Sunday, January 23, 2022

खागा के संस्थापक: महाराजा खड्गसेन अर्कवंशी और अर्कवंशी क्षत्रियों का शौर्यपूर्ण इतिहास

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले में स्थित 'खागा' का इतिहास केवल एक नगर की कहानी नहीं, बल्कि अर्कवंशी क्षत्रियों के त्याग, बलिदान और तलवार की धार पर लिखे गए शौर्य की गाथा है। वर्तमान में जिसे हम फतेहपुर के नाम से जानते हैं, मुस्लिम आक्रमणों से पूर्व वह क्षेत्र 'अंतर्देश' कहलाता था। गंगा-यमुना के पवित्र दोआबा क्षेत्र में खागा नगर की नींव रखने वाले महान शासक थे— महाराजा खड्गसेन अर्कवंशी।

1. गौरवशाली पूर्वज और वंशावली
महाराजा खड्गसेन अर्कवंशी, अयोध्या नरेश भगवान श्रीराम के पुत्र 'लव' के वंशज थे। उनका सम्बन्ध वल्लभीपुर के संस्थापक महाराजा कनकसेन अर्कवंशी की उस महान रक्त परंपरा से था, जिन्होंने दूसरी शताब्दी में बर्बरीक जातियों को हराकर गुजरात में अपना शासन जमाया था।
इनके वंशज 'बालार्क' और 'भट्टार्क' जैसी उपाधियों से विभूषित रहे।
इसी वंश में राजा परमसेन अर्कवंशी हुए, जिन्होंने सौराष्ट्र (सौर राष्ट्र) की स्थापना की और 'परमभट्टार्क' कहलाए।
महाराजा खड्गसेन भी अपने पिता महाराजा दलपत सेन की तरह अत्यंत निर्भीक और महत्त्वाकांक्षी शासक थे।

2. आक्रमणकारियों से संघर्ष और खागा की स्थापना
जब उत्तर भारत पर विदेशी आक्रांताओं के हमले शुरू हुए, तब 10वीं सदी से पूर्व ही महाराजा खड्गसेन ने दोआबा क्षेत्र में खागा नगर बसाया। उनका उद्देश्य धर्म और राज्य की रक्षा था।
उस समय तुर्क और अफगान सेनाएं मिलकर "मारो और भाग जाओ" (Hit and Run) की नीति अपना रही थीं। लेकिन महाराजा खड्गसेन ने अपनी अद्भुत युद्धनीति का परिचय दिया:
उन्होंने दुश्मन सेना को, जो छिपकर वार करती थी, एक निश्चित स्थान (केंद्र) पर घेरने की योजना बनाई।
परिणामस्वरूप, अफगानी और तुर्की सेनाएं दोनों तरफ से घिर गईं और शत्रु सेना बुरी तरह पराजित होने लगीं।
महाराजा की इस रणनीति से दुश्मन खेमे में भगदड़ मच गई और वे एक-दूसरे की नीति पर ही संदेह करने लगे।

3. खिलजी और शर्की सेनाओं की पराजय
जब तुर्क-अफगान हारने लगे, तो उन्होंने खिलजियों से मदद मांगी। महाराजा खड्गसेन के विरुद्ध एक चार-पक्षीय युद्ध छिड़ गया।
इस महायुद्ध में महाराजा के विश्वासपात्र सेनापति वीर समरजीत सिंह ने अपनी निष्ठा और वीरता का ऐसा परिचय दिया कि इतिहास आज भी उन्हें नमन करता है। मुस्लिम सेनापतियों ने अपने हताश सैनिकों में जोश भरने के लिए 'शम्स-उद-दीन' जैसी उपाधियां दीं, लेकिन अर्कवंशी तलवारों के आगे सब व्यर्थ साबित हुआ।

4. विजय और धर्म स्थापना (दशाश्वमेध यज्ञ)
भीषण युद्ध के बाद अंततः विजय महाराजा खड्गसेन की हुई।
इस जीत के उपलक्ष्य में उन्होंने अंतर्देश राज्य में अर्कवंश की प्रभुसत्ता स्थापित की।
उन्होंने महान दशाश्वमेध यज्ञ संपन्न किया।
काशी (वाराणसी) के दशाश्वमेध घाट पर अपनी कुलदेवी माता शीतला के नाम पर 'शीतला घाट' का निर्माण करवाया।
प्रयागराज के भू-भाग पर भी उन्होंने अपना भगवा ध्वज फहराया।

5. अष्टगढ़ नरेश और ऐतिहासिक साक्ष्य
फतेहपुर का इतिहास अर्कवंशी शासकों के बिना अधूरा है। अर्कवंशी राजाओं के अधीन 8 मजबूत गढ़ (किले) थे, जिसके कारण उन्हें 'अष्टगढ़ नरेश' (अठगढ़िया नरेश) कहा जाता था।
महाराजा महिपति सेन अर्कवंशी: इन्होंने अपने शासन में अनेक कुंड, कुएं और भगवान अर्क (सूर्य) के मंदिर बनवाए। उस समय फतेहपुर शिव और सूर्य उपासना का केंद्र था।
विश्वासघात: 14वीं सदी में अष्टगढ़ नरेश राजा सीतानंद सेन अर्कवंशी के साथ दुर्भाग्यपूर्ण छल हुआ। मुस्लिम शर्की वंश के शासक इब्राहीम शाह और सेंगर सेना द्वारा किए गए विश्वासघात के कारण उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा।

निष्कर्ष:
आज भी फतेहपुर के 'अयाह' और 'कोट' गांव में अर्कवंशी शासकों के महल और गढ़िया दुर्ग, भले ही खंडहर बन चुके हैं, लेकिन वे ईंट-ईंट से अपने गौरवशाली अतीत की गवाही दे रहे हैं। जैसा कि 'विकास के आइने में खागा का अतीत' में रविकुमार तिवारी लिखते हैं— "खागा को अर्कवंशी क्षत्रियों ने ही अपने पसीने और रक्त से सींचकर बसाया है।"
जय श्री राम! जय क्षत्रिय समाज! जय राजपुताना!

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