Wednesday, November 23, 2022

🔱 सूर्यवंशी क्षत्रिय सम्राट महाराजा सल्हीय सिंह अर्कवंशी: सल्हीयपुर (संडीला) के गौरवशाली अधिपति

🚩 जय क्षत्रिय धर्म! जय राजपुताना! 🚩
भारतवर्ष के इतिहास में कुछ ऐसे शासक हुए हैं, जिनके नाम से ही शत्रु काँप उठते थे। सूर्यवंशी क्षत्रिय सम्राट महाराजा सल्हीय सिंह अर्कवंशी उन्हीं महान योद्धाओं में से एक थे। उनका शासनकाल, विशेष रूप से 13वीं और 14वीं शताब्दी के दौरान, विदेशी आक्रमणकारियों और मुगलों के लिए साक्षात 'काल' के समान था।

👑 सल्हीयपुर (संडीला) की स्थापना और स्वर्णिम शासन
महाराजा सल्हीय सिंह अर्कवंशी ने अवध (उत्तर प्रदेश) के प्राचीन कौशल (कोसल) राज्य के अंतर्गत एक महत्वपूर्ण नगर की स्थापना की थी—सल्हीयपुर, जिसे आज संडीला के नाम से जाना जाता है।
विस्तृत साम्राज्य: यह सल्हीयपुर (संडीला) उस समय के भू-भाग से कहीं अधिक क्षेत्रफल में फैला हुआ एक विशाल और संगठित राज्य था।
भूमि के स्वामी (Lords of the Land): सरकारी दस्तावेजों में भी अर्कवंशी शासकों को इस क्षेत्र का 'Lords of the Land' कहकर संबोधित किया गया है, जो इस बात का प्रमाण है कि संडीला क्षेत्र के वास्तविक स्वामी और निर्माता अर्कवंशी ही थे।
अर्कवंशीय विरासत: संडीला में वर्तमान में जितने भी प्राचीन खंडहर, कुंड और मंदिर मौजूद हैं, वे सब अर्कवंशी राजाओं द्वारा निर्मित करवाए गए थे, जो उनके कला और स्थापत्य प्रेम को दर्शाते हैं।

🛡️ भारत के नेतृत्व का पुनर्जागरण
जब महाराजा पृथ्वीराज चौहान को बंदी बनाकर मुहम्मद गोरी गजनी ले गया, तो भारत में एक नेतृत्व का शून्य बन गया था। इस खाली हुई बागडोर को एक लम्बे अंतराल के बाद, महाराजा सल्हीय सिंह अर्कवंशी ने संभाला।
उन्होंने अपनी कुशल युद्ध नीति और रण कौशल के बल पर पैर पसार चुके मुगलों और आक्रमणकारियों से सीधा लोहा लिया। उन्होंने अपने राज्य का विस्तार किया और दतली, मलीहाबाद (मल्हीयपुर), काकोरी, कल्यानमल, हरदोई से लेकर मुरादाबाद तक अपना प्रभाव स्थापित किया।
जिस समय भारतवर्ष पर मुगलों का अत्याचार बढ़ रहा था, उस विकट परिस्थिति में भी महाराजा ने अपनी प्रजा का कुशल पालन और रक्षा सुनिश्चित की।

🏰 अभेद्य सुरक्षा व्यवस्था और गढ़ियों का निर्माण
महाराजा सल्हीय सिंह की सबसे बड़ी विशेषता उनके राज्य की अभेद्य सुरक्षा व्यवस्था थी। शत्रु से रक्षा के लिए नगर की सुरक्षा इतनी कड़ी थी कि आक्रमणकारी सीमा तक पहुँचने से पहले ही दम तोड़ देते थे।
तुर्की आक्रमणकारियों को निरंतर परेशान करने वाली उनकी कुशल युद्ध नीति का प्रमाण आज भी उनके द्वारा निर्मित गढ़ियों (किलों) के टीलों के रूप में मौजूद है, जिनमें प्रमुख हैं:
गढ़ी जिंदौर
तरौना
नौगढ़
सल्हीयजना
सामदखेड़ा
मुसलेवा (परिवर्तित नाम)
सरसेंडी, दातली, बिजनौरगंज, मुरादाबाद, लौहगांजर

⚔️ तुर्की से भीषण संघर्ष: 160 वर्षों का प्रभुत्व
अर्कवंशियों का शौर्य इतना प्रचंड था कि वे लगभग 160 वर्षों तक संडीला और अन्य क्षेत्रों पर निर्विघ्न रूप से अधिपति बने रहे।
इल्तुतमिश के आक्रमण: सन् 1236 ई. में तुर्की शासक शम्सुद्दीन अल्तमश (इल्तुतमिश) ने कई बार आक्रमण किए, लेकिन महाराजा सल्हीय सिंह के रण कौशल के कारण वह हर बार असफल रहा।
मुहम्मद शाह तुगलक के शासन से त्रस्त लोग भागकर संडीला राज्य में शरण लेने लगे। नगर की खुशहाली और विस्तार की खबर जब दिल्ली के आक्रमणकारी तुगलक तक पहुँची, तो उसने स्वयं आक्रमण किया, लेकिन वह भी असफल रहा। उसने फतेहपुर पर भी आक्रमण किया, जहाँ अर्कवंशियों का शासन था, और वहाँ भी उसे हार का सामना करना पड़ा।

