तुम्हारे विश्वास की हत्या की है। मैं क्षमा का अधिकारी नहीं हूँ।" विक्रांत फूट-फूट कर रोने लगा।
दरबारियों को लगा कि युवराज अब मृत्युदंड की घोषणा करेंगे। प्रताप सिंहासन से उठे और धीरे-धीरे विक्रांत के पास आए। उन्होंने झुककर विक्रांत को कंधों से पकड़ा और उसे उठाया।

प्रताप ने उसकी आँखों में देखा और कहा, "विक्रांत, एक राजा के रूप में मुझे तुम्हें मृत्युदंड देना चाहिए। तुमने राज्य से गद्दारी की है। लेकिन..."
प्रताप कुछ क्षण रुके, फिर बोले, "लेकिन मैं उस मित्रता को मृत्युदंड नहीं दे सकता जो हमने बचपन से साझा की है। झूठ हार गया है विक्रांत, और तुम्हारी आँखों में बहते ये पश्चाताप के आंसू बता रहे हैं कि मेरा पुराना मित्र अभी भी कहीं जीवित है।"

"मैं तुम्हें क्षमा करता हूँ। लेकिन मेरी क्षमा तुम्हें मुक्त नहीं करेगी, तुम्हें खुद को मुक्त करना होगा।"
विक्रांत ने हैरान होकर प्रताप की ओर देखा।
प्रताप ने घोषणा की, "तुम्हारी सारी संपत्ति राजकोष में जब्त की जाएगी। और दंड स्वरूप, तुम अगले पांच वर्षों तक 'विजय-दुर्ग' के निर्माण स्थल पर एक सामान्य मजदूर की तरह काम करोगे। तुम अपने हाथों से एक-एक पत्थर रखोगे। जिस पसीने को तुमने चुराया था, अब वही पसीना तुम्हें बहाना होगा। जिस दिन यह दुर्ग बनकर तैयार होगा और मुझे विश्वास हो जाएगा कि इसमें तुम्हारी आत्मा की शुद्धता भी मिली है, उस दिन हमारी मित्रता पुनः पूर्ण होगी।"

यह दंड मृत्यु से भी कठिन था, लेकिन इसमें सम्मान की वापसी का एक मार्ग था। विक्रांत ने हाथ जोड़कर इसे स्वीकार किया।
अगले पांच वर्षों तक, रत्नगढ़ ने एक अद्भुत दृश्य देखा। वह व्यक्ति जो कभी मखमली वस्त्रों में घूमता था, अब तपती धूप में पत्थर ढो रहा था। विक्रांत ने केवल काम नहीं किया, उसने प्रायश्चित किया। उसने मजदूरों की सेवा की, उनका दर्द समझा और पूरी ईमानदारी से दुर्ग का निर्माण किया। उसके व्यवहार में ऐसा परिवर्तन आया कि मजदूर भी उसका सम्मान करने लगे।
पांच साल बाद, जब 'विजय-दुर्ग' बनकर तैयार हुआ, तो वह न केवल अभेद्य था, बल्कि वास्तुकला का एक बेजोड़ नमूना था। उद्घाटन के दिन, प्रताप सिंह ने दुर्ग के द्वार पर विक्रांत को गले लगाया।

प्रताप ने मुस्कुराते हुए कहा, "आज यह दीवार कभी नहीं गिरेगी, मित्र। क्योंकि इसमें अब झूठ की मिलावट नहीं, बल्कि सच्चे प्रायश्चित और परिश्रम की मजबूती है।"
विक्रांत की आँखों से आंसू बह निकले, लेकिन इस बार वे शर्म के नहीं, बल्कि कृतज्ञता के थे। उसने कहा, "तुमने मुझे सिर्फ क्षमा नहीं किया प्रताप, तुमने मुझे एक नया जीवन दिया। तुमने सिद्ध कर दिया कि प्रेम और क्षमा ही वह शक्ति है जो कपट को जड़ से मिटा सकती है।"
उस दिन के बाद, उनकी मित्रता और भी गहरी हो गई। यह मित्रता अब केवल बचपन की यादों पर नहीं, बल्कि 'परीक्षा' की आग में तपकर निकले 'विश्वास' के सोने पर टिकी हुई थी।

यह कहानी हमें सिखाती है कि झूठ की उम्र चाहे कितनी भी लंबी क्यों न लगे, अंततः उसका पराजित होना निश्चित है। लेकिन कहानी का सबसे बड़ा सबक यह है कि जब कोई सच्चा पछतावा करता है, तो उसे क्षमा कर देना उसे सजा देने से कहीं बड़ा कार्य है। क्षमा शत्रु को मित्र में और कपट को निष्ठा में बदलने की शक्ति रखती है।

प्रश्न:- अगर आप होते तो क्या अपने मित्र को क्षमा करते?
हमें कमेंट के माध्यम से अपनी राय दें। 

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