विभाजन का जहर
सूर्यगढ़ के महाराज थे राणा विक्रमजीत सिंह। उनकी उम्र ढल रही थी, लेकिन आँखों में वही पुराना तेज था। मगर उनका दिल भारी था। सूर्यगढ़ के अधीन 12 बड़ी जागीरें थीं, और हर जागीर का अपना एक ठाकुर (सामंत) था। दुख की बात यह थी कि ये बारह ठाकुर आपस में ही बैर रखते थे।
ठाकुर पृथ्वी सिंह को ठाकुर शक्ति सिंह की जागीर से पानी गुजरने पर आपत्ति थी, तो ठाकुर हमीर सिंह को लगता था कि दरबार में उन्हें कम सम्मान मिलता है। छोटी-छोटी बातों पर मूँछों पर ताव देना और अपनी ही तलवारें अपनों पर तान लेना—यही वहां की दिनचर्या बन चुकी थी। "हूँ तो क्षत्रिय, झुकूंगा नहीं"—यह वाक्य अब स्वाभिमान नहीं, बल्कि अहंकार का प्रतीक बन गया था।
संकट की आहट
तभी, पश्चिम की ओर से आंधी उठी। एक क्रूर आक्रांता, अपनी एक लाख की विशाल सेना और तोपखाने के साथ सूर्यगढ़ को मिट्टी में मिलाने आ रहा था। उसके जासूसों ने उसे खबर दे दी थी कि सूर्यगढ़ के शेर आपस में ही लड़ रहे हैं, इसलिए शिकार करना आसान होगा।
महाराज विक्रमजीत सिंह ने तुरंत 'धर्म-सभा' बुलाई। केसरिया बाना पहने बारहों सामंत दरबार में आए, लेकिन उनके बीच की दूरियां साफ़ दिख रही थीं। वे एक-दूसरे की तरफ देख भी नहीं रहे थे।
महाराज ने भारी आवाज में कहा, "मेरे वीरों! क्रूर आक्रांताएं तीन दिन की दूरी पर है। उसकी सेना एक लाख है और हम कुल मिलाकर पच्चीस हजार। अगर हम अलग-अलग लड़े, तो सूर्यगढ़ का इतिहास इसी हफ्ते समाप्त हो जाएगा।"
ठाकुर पृथ्वी सिंह ने तनकर कहा, "महाराज, मेरी सेना मेरी सीमा की रक्षा के लिए पर्याप्त है। मुझे शक्ति सिंह की मदद की जरूरत नहीं।"
उधर से शक्ति सिंह ने व्यंग्य किया, "शेर अकेले ही शिकार करता है, हमें किसी के सहारे की आदत नहीं।"
दरबार में शोर मच गया। हर कोई अपनी वीरता के कसीदे पढ़ने लगा। महाराज समझ गए कि शब्दों से ये पत्थर नहीं पिघलेंगे।
एकता की परीक्षा: मुट्ठी का सिद्धांत
महाराज ने अपने सिंहासन से उठकर म्यान से अपनी तलवार निकाली और उसे दरबार के बीच में रख दिया। उन्होंने आदेश दिया, "सेवक! एक बोरी रेत लेकर आओ।"
सब हैरान थे। रेत लाई गई। महाराज ने ठाकुर हमीर सिंह से कहा, "ठाकुर, इस रेत को अपनी खुली हथेली में उठाओ और कसकर पकड़ो।"
ठाकुर ने मुट्ठी भींची, लेकिन जैसे ही उन्होंने उंगलियां थोड़ी भी ढीली कीं, रेत फिसलकर गिर गई।
महाराज मुस्कुराए। "अब, इस रेत में थोड़ा पानी और मिट्टी मिलाओ।" सेवक ने गीली मिट्टी तैयार की।
महाराज ने कहा, "अब इसे उठाओ और मुट्ठी बंद करो।"
इस बार गीली मिट्टी का गोला बन गया। ठाकुर ने मुट्ठी खोली, तब भी वह आकार में था। गिराया, तब भी वह नहीं बिखरा। कठोर हो गया था।
महाराज गरजे, "रेत का हर कण क्षत्रिय है। जब तक तुम सूखे और अलग-अलग हो, समय की आंधी तुम्हें उड़ा ले जाएगी। तुम्हारा अस्तित्व मिट जाएगा। लेकिन जिस दिन तुम प्रेम और कर्तव्य के पानी से मिल जाओगे, तुम वह चट्टान बन जाओगे जिससे टकराकर दुश्मन का सिर फूट जाएगा। चुनाव तुम्हारा है—रेत बनकर बिखरना है या चट्टान बनकर अमर होना है?"