🔥 सन् 1374 ई. का महासंग्राम और जौहर
सन् 1374 ई. में मुहम्मद शाह तुगलक ने अपने पीर भाई सैय्यद मख़दूम अलाउद्दीन को सल्हीयपुर (संडीला) पर आक्रमण कर जीतने की आज्ञा दी।
शौर्य की पराकाष्ठा: इस भीषण युद्ध में महाराजा सल्हीय सिंह अर्कवंशी के वीर पुत्रों ने अपनी तलवार से सैय्यद मख़दूम अलाउद्दीन के तीनों बेटों को बड़ी ही वीरता से समाप्त कर दिया।
बढ़ती शत्रु सेना: महाराजा की सेना ने आक्रमणकारियों को बुरी तरह पराजित करना शुरू कर दिया, लेकिन आक्रमणकारी सेना की संख्या बढ़ती ही जा रही थी। छल-कपट की नीतियों के कारण महाराजा के कई सैनिक वीरगति को प्राप्त होने लगे।
क्षत्राणियों का बलिदान: जब युद्ध में हार स्पष्ट दिखने लगी, तो महल की क्षत्राणियों ने अपने सम्मान और धर्म की रक्षा के लिए जौहर (अग्नि में कूदकर बलिदान) कर लिया।
जब महल में कोई नहीं बचा, तब आक्रमणकारियों ने महलों, मंदिरों और गढ़ियों को नष्ट कर दिया। लेकिन वे महाराजा सल्हीय सिंह अर्कवंशी के शौर्य की अमर गाथा को कभी मिटा नहीं सके।
महाराजा सल्हीय सिंह अर्कवंशी का शासनकाल वीरता, कुशल रणनीति और धर्मपरायणता का प्रतीक है, जिसने भारत के एक बड़े भू-भाग को विदेशी आतताइयों से एक लम्बे समय तक सुरक्षित रखा।
🚩 जय मां भवानी!
🚩 जय क्षत्रिय धर्म!
🚩 जय जय श्री राम!

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Wednesday, October 12, 2022

👑 अर्कवंशी क्षत्रिय: पहचान की दुविधा और गौरवशाली इतिहास की पुनर्स्थापना

🚩 जय क्षत्रिय धर्म! जय राजपुताना! 🚩
सदियों की गुमनामी और संघर्षों के बाद, आज अर्कवंशी क्षत्रियों में अपने इतिहास और वास्तविक पहचान को जानने की एक नई ललक जागृत हुई है। यह जागरूकता कई स्वाभाविक प्रश्न खड़े करती है—क्या हम क्षत्रिय हैं? यदि हाँ, तो हमें स्वीकार क्यों नहीं किया जाता? क्या इस पहचान से आरक्षण की सुविधाएँ समाप्त हो जाएँगी?
इन सभी दुविधाओं का समाधान हमारे इतिहास और 'क्षत्रिय' शब्द के मूल अर्थ में निहित है।

1. 'क्षत्रिय' का वास्तविक अर्थ क्या है?
हिंदू धर्म की वर्ण-व्यवस्था के अनुसार, जिस वर्ण को शासन और प्रजा की रक्षा का दायित्व सौंपा गया, उसे क्षत्रिय कहा गया।
मूल वंश: प्रारंभ में केवल सूर्यवंश और चंद्रवंश ही प्रमुख क्षत्रिय वंश थे। बाद में इन्हीं की शाखाएं और उप-शाखाएं विकसित हुईं।
अर्कवंश और सूर्यवंश: सूर्यवंश को ही कई अन्य पर्यायवाची नामों से जाना जाता था, जैसे: आदित्यवंश, रविवंश, और अर्कवंश। रामायण में भगवान राम को भी 'अर्क-शिरोमणि' या 'रविकुल गौरव' कहा गया है। 'अर्क' (सूर्य) एक सम्मान-सूचक शब्द था जिसे कई सूर्यवंशी राजा अपने नाम के आगे लगाते थे, जैसे भट्टार्क या विक्रमार्क।
अर्कवंशी पहचान: जिन सूर्यवंशी क्षत्रियों ने 'अर्क' नाम से अपनी विशिष्ट पहचान बनाई, वे अर्कवंशी क्षत्रिय कहलाए। महाराजाधिराज तिलोकचंद जी ने अपने वंश को सूर्यवंश के बजाय अर्कवंश कहना स्वीकार किया

2. इतिहास के गौरवशाली हस्ताक्षर
अर्कवंश का इतिहास किलों, गढ़ियों और वीर योद्धाओं के शौर्य से भरा है।
महान शासक: इसी वंश में खागा नगर के संस्थापक महाराजा खड़गसेन, वीर महाराजा सल्हीय सिंह और मल्हीय सिंह, तथा ईर सिंह-वीर सिंह और खेत सिंह-खूब सिंह जैसे शासक हुए।
ऐतिहासिक प्रमाण: अयाह, बेरिहागढ़, अरखा, सांडी, कुंडार, नौरंगगढ़ जैसे तमाम किले और उनके खंडहर आज भी अर्कवंश के गौरवशाली इतिहास के साक्षी हैं।
वक्त के साथ, गरीबी और संघर्षों के कारण हम अपना इतिहास भूलते गए। हमसे लोहा लेने वाले शासकों ने न सिर्फ हम पर जुल्म किए, बल्कि हमारे इतिहास और स्वाभिमान को मिटाने की कोशिश भी की, जिसे हमारी अज्ञानता और गरीबी ने बिना विरोध के स्वीकार कर लिया।

