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"बेटा, मेरा पेट भरा है" - मां का वो आखिरी सफेद झूठ मुझे पैसों का लालच
सरोज की मां, गुलाबवती जी, अब नहीं रहीं।
दिल्ली में अपनी बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी और आलीशान फ्लैट की चकाचौंध में सरोज ने पिछले तीन सालों में बमुश्किल दो बार गांव का चक्कर लगाया था। हर बार "काम का बोझ" और "मीटिंग्स" का बहाना होता था। पत्नी पूजा और बेटे भार्गव को तो गांव की धूल से एलर्जी थी, इसलिए वे साथ आना पसंद नहीं करते थे। मां कभी शिकायत नहीं करती थीं। फोन पर बस इतना कहतीं, "तू खुश रह बेटा, बस अपना ख्याल रखना।"
अंतिम संस्कार की रस्में पूरी हो चुकी थीं। रिश्तेदार जा चुके थे। रात का सन्नाटा घर में पसर गया था। सरोज उस कमरे में गया जहां मां अपनी आखिरी सांस तक रही थीं। कमरे में दवाइयों की गंध और अगरबत्तियों की भीनी खुशबू मिली-जुली थी। कोने में एक पुराना, जंग लगा हुआ लोहे का संदूक (बक्सा) रखा था। यह वही संदूक था जिसे छूने की इजाजत बचपन में सरोज को नहीं थी। मां हमेशा कहती थीं, "इसमें मेरा खजाना है, जब मैं मर जाऊं तब खोलना।"
सरोज बचपन में सोचता था कि शायद इसमें सोने-चांदी के जेवर होंगे। आज, भारी मन से उसने उस संदूक का ढक्कन खोला।
जैसे ही संदूक खुला, यादों का एक बवंडर बाहर आ गया। उसमें कोई सोना-चांदी नहीं था। सबसे ऊपर एक पुराना, पीला पड़ चुका स्वेटर रखा था। सरोज के हाथ कांप गए। यह वही स्वेटर था जो उसने दसवीं क्लास में जिद करके मां से बुनाया था, लेकिन कॉलेज में जाते ही उसे "ओल्ड फैशन" कह कर पहनना छोड़ दिया था। मां ने उसे धोकर, सहेज कर रखा था, मानो वह कोई बेशकीमती हीरा हो।
उस स्वेटर के नीचे कॉपियों का एक बंडल था। सरोज ने एक कॉपी उठाई। यह उसकी पांचवीं कक्षा की रफ कॉपी थी। पन्ने पलटते ही उसकी नजर एक जगह ठिठक गई। वहां उसकी टेढ़ी-मेढ़ी लिखावट में लिखा था- "मेरी मां दुनिया की सबसे अच्छी मां है।" उस पन्ने पर पानी की सूखी हुई बूंदों के निशान थे। शायद मां उन शब्दों को बार-बार पढ़कर रोती रही होंगी, जब सरोज महीनों तक उन्हें फोन नहीं करता था।
लेकिन संदूक के सबसे निचले हिस्से में एक लाल कपड़े में लिपटी हुई डायरी और एक छोटी सी पोटली मिली। सरोज ने पोटली खोली। उसमें कुछ मुड़े-तुड़े नोट और चिल्लर थे। कुल मिलाकर शायद 5-6 हजार रुपये रहे होंगे। साथ में एक पर्ची थी जिस पर कांपते हाथों से लिखा था- "सरोज की नई गाड़ी के लिए शगुन।"
सरोज का गला रूंध गया। उसके पास करोड़ों का बैंक बैलेंस था, लेकिन मां ने अपनी पाई-पाई जोड़कर उसके लिए यह शगुन रखा था। उसने डायरी खोली। डायरी के पन्ने मां के एकाकी जीवन के गवाह थे। वह पन्ने पलटने लगा और एक तारीख पर आकर उसकी नजर रुक गई। यह तारीख 12 साल पुरानी थी, जब सरोज के पिताजी का देहांत हुआ था।
डायरी में लिखा था:-
"आज घर में खाने को सिर्फ दो रोटियां बची थीं। सरोज को बहुत जोर की भूख लगी थी। मैंने उससे कहा कि मैंने खाना खा लिया है, मेरा पेट भारी है। उसने दोनों रोटियां खा लीं और खुश होकर सो गया। पेट में भूख की आग जल रही थी, लेकिन बेटे का भरा हुआ पेट देखकर मन तृप्त हो गया। भगवान मेरे बच्चे को कभी भूखा न सुलाए।"
सरोज की आँखों से आंसू टपक कर डायरी के पन्नों को भिगोने लगे। उसे याद आया, वह अक्सर मां से पूछता था, "मां, तुम क्यों नहीं खा रही?" और वो हंसकर कहती थीं, "अरे पगले, अभी तो बनाया-खाया है, तू खा ले।" वह झूठ था। वह सफेद झूठ था जो एक मां अपने बच्चे की खातिर बोलती थी।
पन्ने पलटते हुए सरोज आज की तारीखों के करीब आ गया। पिछले महीने की एक तारीख...