दरबार में सन्नाटा छा गया। लेकिन अहंकार इतनी जल्दी नहीं टूटता। सामंतों ने साथ लड़ने की हामी तो भरी, लेकिन मन अब भी मिले नहीं थे।
रणभूमि का दृश्य
युद्ध का दिन आ गया। 'हल्दीघाटी' जैसी ही एक संकरी घाटी में मोर्चा जमाया गया।
योजना के अनुसार, दाएं मोर्चे पर ठाकुर पृथ्वी सिंह थे और बाएं पर ठाकुर शक्ति सिंह। बीच में स्वयं महाराज थे।
युद्ध शुरू हुआ। दुश्मन की सेना टिड्डी दल की तरह उमड़ पड़ी। शुरुआत में राजपूतों का शौर्य भारी पड़ा। उनकी तलवारें बिजली की तरह चमक रही थीं। लेकिन दोपहर होते-होते दुश्मनों ने एक चाल चली। उसने अपनी पूरी ताकत दाएं मोर्चे पर—ठाकुर पृथ्वी सिंह की टुकड़ी पर झोंक दी।
पृथ्वी सिंह घिर गए। उनके सैनिक कटने लगे। वे मदद के लिए पीछे देखे, लेकिन स्वाभिमान आड़े आ गया। उन्होंने मदद की पुकार नहीं लगाई।
बाएं मोर्चे पर खड़े ठाकुर शक्ति सिंह यह देख रहे थे। उनके मन में एक पल के लिए पुराना बैर आया—"अच्छा है, मरने दो इसे। मेरा एक दुश्मन कम होगा।"
लेकिन तभी, उन्होंने देखा कि पृथ्वी सिंह की ढाल टूट चुकी है, फिर भी वह अकेला दस-दस शत्रुओं से जूझ रहा है। और उसी पल, शक्ति सिंह को महाराज की बात याद आ गई—"रेत बनकर बिखरोगे या चट्टान बनोगे?"
हृदय परिवर्तन
अचानक, शक्ति सिंह के भीतर का 'व्यक्तिगत अहंकार' जलकर राख हो गया और वहां से एक 'सच्चा क्षत्रिय' जागा। उन्होंने अपना घोड़ा मोड़ा और गर्जना की—
"हर हर महादेव! वीरों, पृथ्वी सिंह मेरा भाई है! जो तलवार उसकी तरफ उठेगी, वो पहले मेरी गर्दन से गुजरेगी!"
शक्ति सिंह अपनी सेना लेकर आंधी की तरह बीच में कूद पड़े। उन्होंने पृथ्वी सिंह को चारों तरफ से घेरकर एक 'रक्षा-कवच' बना लिया।
पृथ्वी सिंह ने जब अपने पुराने दुश्मन को अपनी जान बचाते देखा, तो उनकी आँखों में आंसू आ गए। उन्होंने चिल्लाकर कहा, "शक्ति सिंह! आज से तू मेरा रक्त है।"
यह दृश्य देखकर बाकी दसों सामंतों का खून खौल उठा। जो अलग-अलग लड़ रहे थे, वे सब चुंबक की तरह एक केंद्र पर सिमट आए।
अब वहां बारह अलग-अलग सेनाएं नहीं थीं। वहां अब एक 'केसरिया दीवार' खड़ी थी।
एक की पीठ दूसरे की ढाल बन गई। एक की तलवार दूसरे का हाथ बन गई।
विजय की शौर्य गाथा
शाम होते-होते युद्ध का पासा पलट गया। दुश्मनों ने देखा कि जिस सेना को वह बिखरा हुआ समझ रहे थे, वह अब एक विशाल अजगर की तरह उसकी फौज को निगल रही है। राजपूतों के संगठित आक्रमण के सामने विशाल मुगल सेना के पैर उखड़ गए। दुश्मनों को भागना पड़ा।
उस शाम, सूर्यगढ़ की धरती लाल जरूर थी, लेकिन वह गुलामी की कालिख से नहीं, बल्कि विजय के गुलाल से लाल थी।
युद्ध के बाद, शिविर में पृथ्वी सिंह और शक्ति सिंह एक ही थाली में भोजन कर रहे थे। महाराज विक्रमजीत सिंह ने उन्हें देखा और कहा—
"पुत्रों! आज तुम युद्ध नहीं जीते हो, आज तुमने 'भविष्य' जीता है। याद रखना, जब तक तुम्हारे बीच 'मैं' और 'तुम' रहेगा, कोई भी तुम्हें हरा देगा। जिस दिन 'हम' आ गया, उस दिन तीनों लोक में तुम्हें कोई नहीं हरा सकता।"
हे क्षत्रिय समाज के वीरों
आज हमारे पास कोई किला नहीं है, कोई राजपाट नहीं है, लेकिन हमारे पास एक विरासत है—हमारे पूर्वजों का रक्त।
यह कहानी मात्र एक कल्पना नहीं, यह एक चेतावनी है। आज भी समाज छोटे-छोटे संगठनों, गोत्रों और ओहदों की लड़ाई में बंटा हुआ है। हम सोशल मीडिया पर एक-दूसरे की टांग खींचने में लगे हैं, जबकि दुश्मन हमारे अस्तित्व को मिटाने की साजिश रच रहा है।
उस राजा की 'गीली मिट्टी' वाली बात याद रखना।
सूखी रेत मत बनो। संगठन ही शक्ति है।
अपने भाई को गिरने मत दो, चाहे उससे कितना भी मतभेद क्यों न हो।
क्योंकि जब भाई, भाई का साथ देता है, तो इतिहास बदल जाता है।
जय मां भवानी जय राजपूताना! जय क्षत्रिय धर्म!
दोस्तों आज की कहानी आपको कैसी लगी कमेंट में हमे जरूर बताएं।
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