3. हम क्षत्रिय क्यों हैं? (तार्किक उत्तर)
यह प्रश्न कि 'हम क्षत्रिय हैं या नहीं' का सीधा उत्तर है: हाँ, हम शत-प्रतिशत क्षत्रिय हैं।
शासक जाति के वंशज: यदि आप हिंदू धर्म की किसी भी शासक जाति के वंशज हैं, तो आपके धर्मशास्त्र आपको 'क्षत्रिय' कहलाने का अधिकार देते हैं। अर्कवंशी शासक रहे हैं, अतः उनके वंशज क्षत्रिय हैं।
जन्म से वर्ण निर्धारण: वर्तमान में हिंदू धर्म में वर्ण/जाति का निर्धारण कर्म से नहीं, बल्कि जन्म से होता है। जैसे, ब्राह्मण चाहे कोई भी कार्य करे, वह ब्राह्मण ही कहलाता है। उसी तरह, प्रत्येक अर्कवंशी, चाहे वह मजदूर हो, किसान हो, या नौकरीपेशा हो, शासक जाति के वंशज होने के कारण क्षत्रिय कहलाने का अधिकारी है। गरीबी या वर्तमान कर्म से यह अधिकार समाप्त नहीं होता।

4. क्षत्रिय, राजपूत, और ठाकुर में अंतर
यह समझना आवश्यक है कि 'क्षत्रिय', 'राजपूत', और 'ठाकुर' पर्यायवाची शब्द नहीं हैं।
क्षत्रिय: यह प्राचीन हिंदू वर्ण है, जो शासकों और योद्धाओं को दिया गया। श्रीराम और श्रीकृष्ण को प्राचीन ग्रंथों में क्षत्रिय ही लिखा गया है।
राजपूत: यह मध्यकाल में उत्पन्न हुआ एक 'नव-क्षत्रिय' वर्ग है, जो सत्ता पाने के बाद क्षत्रियों के रूप में स्थापित हुआ। राजपूत क्षत्रिय वर्ग का एक हिस्सा मात्र हैं, न कि संपूर्ण क्षत्रिय वर्ग। भारत में कई योद्धा जातियाँ क्षत्रिय हैं पर राजपूत नहीं (जैसे मराठा, नायर आदि)।
ठाकुर: यह एक उपाधि है, जिसका मूल अर्थ 'स्वामी' या 'भगवान' होता है। ब्रिटिशकाल में यह उपाधि सशक्त सामंतों और ज़मींदारों द्वारा प्रयोग की जाने लगी, जिसमें राजपूतों के अलावा अन्य जातियों के ज़मींदार भी शामिल थे।

5. पहचान की स्थापना और आरक्षण पर दृष्टिकोण

क. दूसरों की स्वीकार्यता
दूसरों के हमें क्षत्रिय मानने न मानने का सवाल गौण है। सबसे पहले हमें स्वयं को क्षत्रिय मानना होगा।
आत्मविश्वास और एक स्वर: जब सभी अर्कवंशी एक स्वर में स्वयं को क्षत्रिय कहना शुरू करेंगे और अपने इतिहास पर गर्व करेंगे, तभी दूसरे भी सम्मानपूर्वक इस पहचान को स्वीकार करेंगे।
जैसे अन्य समुदाय ने स्वयं को श्रीकृष्ण का वंशज बताकर  खुद को स्थापित किया, उसी प्रकार हमें भी अपने गौरवशाली अर्कवंश और क्षत्रिय पहचान पर दृढ़ रहना होगा।

ख. आरक्षण और स्वाभिमान
आरक्षण (OBC) की सुविधा एक अलग पहलू है, जिसे शासन ने सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ी क्षत्रिय जातियों को दिया है (जैसे कर्नाटक के अग्निकुल क्षत्रिय या उड़ीसा के चास खांडायत)।
आरक्षण का लाभ: उत्तर प्रदेश में अर्कवंशी क्षत्रियों को अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) का आरक्षण प्राप्त है, जिसका लाभ लेना उचित है।
अनैतिकता का विरोध: हालांकि, फर्जी जाति प्रमाण-पत्र बनवाकर धोखाधड़ी से लाभ उठाना कायरता है और ऐसे व्यक्ति को अर्कवंशी कहलाने का कोई अधिकार नहीं है। स्वाभिमान के साथ आरक्षण का लाभ लेना अलग बात है, पर धोखाधड़ी करना अनैतिक है।

6. निष्कर्ष: हमारा कर्तव्य
आज हमें मूर्ख लोगों से बहस करने के बजाय अपना आत्मविश्वास बनाए रखना है। जो समझदार और इतिहास जानने वाले बुद्धिजीवी हैं, वे हमें क्षत्रियों के रूप में स्वीकार कर रहे हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि हम प्राचीनतम शासक वंशों में से एक हैं।
हमारा कर्तव्य है:
अपने इतिहास का ज्ञान गरीब से गरीब अर्कवंशी तक पहुँचाना। उन्हें यह एहसास कराना कि कालचक्र ने भले ही सत्ता छीन ली हो, पर कुल से हम क्षत्रिय हैं।
गौरवशाली इतिहास का समाज में निरंतर प्रचार करना।
अपनी भावी पीढ़ियों को यह सिखाना कि वे मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम और वीर क्षत्रियों के वंशज हैं, जिनकी रगों में महाराजा तिलोकचंद, खड़गसेन, सल्हीय सिंह जैसे वीरों का साहस दौड़ रहा है।
आत्मसम्मान और स्वाभिमान के बिना कोई भी इंसान आगे नहीं बढ़ सकता। जब हम खुद का सम्मान करेंगे, तभी दुनिया हमारा सम्मान करेगी।
🚩 जय मां भवानी!
🚩 जय क्षत्रिय धर्म!
🚩 जय जय श्री राम!

