Tuesday, February 1, 2022

500 वर्षों का तप: सूर्यवंशी अर्कवंशी क्षत्रियों की भीषण प्रतिज्ञा और विजय

अयोध्या में प्रभु श्रीराम की जन्मभूमि पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय और मंदिर निर्माण से पूरा विश्व हर्षित है। लेकिन, अयोध्या और उसके पड़ोसी जिलों—बस्ती, संतकबीरनगर, सिद्धार्थनगर—में बसे 'सूर्यवंशी अर्कवंशी क्षत्रिय समाज' के लिए यह खुशी एक त्यौहार से भी बढ़कर है। यह क्षण उनके लिए 500 वर्षों के एक कठिन तप के पूरा होने जैसा है।

1. क्या थी वह 'भीषण प्रतिज्ञा'?

जब देश में मुगलों का आतंक था, तब इस स्वाभिमानी समाज ने एक ऐसी कसम खाई थी, जिसे निभाना हर किसी के बस की बात नहीं थी। लगभग 500 वर्षों से इस समाज ने प्रण ले रखा था कि:

वे अपने सिर पर पगड़ी नहीं बांधेंगे (नंगे सिर रहेंगे या मौरी पहनेंगे)।

पैरों में चमड़े के जूते नहीं पहनेंगे (बल्कि खड़ाऊँ पहनेंगे)।

तेज धूप और बारिश में भी छतरी (छाता) का प्रयोग नहीं करेंगे।

यही कारण है कि लाखों की जनसंख्या वाले इस समाज ने सदियों से विवाह समारोहों में भी सिर पर पगड़ी नहीं बांधी, बल्कि 'मौरी' धारण की जिससे सिर खुला रहे। यह उनकी प्रतिज्ञा की निशानी थी।

2. ऐतिहासिक संघर्ष: मुगलों से लोहा

इस प्रतिज्ञा के पीछे वीरों के बलिदान से लिखा इतिहास है। जब क्रूर मुगल शासक बाबर के सिपहसालार मीर बाकी ने अपनी विशाल मुगलिया फौज के साथ अयोध्या पर हमला किया और राम मंदिर को तोड़ने बढ़ा, तब उसकी सूचना मिलते ही अर्कवंशी-सूर्यवंशी क्षत्रिय उठ खड़े हुए।

जिसके हाथ में जो हथियार आया—तलवार, भाला, कुल्हाड़ी, या लाठी—उसे लेकर वे रामलला के सम्मान की रक्षा के लिए निकल पड़े। एक तरफ मुगलों की विशाल और सुसज्जित सेना थी, और दूसरी तरफ रामभक्त क्षत्रिय। भीषण युद्ध हुआ और हजारों वीरों ने अपना बलिदान दिया।

3. मंदिर टूटने का दुःख और संकल्प

छल और बल से मुगलों ने मंदिर तो तोड़ दिया और वहां ढांचा खड़ा कर दिया, लेकिन वे अर्कवंशी क्षत्रियों का आत्मबल नहीं तोड़ पाए।

उस विध्वंस को देखकर समाज के पूर्वजों ने सौगंध खाई:


"जब तक हम अयोध्या में उस ढांचे को हटाकर पुनः प्रभु श्रीराम का मंदिर नहीं बनवा लेते, तब तक न सिर पर पगड़ी बांधेंगे, न जूते पहनेंगे और न ही छाता लगाएंगे।"

4. तपस्या की पूर्णाहुति

आज जब राम मंदिर का निर्माण हो रहा है, तो अर्कवंशी समाज की वह 500 साल पुरानी प्रतिज्ञा पूरी हो गई है। यह जीत केवल कानूनी नहीं, बल्कि उस त्याग और बलिदान की जीत है।

अब यह समाज 500 साल बाद फिर से उसी शान और शौर्य के साथ अपने सिर पर पगड़ी बांधेगा, जो उनके पूर्वजों ने त्यागी थी।

निष्कर्ष:

सूर्यवंशी अर्कवंशी क्षत्रियों का यह इतिहास बताता है कि "राम काज" के लिए क्षत्रिय अपना सब कुछ त्याग सकता है, लेकिन अपना वचन और धर्म नहीं छोड़ता।

।। जय श्री राम ।। जय सूर्यवंशी अर्कवंशी समाज ।।

साथियों आपको यह गौरव गाथा कैसी लगी हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं। 

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