"आज डॉक्टर ने कहा है कि मेरे दिल का ऑपरेशन जरूरी है। खर्चा तीन लाख रुपये बताया है। सरोज को फोन किया था, उसकी आवाज से लग रहा था कि वह बहुत व्यस्त है। उसने कहा कि वह अभी एक बड़ी डील क्रैक करने में लगा है। मैंने उसे अपनी बीमारी के बारे में नहीं बताया। अगर बता देती तो वह परेशान हो जाता। शायद अपनी मीटिंग छोड़कर भाग आता। उसकी तरक्की में मेरी बीमारी बाधा नहीं बननी चाहिए। मैंने डॉक्टर को मना कर दिया है। अब जो ईश्वर की मर्जी।"
सरोज के हाथों से डायरी छूटकर गिर गई। वह चीखना चाहता था, लेकिन गले से आवाज नहीं निकली। वह जिस 'डील' के लिए इतना पागल था, उस डील की कीमत उसकी मां की जान थी? मां ने सिर्फ इसलिए इलाज नहीं कराया ताकि बेटे को परेशानी न हो?
उसे याद आया कि एक बार मां ने फोन किया था और कहा था बेटा मुझे तीर्थ के दर्शन करने जाना है लेकिन मैने मना कर दिया था कि मां अभी छुट्टी नहीं मिली जब छुट्टी मिलेगी तो ले चलूंगा मेरा वो पैसे कमाने का लोभ की थोड़े पैसे और कमा लूं फिर बाद में जाऊंगा। " और वह 'बाद' कभी नहीं आया।
उस रात उस खाली घर में सरोज दहाड़ें मार-मार कर रोया। वह अपनी मां के पैरों की छाप वाले फर्श पर सिर पटक-पटक कर माफ़ी मांगता रहा। "मां, मुझे माफ़ कर दो! मैं इतना अमीर होकर भी कितना गरीब निकला कि तुम्हारे लिए वक्त नहीं खरीद सका। मां, वापस आ जाओ... मैं सारी दौलत लुटा दूंगा, बस एक बार मुझे 'बेटा' कहकर बुला लो।"
दीवार पर टंगी मां की तस्वीर में उनकी शांत मुस्कान अब भी वैसी ही थी, जैसे कह रही हो- "रो मत पगले, तू खुश रह, मैंने खाना खा लिया है..."
अगली सुबह जब सरोज घर से निकला, तो वह वो इंसान नहीं था जो कल आया था। उसने मां की वह पोटली अपने सीने से लगा रखी थी। वह जानता था कि अब वह दुनिया की सबसे महंगी कार भी खरीद ले, लेकिन उसमें सुकून नहीं होगा। जो सुकून मां के हाथ की उस "झूठी भूख" वाली रोटी में था, वह अब पूरी दुनिया की दौलत मिलकर भी उसे नहीं दे सकती थी।
मेरा ब्लॉग पढ़ने वाले दोस्तों,
हम अक्सर अपनी दौड़ में इतने आगे निकल जाते हैं कि पीछे छूट गए उन कदमों को भूल जाते हैं जिन्होंने हमें चलना सिखाया। मां सिर्फ एक रिश्ता नहीं, एक ऐसा अहसास है जो खुद को मिटाकर हमें बनाता है। इससे पहले कि आपके घर का वह "पुराना संदूक" हमेशा के लिए बंद हो जाए, अपनी मां के पास जाइए, उनका हाथ थामिए और कहिए कि आप उनसे कितना प्यार करते हैं। क्योंकि दुनिया में हर चीज दोबारा मिल सकती है, लेकिन मां और उनका निस्वार्थ प्यार दोबारा नहीं मिलता।
समय रहते अपनों की कद्र करें, क्योंकि "बाद में" अक्सर "बहुत देर" हो चुकी होती है फिर पछताने से कोई फायदा नहीं जैसे सरोज के साथ हुआ।🙏😭
आपको आज का ब्लॉग कैसा लगा हमें कमेंट में जरूर बताएं। 🙏🙏
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