Sunday, May 22, 2022

🔆 जानिए सूर्य देव के जन्म की कथा और 12 चमत्कारी मंत्रों के लाभ

सूर्य देव इस पृथ्वी के सबसे साक्षात देवता हैं, जिनके हमें प्रतिदिन प्रत्यक्ष दर्शन होते हैं। वेदों में सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया है, जो समस्त चराचर जगत का अविनाशी कारण और जीवन का आधार हैं। वैदिक काल से ही भारत में सूर्योपासना का प्रचलन रहा है।
ज्योतिष शास्त्र में सूर्यदेव को नवग्रहों का राजा माना गया है। मान्यता है कि यदि किसी जातक की कुंडली में सूर्यदेव शुभ फल दें, तो उसका समाज में यश और सम्मान बढ़ता है, तथा उसे पिता का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

🌅 कैसे हुई सूर्य देव की उत्पत्ति? (पौराणिक कथा)
मार्कंडेय पुराण के अनुसार, सूर्य देव की उत्पत्ति की कथा इस प्रकार है:
प्रथम उत्पत्ति: पहले यह सम्पूर्ण जगत प्रकाश रहित था। कमलयोनि ब्रह्मा जी प्रकट हुए, जिनके मुख से प्रथम शब्द 'ॐ' निकला। यही 'ॐ' सूर्य का तेज रूपी सूक्ष्म रूप था। तत्पश्चात ब्रह्मा जी के चार मुखों से चार वेद प्रकट हुए, जो 'ॐ' के तेज में एकाकार हो गए। यह वैदिक तेज ही आदित्य है, जो विश्व का अविनाशी कारण है।

अवतार रूप में जन्म: सृष्टि रचना के समय ब्रह्मा जी के पुत्र मरीचि हुए, जिनके पुत्र ऋषि कश्यप का विवाह अदिति से हुआ।
अदिति ने घोर तप द्वारा भगवान् सूर्य को प्रसन्न किया।
सूर्य ने अदिति की इच्छा पूर्ति के लिए सुषुम्ना नाम की किरण से उसके गर्भ में प्रवेश किया।
गर्भावस्था में भी अदिति चान्द्रायण जैसे कठिन व्रतों का पालन करती थी।

मार्तंड नाम: ऋषि कश्यप ने क्रोधित होकर अदिति से पूछा कि वह उपवास रखकर गर्भस्थ शिशु को क्यों मारना चाहती है। यह सुनकर देवी अदिति ने गर्भ के बालक को उदर से बाहर कर दिया। शिशु का अत्यंत दिव्य तेज प्रज्वल्लित हो रहा था। अदिति को मारिचम-अन्डम कहा जाने के कारण यह बालक मार्तंड नाम से प्रसिद्ध हुआ।

ब्रह्मपुराण के अनुसार: ब्रह्मपुराण में अदिति के गर्भ से जन्मे सूर्य के अंश को विवस्वान कहा गया है।
✨ सूर्य देव के 12 चमत्कारी मंत्र और उनके लाभ
सूर्य देव ऐसे देवता हैं जिन्हें प्रसन्न करने के लिए किसी बड़े अनुष्ठान की आवश्यकता नहीं पड़ती है। इन्हें प्रातःकाल मात्र जल एवं अर्घ्य देकर ही प्रसन्न किया जा सकता है।
सूर्य देव को अर्घ्य देते समय, अथवा उनकी साधना करते समय, उनके इन 12 मंत्रों का जाप करने से शीघ्र ही मनचाहा आशीर्वाद मिलता है।
सुख, समृद्धि और अच्छी सेहत का वरदान पाने के लिए, रविवार के दिन सूर्यदेव को अर्घ्य देते समय इन 12 नामों का जाप पूरी श्रद्धा एवं विश्वास के साथ करना चाहिए।
🚩🚩 ॐ अर्काय नमः 🚩🚩
🚩🚩 जय मां भवानी 🚩🚩
🚩🚩 जय क्षत्रिय धर्म 🚩🚩
🚩🚩 जय राजपुताना 🚩🚩
🚩🚩 जय जय श्री राम 🚩🚩


Sunday, April 17, 2022

🔱 क्षत्रियों की उत्पत्ति एवं भारतीय इतिहास में उनका अतुलनीय महत्व 🛡️

वैदिक काल से लेकर आधुनिक युग तक, भारतीय इतिहास में क्षत्रिय वर्ण का केंद्रीय स्थान रहा है। वेदों, पुराणों और स्मृति ग्रंथों का अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि क्षत्रिय केवल एक जाति नहीं, बल्कि शासन, रक्षा और धर्म-पालन का प्रतीक रहे हैं।

1. वर्ण व्यवस्था में क्षत्रिय की भूमिका (उत्पत्ति का आधार)
प्राचीन आर्य समाज में प्रारंभ में कोई कठोर जाति व्यवस्था नहीं थी, बल्कि यह गुणों और कर्मों पर आधारित एक वर्ण व्यवस्था थी, जिसका उद्देश्य समाज को सुचारू रूप से चलाना था।
क. गीता में सिद्धांत
भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के चतुर्थ अध्याय, 13वें श्लोक में स्पष्ट किया है:
"चातुर्वण्र्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।" (गीता 4.13)
अर्थात्: मैंने इस समाज को उसकी कार्य क्षमता, गुणवत्ता, शूर वीरता, विद्वता एवं जन्मजात गुणों, स्वभाव और शक्ति के अनुसार चार वर्णों में विभाजित किया।

