Friday, February 11, 2022

अरखा रियासत का इतिहास: अर्कवंशी क्षत्रियों के संघर्ष और स्वाभिमान की गाथा

उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले की ऊंचाहार तहसील में स्थित 'अरखा' (Arkha) आज भले ही एक ग्राम सभा हो, लेकिन इसका अतीत किसी साम्राज्य से कम नहीं है। लखनऊ से 114 किमी और रायबरेली से 40 किमी दूर स्थित यह क्षेत्र अपने नाम में ही अपना इतिहास समेटे हुए है।
इतिहासकारों और स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार, इस क्षेत्र का नामकरण यहाँ शासन करने वाले 'अर्कवंशी क्षत्रियों' के नाम पर हुआ। 'अर्क' शब्द का अपभ्रंश पहले 'अरक' और बाद में स्थानीय भाषा में 'अरखा' हो गया, जो आज तक प्रचलित है।
1. अर्कवंशी शासन और मुगलों से संघर्ष
ब्रिटिश काल से बहुत पहले, इस क्षेत्र पर अर्कवंशी राजाओं का एकछत्र राज था। यह वह दौर था जब दिल्ली पर मुगलिया सल्तनत काबिज थी। अर्कवंशी शासक स्वाभिमानी थे और उन्होंने कभी भी पूर्ण रूप से मुगलों की अधीनता स्वीकार नहीं की। जब तक अर्कवंशीयों का शासन रहा, मुगलों के साथ उनका युद्ध और संघर्ष अनवरत चलता रहा।
2. ब्रिटिश हुकूमत और ईस्ट इंडिया कंपनी का आगमन
जैसे-जैसे मुगल साम्राज्य कमजोर पड़ा, भारत में अंग्रेजों (ईस्ट इंडिया कंपनी) के पैर जमने लगे। लेकिन अरखा के अर्कवंशी राजाओं ने अपनी पकड़ कमजोर नहीं होने दी। उन्होंने अंग्रेजों की अनैतिक नीतियों को भांप लिया था और बिना किसी बाहरी मदद के अपने राज्य का संचालन करते हुए ब्रिटिश हुकूमत का विरोध जारी रखा।
3. लॉर्ड डलहौजी की 'हड़प नीति' और विद्रोह
अंग्रेज भारत को पूरी तरह चूस लेना चाहते थे। इसी उद्देश्य से गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी ने कुख्यात 'हड़प नीति' (Doctrine of Lapse) या 'गोद निषेध सिद्धांत' लागू किया।
इसके तहत, जिस राजा की अपनी संतान नहीं होती थी, उसे गोद लेने का अधिकार नहीं था और उसका राज्य अंग्रेज हड़प लेते थे।
यह नियम केवल उन पर लागू था जो अंग्रेजों के अधीन थे।
लेकिन अरखा के अर्कवंशी राजाओं ने इस काली नीति का खुला विरोध किया और अंग्रेजों के सामने झुकने से मना कर दिया।
4. भीषण युद्ध और रियासत का पतन
जब अर्कवंशी शासकों ने अधीनता स्वीकार नहीं की, तो ब्रिटिश सरकार ने युद्ध का बिगुल बजा दिया। रायबरेली की धरती गवाह बनी उस भीषण संग्राम की।
एक तरफ आधुनिक बंदूकों और तोपों से लैस ब्रिटिश सेना थी, और दूसरी तरफ अपनी मातृभूमि के लिए मर मिटने वाले अर्कवंशी वीरों की तलवारें। वीरता की मिसाल पेश करने के बावजूद, संसाधनों की कमी के कारण इस युद्ध में अर्कवंशीयों की पराजय हुई। अंग्रेजों ने झांसी और संभलपुर की तरह ही अरखा स्टेट को भी हड़प लिया।
5. जमींदारी प्रथा और ताल्लुकेदारों का उदय
अरखा रियासत को हड़पने के बाद अंग्रेजों ने यहाँ अपनी 'जमींदारी और ताल्लुकेदारी प्रथा' लागू की।
अंग्रेजों ने यहाँ से राजस्व (Tax) वसूलने के लिए बैस राजपूतों को ताल्लुकेदार के रूप में स्थापित किया।
हालांकि, बाद में बैस राजपूतों ने भी अंग्रेजों के खिलाफ बगावत की, जिसे क्रूरता से कुचल दिया गया।
आजादी के बाद जब भारत से जमींदारी प्रथा खत्म हुई, तब जाकर यहाँ के किसानों को अपनी भूमि का असली मालिकाना हक मिला।
निष्कर्ष:
अरखा का इतिहास गवाह है कि अर्कवंशी क्षत्रियों ने अपनी रियासत बचाने के लिए अंतिम सांस तक संघर्ष किया। यह धरती उनके बलिदान और स्वाभिमान की प्रतीक है।

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