भारतवर्ष के इतिहास में कुछ ऐसे शासक हुए हैं, जिनके नाम से ही शत्रु काँप उठते थे। सूर्यवंशी क्षत्रिय सम्राट महाराजा सल्हीय सिंह अर्कवंशी उन्हीं महान योद्धाओं में से एक थे। उनका शासनकाल, विशेष रूप से 13वीं और 14वीं शताब्दी के दौरान, विदेशी आक्रमणकारियों और मुगलों के लिए साक्षात 'काल' के समान था।
👑 सल्हीयपुर (संडीला) की स्थापना और स्वर्णिम शासन
महाराजा सल्हीय सिंह अर्कवंशी ने अवध (उत्तर प्रदेश) के प्राचीन कौशल (कोसल) राज्य के अंतर्गत एक महत्वपूर्ण नगर की स्थापना की थी—सल्हीयपुर, जिसे आज संडीला के नाम से जाना जाता है।
विस्तृत साम्राज्य: यह सल्हीयपुर (संडीला) उस समय के भू-भाग से कहीं अधिक क्षेत्रफल में फैला हुआ एक विशाल और संगठित राज्य था।
भूमि के स्वामी (Lords of the Land): सरकारी दस्तावेजों में भी अर्कवंशी शासकों को इस क्षेत्र का 'Lords of the Land' कहकर संबोधित किया गया है, जो इस बात का प्रमाण है कि संडीला क्षेत्र के वास्तविक स्वामी और निर्माता अर्कवंशी ही थे।
अर्कवंशीय विरासत: संडीला में वर्तमान में जितने भी प्राचीन खंडहर, कुंड और मंदिर मौजूद हैं, वे सब अर्कवंशी राजाओं द्वारा निर्मित करवाए गए थे, जो उनके कला और स्थापत्य प्रेम को दर्शाते हैं।
🛡️ भारत के नेतृत्व का पुनर्जागरण
जब महाराजा पृथ्वीराज चौहान को बंदी बनाकर मुहम्मद गोरी गजनी ले गया, तो भारत में एक नेतृत्व का शून्य बन गया था। इस खाली हुई बागडोर को एक लम्बे अंतराल के बाद, महाराजा सल्हीय सिंह अर्कवंशी ने संभाला।
उन्होंने अपनी कुशल युद्ध नीति और रण कौशल के बल पर पैर पसार चुके मुगलों और आक्रमणकारियों से सीधा लोहा लिया। उन्होंने अपने राज्य का विस्तार किया और दतली, मलीहाबाद (मल्हीयपुर), काकोरी, कल्यानमल, हरदोई से लेकर मुरादाबाद तक अपना प्रभाव स्थापित किया।
जिस समय भारतवर्ष पर मुगलों का अत्याचार बढ़ रहा था, उस विकट परिस्थिति में भी महाराजा ने अपनी प्रजा का कुशल पालन और रक्षा सुनिश्चित की।
🏰 अभेद्य सुरक्षा व्यवस्था और गढ़ियों का निर्माण
महाराजा सल्हीय सिंह की सबसे बड़ी विशेषता उनके राज्य की अभेद्य सुरक्षा व्यवस्था थी। शत्रु से रक्षा के लिए नगर की सुरक्षा इतनी कड़ी थी कि आक्रमणकारी सीमा तक पहुँचने से पहले ही दम तोड़ देते थे।
तुर्की आक्रमणकारियों को निरंतर परेशान करने वाली उनकी कुशल युद्ध नीति का प्रमाण आज भी उनके द्वारा निर्मित गढ़ियों (किलों) के टीलों के रूप में मौजूद है, जिनमें प्रमुख हैं:
गढ़ी जिंदौर
तरौना
नौगढ़
सल्हीयजना
सामदखेड़ा
मुसलेवा (परिवर्तित नाम)
सरसेंडी, दातली, बिजनौरगंज, मुरादाबाद, लौहगांजर
⚔️ तुर्की से भीषण संघर्ष: 160 वर्षों का प्रभुत्व
अर्कवंशियों का शौर्य इतना प्रचंड था कि वे लगभग 160 वर्षों तक संडीला और अन्य क्षेत्रों पर निर्विघ्न रूप से अधिपति बने रहे।
इल्तुतमिश के आक्रमण: सन् 1236 ई. में तुर्की शासक शम्सुद्दीन अल्तमश (इल्तुतमिश) ने कई बार आक्रमण किए, लेकिन महाराजा सल्हीय सिंह के रण कौशल के कारण वह हर बार असफल रहा।
मुहम्मद शाह तुगलक के शासन से त्रस्त लोग भागकर संडीला राज्य में शरण लेने लगे। नगर की खुशहाली और विस्तार की खबर जब दिल्ली के आक्रमणकारी तुगलक तक पहुँची, तो उसने स्वयं आक्रमण किया, लेकिन वह भी असफल रहा। उसने फतेहपुर पर भी आक्रमण किया, जहाँ अर्कवंशियों का शासन था, और वहाँ भी उसे हार का सामना करना पड़ा।
🔥 सन् 1374 ई. का महासंग्राम और जौहर
सन् 1374 ई. में मुहम्मद शाह तुगलक ने अपने पीर भाई सैय्यद मख़दूम अलाउद्दीन को सल्हीयपुर (संडीला) पर आक्रमण कर जीतने की आज्ञा दी।
शौर्य की पराकाष्ठा: इस भीषण युद्ध में महाराजा सल्हीय सिंह अर्कवंशी के वीर पुत्रों ने अपनी तलवार से सैय्यद मख़दूम अलाउद्दीन के तीनों बेटों को बड़ी ही वीरता से समाप्त कर दिया।
बढ़ती शत्रु सेना: महाराजा की सेना ने आक्रमणकारियों को बुरी तरह पराजित करना शुरू कर दिया, लेकिन आक्रमणकारी सेना की संख्या बढ़ती ही जा रही थी। छल-कपट की नीतियों के कारण महाराजा के कई सैनिक वीरगति को प्राप्त होने लगे।
क्षत्राणियों का बलिदान: जब युद्ध में हार स्पष्ट दिखने लगी, तो महल की क्षत्राणियों ने अपने सम्मान और धर्म की रक्षा के लिए जौहर (अग्नि में कूदकर बलिदान) कर लिया।
जब महल में कोई नहीं बचा, तब आक्रमणकारियों ने महलों, मंदिरों और गढ़ियों को नष्ट कर दिया। लेकिन वे महाराजा सल्हीय सिंह अर्कवंशी के शौर्य की अमर गाथा को कभी मिटा नहीं सके।
महाराजा सल्हीय सिंह अर्कवंशी का शासनकाल वीरता, कुशल रणनीति और धर्मपरायणता का प्रतीक है, जिसने भारत के एक बड़े भू-भाग को विदेशी आतताइयों से एक लम्बे समय तक सुरक्षित रखा।
🚩 जय मां भवानी!
🚩 जय क्षत्रिय धर्म!
🚩 जय जय श्री राम!
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