ख. क्षत्रिय का स्थान
ऋग्वेद में वर्णित पुरुष सूक्त के अनुसार, प्रजापति के मानव समाज रूपी पुरुष के हाथों (बाहू) को क्षत्रिय कहा गया:
"ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद बाहू राजन्य कृतः।" (ऋग्वेद)
अर्थात्: मुख ब्राह्मण है, हाथ क्षत्रिय है, जंघा वैश्य है और पैर शूद्र है।
मनुस्मृति और अन्य ग्रंथों के अनुसार, क्षत्रिय का मुख्य कार्य था:
समूहों की रक्षा करना और समाज को नियंत्रण में रखना।
वेदों का अध्ययन और यज्ञ करना।
शस्त्र चलाना उनका प्रमुख कर्म था। (परन्तु धर्म पर आपत्ति आने पर ब्राह्मण और वैश्य को भी शस्त्र उठाना वर्जित नहीं था।)

ग. प्रथम क्षत्रिय राजा
समूह द्वारा सामूहिक शासन को अनुपयोगी पाए जाने पर, प्रतिनिधियों ने क्षत्रिय को राजा बनाने का विचार किया। यह क्षत्रिय, सूर्य और उनकी पत्नी सरण्यु से उत्पन्न आर्य संतान मनु थे, जिन्हें प्रथम राजा बनाया गया।

2. क्षत्रियों के स्वाभाविक गुण और कर्तव्य
भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के 18वें अध्याय, 43वें श्लोक में क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्मों का विस्तार से वर्णन किया है:
"शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्वे चाप्यपलायनम्।
दानमीश्वरभाववश्रच् क्षात्रं कर्म स्वभावजम्।।" (गीता 18.43)
क्षत्रिय के स्वाभाविक गुण:
शूरवीरता (शौर्यम्): निडरता।
तेज (तेजस्): ओजस्वी प्रभाव।
धैर्य (धृति): दृढ़ संकल्प।
चतुरता (दाक्ष्यम्): कुशल प्रशासनिक योग्यता।
युद्ध से न भागना (युद्वे चाप्यपलायनम्): युद्ध में दृढ़ता।
दान देना (दानम्): उदारता।
स्वामिभाव (ईश्वरभाव): नेतृत्व और प्रजा का पालन।
क्षतात् किलत्रायत इत्युग्रः, क्षत्रस्य शब्दो भुवनेषु रूढः। (कालिदास)
अर्थात्: विनाश या हानि से रक्षा करने के अर्थ में ही क्षत्रिय शब्द सारे भुवनों में प्रसिद्ध है।

3. 'क्षत्रिय' से 'राजपूत' तक का सफर
राजपूत शब्द का प्रचलन प्राचीन नहीं है, बल्कि यह मध्य काल में शुरू हुआ, ठीक वैसे ही जैसे 'हिन्दू धर्म' शब्द सनातन धर्म के लिए प्रयोग होने लगा।
राजपुत्र से उत्पत्ति: 'राजपूत' शब्द राजपुत्र का अपभ्रंश (विकृत रूप) है। प्राचीन काल में यह शब्द जातिवाचक नहीं, बल्कि वंशसूचक था, जिसका प्रयोग राजकुमारों या राजवंशियों के लिए होता था।
कौटिल्य और कालिदास: प्राचीन लेखकों जैसे कौटिल्य, कालिदास और बाणभट्ट ने राजवंशियों के लिए 'राजपुत्र' शब्द का ही प्रयोग किया है।
जातिसूचक बनना: महमूद गजनवी के समय तक (अलबेरूनी के ग्रंथों में) भी 'राजपूत' शब्द का प्रयोग नहीं मिलता। मुहम्मद गौरी के समय और 11वीं सदी के बाद, यह वंशसूचक शब्द धीरे-धीरे जाति सूचक बन गया और क्षत्रियों के लिए प्रयुक्त होने लगा।
निष्कर्ष: आज क्षत्रिय और राजपूत को एक ही माना जाता है, अतः क्षत्रिय ही राजपूत हैं और राजपूत ही क्षत्रिय हैं।

4. क्षत्रियों का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व
क्षत्रिय वर्ण ने केवल शासन नहीं किया, बल्कि भारतीय सभ्यता को दिशा और संरक्षण दिया।

क. धर्म और दर्शन में योगदान
वैदिक काल: ऋग्वेद में क्षत्रिय को शासक वर्ग के व्यक्तित्व का सूचक कहा गया, जो शूरता और वीरता के बल पर लोगों की रक्षा करते थे।
उत्तर वैदिक काल: यह क्षत्रियों के उत्कर्ष का समय था। क्षत्रियों ने शस्त्र और शास्त्र दोनों में श्रेष्ठता हासिल की।
राजा जनक, प्रवाहणजबलि, अश्वपति, कैकेय और काशी नरेश अजातशत्रु जैसे शासक स्वयं महान दार्शनिक थे, जिनसे ब्राह्मण भी शिक्षा ग्रहण करने आते थे।
महाभारत और रामायण: ये अनुपम ग्रंथ क्षत्रिय वंश के पूर्वजों की गौरव गाथाएं हैं। भगवान राम (रघुवंशी) और योगीराज भगवान कृष्ण (यदुवंशी) भी क्षत्रिय ही थे।
धार्मिक क्रांति: बौद्ध धर्म के प्रवर्तक भगवान बुद्ध और जैन धर्म के प्रवर्तक भगवान महावीर भी क्षत्रिय पुत्र ही थे, जिन्होंने देश को शांति और अहिंसा का पाठ पढ़ाया।

ख. राष्ट्र की रक्षा
विदेशी आक्रमणों का सामना: विदेशी शासन के समय में भारत में आक्रमणकारियों का सामना मुख्य रूप से क्षत्रियों को ही करना पड़ा।
अमर बलिदान: क्षत्रिय नारियों ने जौहर (अग्नि स्नान) और पुरुषों ने शाका (धर्म और सम्मान की रक्षा के लिए अंतिम युद्ध) करके अपने धर्म और कुल गौरव की रक्षा की। इतिहास में राजपूतों के अतिरिक्त किसी अन्य जाति ने सैकड़ों शाके नहीं किए हैं।

निष्कर्ष:
 संसार के प्राचीनतम सभ्य देश भारत के इतिहास में से क्षत्रिय इतिहास को निकाल दिया जाए, तो कुछ भी नहीं बचता। मूलतः क्षत्रियों का इतिहास ही भारत का इतिहास है।
क्षत्रिय एक ऐसा वंश है जिसके राज नियम, शासन प्रणाली और कल्याणकारी व्यवस्थाएँ सभ्य संसार के इतिहास में सबसे अधिक समय तक प्रचलित और सफल रही हैं। यह विशिष्ट संस्कृति आज भी जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में परिलक्षित होती है।
🚩🚩 हमें अपने गौरवशाली इतिहास पर गर्व है! 🚩🚩
दोस्तों आपको यह गाथा कैसी लगी हमें कमेंट में बताएं। 

Friday, February 11, 2022

अरखा रियासत का इतिहास: अर्कवंशी क्षत्रियों के संघर्ष और स्वाभिमान की गाथा

उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले की ऊंचाहार तहसील में स्थित 'अरखा' (Arkha) आज भले ही एक ग्राम सभा हो, लेकिन इसका अतीत किसी साम्राज्य से कम नहीं है। लखनऊ से 114 किमी और रायबरेली से 40 किमी दूर स्थित यह क्षेत्र अपने नाम में ही अपना इतिहास समेटे हुए है।
इतिहासकारों और स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार, इस क्षेत्र का नामकरण यहाँ शासन करने वाले 'अर्कवंशी क्षत्रियों' के नाम पर हुआ। 'अर्क' शब्द का अपभ्रंश पहले 'अरक' और बाद में स्थानीय भाषा में 'अरखा' हो गया, जो आज तक प्रचलित है।
1. अर्कवंशी शासन और मुगलों से संघर्ष
ब्रिटिश काल से बहुत पहले, इस क्षेत्र पर अर्कवंशी राजाओं का एकछत्र राज था। यह वह दौर था जब दिल्ली पर मुगलिया सल्तनत काबिज थी। अर्कवंशी शासक स्वाभिमानी थे और उन्होंने कभी भी पूर्ण रूप से मुगलों की अधीनता स्वीकार नहीं की। जब तक अर्कवंशीयों का शासन रहा, मुगलों के साथ उनका युद्ध और संघर्ष अनवरत चलता रहा।
2. ब्रिटिश हुकूमत और ईस्ट इंडिया कंपनी का आगमन
जैसे-जैसे मुगल साम्राज्य कमजोर पड़ा, भारत में अंग्रेजों (ईस्ट इंडिया कंपनी) के पैर जमने लगे। लेकिन अरखा के अर्कवंशी राजाओं ने अपनी पकड़ कमजोर नहीं होने दी। उन्होंने अंग्रेजों की अनैतिक नीतियों को भांप लिया था और बिना किसी बाहरी मदद के अपने राज्य का संचालन करते हुए ब्रिटिश हुकूमत का विरोध जारी रखा।
3. लॉर्ड डलहौजी की 'हड़प नीति' और विद्रोह
अंग्रेज भारत को पूरी तरह चूस लेना चाहते थे। इसी उद्देश्य से गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी ने कुख्यात 'हड़प नीति' (Doctrine of Lapse) या 'गोद निषेध सिद्धांत' लागू किया।
इसके तहत, जिस राजा की अपनी संतान नहीं होती थी, उसे गोद लेने का अधिकार नहीं था और उसका राज्य अंग्रेज हड़प लेते थे।
यह नियम केवल उन पर लागू था जो अंग्रेजों के अधीन थे।
लेकिन अरखा के अर्कवंशी राजाओं ने इस काली नीति का खुला विरोध किया और अंग्रेजों के सामने झुकने से मना कर दिया।
4. भीषण युद्ध और रियासत का पतन
जब अर्कवंशी शासकों ने अधीनता स्वीकार नहीं की, तो ब्रिटिश सरकार ने युद्ध का बिगुल बजा दिया। रायबरेली की धरती गवाह बनी उस भीषण संग्राम की।
एक तरफ आधुनिक बंदूकों और तोपों से लैस ब्रिटिश सेना थी, और दूसरी तरफ अपनी मातृभूमि के लिए मर मिटने वाले अर्कवंशी वीरों की तलवारें। वीरता की मिसाल पेश करने के बावजूद, संसाधनों की कमी के कारण इस युद्ध में अर्कवंशीयों की पराजय हुई। अंग्रेजों ने झांसी और संभलपुर की तरह ही अरखा स्टेट को भी हड़प लिया।
5. जमींदारी प्रथा और ताल्लुकेदारों का उदय
अरखा रियासत को हड़पने के बाद अंग्रेजों ने यहाँ अपनी 'जमींदारी और ताल्लुकेदारी प्रथा' लागू की।
अंग्रेजों ने यहाँ से राजस्व (Tax) वसूलने के लिए बैस राजपूतों को ताल्लुकेदार के रूप में स्थापित किया।
हालांकि, बाद में बैस राजपूतों ने भी अंग्रेजों के खिलाफ बगावत की, जिसे क्रूरता से कुचल दिया गया।
आजादी के बाद जब भारत से जमींदारी प्रथा खत्म हुई, तब जाकर यहाँ के किसानों को अपनी भूमि का असली मालिकाना हक मिला।
निष्कर्ष:
अरखा का इतिहास गवाह है कि अर्कवंशी क्षत्रियों ने अपनी रियासत बचाने के लिए अंतिम सांस तक संघर्ष किया। यह धरती उनके बलिदान और स्वाभिमान की प्रतीक है।

Tuesday, February 1, 2022

500 वर्षों का तप: सूर्यवंशी अर्कवंशी क्षत्रियों की भीषण प्रतिज्ञा और विजय

अयोध्या में प्रभु श्रीराम की जन्मभूमि पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय और मंदिर निर्माण से पूरा विश्व हर्षित है। लेकिन, अयोध्या और उसके पड़ोसी जिलों—बस्ती, संतकबीरनगर, सिद्धार्थनगर—में बसे 'सूर्यवंशी अर्कवंशी क्षत्रिय समाज' के लिए यह खुशी एक त्यौहार से भी बढ़कर है। यह क्षण उनके लिए 500 वर्षों के एक कठिन तप के पूरा होने जैसा है।

1. क्या थी वह 'भीषण प्रतिज्ञा'?

जब देश में मुगलों का आतंक था, तब इस स्वाभिमानी समाज ने एक ऐसी कसम खाई थी, जिसे निभाना हर किसी के बस की बात नहीं थी। लगभग 500 वर्षों से इस समाज ने प्रण ले रखा था कि:

वे अपने सिर पर पगड़ी नहीं बांधेंगे (नंगे सिर रहेंगे या मौरी पहनेंगे)।

पैरों में चमड़े के जूते नहीं पहनेंगे (बल्कि खड़ाऊँ पहनेंगे)।

तेज धूप और बारिश में भी छतरी (छाता) का प्रयोग नहीं करेंगे।

यही कारण है कि लाखों की जनसंख्या वाले इस समाज ने सदियों से विवाह समारोहों में भी सिर पर पगड़ी नहीं बांधी, बल्कि 'मौरी' धारण की जिससे सिर खुला रहे। यह उनकी प्रतिज्ञा की निशानी थी।

2. ऐतिहासिक संघर्ष: मुगलों से लोहा

इस प्रतिज्ञा के पीछे वीरों के बलिदान से लिखा इतिहास है। जब क्रूर मुगल शासक बाबर के सिपहसालार मीर बाकी ने अपनी विशाल मुगलिया फौज के साथ अयोध्या पर हमला किया और राम मंदिर को तोड़ने बढ़ा, तब उसकी सूचना मिलते ही अर्कवंशी-सूर्यवंशी क्षत्रिय उठ खड़े हुए।

जिसके हाथ में जो हथियार आया—तलवार, भाला, कुल्हाड़ी, या लाठी—उसे लेकर वे रामलला के सम्मान की रक्षा के लिए निकल पड़े। एक तरफ मुगलों की विशाल और सुसज्जित सेना थी, और दूसरी तरफ रामभक्त क्षत्रिय। भीषण युद्ध हुआ और हजारों वीरों ने अपना बलिदान दिया।

3. मंदिर टूटने का दुःख और संकल्प

छल और बल से मुगलों ने मंदिर तो तोड़ दिया और वहां ढांचा खड़ा कर दिया, लेकिन वे अर्कवंशी क्षत्रियों का आत्मबल नहीं तोड़ पाए।

उस विध्वंस को देखकर समाज के पूर्वजों ने सौगंध खाई:


"जब तक हम अयोध्या में उस ढांचे को हटाकर पुनः प्रभु श्रीराम का मंदिर नहीं बनवा लेते, तब तक न सिर पर पगड़ी बांधेंगे, न जूते पहनेंगे और न ही छाता लगाएंगे।"

4. तपस्या की पूर्णाहुति

आज जब राम मंदिर का निर्माण हो रहा है, तो अर्कवंशी समाज की वह 500 साल पुरानी प्रतिज्ञा पूरी हो गई है। यह जीत केवल कानूनी नहीं, बल्कि उस त्याग और बलिदान की जीत है।

अब यह समाज 500 साल बाद फिर से उसी शान और शौर्य के साथ अपने सिर पर पगड़ी बांधेगा, जो उनके पूर्वजों ने त्यागी थी।

निष्कर्ष:

सूर्यवंशी अर्कवंशी क्षत्रियों का यह इतिहास बताता है कि "राम काज" के लिए क्षत्रिय अपना सब कुछ त्याग सकता है, लेकिन अपना वचन और धर्म नहीं छोड़ता।

।। जय श्री राम ।। जय सूर्यवंशी अर्कवंशी समाज ।।

साथियों आपको यह गौरव गाथा कैसी लगी हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं। 

Sunday, January 23, 2022

खागा के संस्थापक: महाराजा खड्गसेन अर्कवंशी और अर्कवंशी क्षत्रियों का शौर्यपूर्ण इतिहास

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले में स्थित 'खागा' का इतिहास केवल एक नगर की कहानी नहीं, बल्कि अर्कवंशी क्षत्रियों के त्याग, बलिदान और तलवार की धार पर लिखे गए शौर्य की गाथा है। वर्तमान में जिसे हम फतेहपुर के नाम से जानते हैं, मुस्लिम आक्रमणों से पूर्व वह क्षेत्र 'अंतर्देश' कहलाता था। गंगा-यमुना के पवित्र दोआबा क्षेत्र में खागा नगर की नींव रखने वाले महान शासक थे— महाराजा खड्गसेन अर्कवंशी।

1. गौरवशाली पूर्वज और वंशावली
महाराजा खड्गसेन अर्कवंशी, अयोध्या नरेश भगवान श्रीराम के पुत्र 'लव' के वंशज थे। उनका सम्बन्ध वल्लभीपुर के संस्थापक महाराजा कनकसेन अर्कवंशी की उस महान रक्त परंपरा से था, जिन्होंने दूसरी शताब्दी में बर्बरीक जातियों को हराकर गुजरात में अपना शासन जमाया था।
इनके वंशज 'बालार्क' और 'भट्टार्क' जैसी उपाधियों से विभूषित रहे।
इसी वंश में राजा परमसेन अर्कवंशी हुए, जिन्होंने सौराष्ट्र (सौर राष्ट्र) की स्थापना की और 'परमभट्टार्क' कहलाए।
महाराजा खड्गसेन भी अपने पिता महाराजा दलपत सेन की तरह अत्यंत निर्भीक और महत्त्वाकांक्षी शासक थे।

2. आक्रमणकारियों से संघर्ष और खागा की स्थापना
जब उत्तर भारत पर विदेशी आक्रांताओं के हमले शुरू हुए, तब 10वीं सदी से पूर्व ही महाराजा खड्गसेन ने दोआबा क्षेत्र में खागा नगर बसाया। उनका उद्देश्य धर्म और राज्य की रक्षा था।
उस समय तुर्क और अफगान सेनाएं मिलकर "मारो और भाग जाओ" (Hit and Run) की नीति अपना रही थीं। लेकिन महाराजा खड्गसेन ने अपनी अद्भुत युद्धनीति का परिचय दिया:
उन्होंने दुश्मन सेना को, जो छिपकर वार करती थी, एक निश्चित स्थान (केंद्र) पर घेरने की योजना बनाई।
परिणामस्वरूप, अफगानी और तुर्की सेनाएं दोनों तरफ से घिर गईं और शत्रु सेना बुरी तरह पराजित होने लगीं।
महाराजा की इस रणनीति से दुश्मन खेमे में भगदड़ मच गई और वे एक-दूसरे की नीति पर ही संदेह करने लगे।

3. खिलजी और शर्की सेनाओं की पराजय
जब तुर्क-अफगान हारने लगे, तो उन्होंने खिलजियों से मदद मांगी। महाराजा खड्गसेन के विरुद्ध एक चार-पक्षीय युद्ध छिड़ गया।
इस महायुद्ध में महाराजा के विश्वासपात्र सेनापति वीर समरजीत सिंह ने अपनी निष्ठा और वीरता का ऐसा परिचय दिया कि इतिहास आज भी उन्हें नमन करता है। मुस्लिम सेनापतियों ने अपने हताश सैनिकों में जोश भरने के लिए 'शम्स-उद-दीन' जैसी उपाधियां दीं, लेकिन अर्कवंशी तलवारों के आगे सब व्यर्थ साबित हुआ।

4. विजय और धर्म स्थापना (दशाश्वमेध यज्ञ)
भीषण युद्ध के बाद अंततः विजय महाराजा खड्गसेन की हुई।
इस जीत के उपलक्ष्य में उन्होंने अंतर्देश राज्य में अर्कवंश की प्रभुसत्ता स्थापित की।
उन्होंने महान दशाश्वमेध यज्ञ संपन्न किया।
काशी (वाराणसी) के दशाश्वमेध घाट पर अपनी कुलदेवी माता शीतला के नाम पर 'शीतला घाट' का निर्माण करवाया।
प्रयागराज के भू-भाग पर भी उन्होंने अपना भगवा ध्वज फहराया।

5. अष्टगढ़ नरेश और ऐतिहासिक साक्ष्य
फतेहपुर का इतिहास अर्कवंशी शासकों के बिना अधूरा है। अर्कवंशी राजाओं के अधीन 8 मजबूत गढ़ (किले) थे, जिसके कारण उन्हें 'अष्टगढ़ नरेश' (अठगढ़िया नरेश) कहा जाता था।
महाराजा महिपति सेन अर्कवंशी: इन्होंने अपने शासन में अनेक कुंड, कुएं और भगवान अर्क (सूर्य) के मंदिर बनवाए। उस समय फतेहपुर शिव और सूर्य उपासना का केंद्र था।
विश्वासघात: 14वीं सदी में अष्टगढ़ नरेश राजा सीतानंद सेन अर्कवंशी के साथ दुर्भाग्यपूर्ण छल हुआ। मुस्लिम शर्की वंश के शासक इब्राहीम शाह और सेंगर सेना द्वारा किए गए विश्वासघात के कारण उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा।

निष्कर्ष:
आज भी फतेहपुर के 'अयाह' और 'कोट' गांव में अर्कवंशी शासकों के महल और गढ़िया दुर्ग, भले ही खंडहर बन चुके हैं, लेकिन वे ईंट-ईंट से अपने गौरवशाली अतीत की गवाही दे रहे हैं। जैसा कि 'विकास के आइने में खागा का अतीत' में रविकुमार तिवारी लिखते हैं— "खागा को अर्कवंशी क्षत्रियों ने ही अपने पसीने और रक्त से सींचकर बसाया है।"
जय श्री राम! जय क्षत्रिय समाज! जय राजपुताना!

चित्तौड़ का स्वाभिमान: चिराड़ क्षत्रियों का गौरवशाली इतिहास और संघर्ष की गाथा

चिराड़ क्षत्रियों का बहुत ही गौरवमय इतिहास रहा है क्या आप जानते हैं कि चिराड़ क्षत्रिय कौन हैं? क्या आपको पता है कि यह समाज इतिह...