Thursday, July 27, 2023

👑 मनुर्भरत वंश: स्वायंभुव मनु से आरंभ हुआ मानव इतिहास

मनुर्भरत वंश को तीन पौराणिक राजवंशों में सबसे प्राचीन माना जाता है, जिसकी शुरुआत प्रथम मनु: स्वायंभुव मनु से हुई। विश्व के विभिन्न ग्रंथों के अध्ययन से यह निष्कर्ष निकलता है कि सभी मनुष्यों की उत्पत्ति इन्हीं आदि पुरुष से हुई, जिन्हें संसार की भिन्न-भिन्न जातियों में आदीश्वर, आदम, नूह आदि नामों से भी जाना जाता है।
1. कालखंड और विस्तार
प्रथम मन्वन्तरि: मनु का जीवनकाल ही प्रथम मन्वन्तरि कहलाता है, और उनके वंशजों के शासनकाल को ही पुराणों में सतयुग माना गया है।
सतयुग की अवधि: पुरातत्व अनुसंधान के अनुसार, सतयुग का भोगकाल लगभग 1876 वर्षों का था, जो ईसा पूर्व 6564 वर्ष से ईसा पूर्व 4584 वर्ष के बीच माना जाता है।
सांस्कृतिक उपलब्धियाँ: 67 पीढ़ियों तक चले इस सतयुग (Heroic Age) में ईरान, मिस्र, बेबीलोनिया और अफ्रीका जैसे क्षेत्रों में 6 भरत विजेताओं द्वारा विशाल राज्य स्थापित किए गए। इस काल में राजा की पदवी की प्रतिष्ठा हुई, कृषि का उदय हुआ, राज्य व्यवस्था बनी, नगर और जनपद स्थापित हुए, तथा वेदों का उदय हुआ।

2. मनु वंश की दो महान शाखाएँ
स्वायंभुव मनु की पत्नी शतरूपा थीं, जिनसे दो पुत्र हुए और मनु वंश की दो विशाल शाखाएँ चलीं:
1. प्रियव्रत शाखा: इस शाखा में स्वायंभुव मनु को मिलाकर पाँच मनु और 35 प्रजापति हुए।
2. उत्तानपाद शाखा: इस शाखा में चाक्षुष मनु सहित 45 प्रजापति और राजा हुए।

जम्बूद्वीप और विश्व का विभाजन
मनु के वंशजों का मूल निवास अरब गणराज्य क्षेत्र के पास कैस्पियन सागर के आस-पास था। जनसंख्या बढ़ने पर उन्होंने पृथ्वी को पहले सात द्वीपों और बाद में नौ खंडों में विभाजित किया।
भारत का प्राचीन नाम जम्बू द्वीप था, जो बाद में नाभि के नाम पर नाभि वर्ष कहलाया और अंततः भरत खंड के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

🌍 प्रियव्रत शाखा: साम्राज्य का वैश्विक बँटवारा
प्रियव्रत ने अपने जीवनकाल में ही समस्त पृथ्वी को सात द्वीपों में बाँटकर अपने पुत्रों को अधिपति बना दिया।

1. साम्राज्य का संगठन
दस पुत्र: प्रियव्रत की दूसरी पत्नी हिमत से दस पुत्र हुए (अग्नीध, इमजिन्ह, यज्ञवाहु, महावीर, रुक्म, शुक्र, धृतपृष्ट, सवन, मेधातिथि और कवि)। इनमें से महावीर, सवन और कवि तपस्वी बन गए और उन्होंने राज्य में हिस्सा नहीं लिया।
पार्शिया और क्षत्रिय: प्रियव्रत ने वर्तमान फारस (पार्शियन) के चार खंडों को संगठित कर एक विशाल साम्राज्य बनाया। ये क्षेत्र बाद में शत्रिपी (या क्षत्रप) कहलाए, जिससे क्षत्रिय शब्द के उद्भव का अनुमान लगाया जाता है (शतरूपा के पुत्र 'क्षत्रप' से भी इसका संबंध माना जाता है)।

2. सात द्वीपों का आवंटन
प्रियव्रत ने सात पुत्रों को निम्नलिखित द्वीप दिए:
जम्बूद्वीप और शाकद्वीप मिलकर एक विशाल साम्राज्य बने, जिसका विस्तार कैस्पियन सागर से ईरान, इराक होते हुए भारतवर्ष के कन्याकुमारी तक था।

3. नौ खंड और राजा भरत
खंडों का विभाजन: अग्नीध ने अपने पुत्रों (नाभि, हरि, किंपुरुष, इलावृट आदि) के बीच साम्राज्य को नौ खंडों में विभाजित किया।
नाभि वर्ष: अग्नीध के बड़े पुत्र नाभि को मध्य भाग मिला, जिसे नाभि वर्ष कहा गया।
ऋषभदेव और जड़भरत: नाभि के पुत्र ऋषभदेव (जिन्हें जैनमत का आदि गुरु मानता है) हुए। ऋषभदेव के पुत्र जड़भरत अपनी महान प्रतिभा और ज्ञान के लिए प्रसिद्ध हुए।
मनुर्भरत नामकरण: जड़भरत की महानता के कारण ही स्वायंभुव मनु के वंशधरों को मनुर्भरत वंश कहा जाने लगा।
राजा पृथु: इस शाखा में पंद्रहवें प्रजापति पृथु हुए, जिन्होंने राजा की पदवी धारण की और भूमि का अंकीकरण (मापन) करके कृषि कार्य शुरू किया, इसलिए उनके नाम पर भूमि को पृथ्वी कहा गया। पृथु के समय से ही वेदों का उदयकाल (वेदोदयकाल) माना जाता है।
अंतिम मनु: प्रियव्रत शाखा में रेवत मनु (27वें प्रजापति) के नाम से रैवत मन्वंतर काल की गणना होती है, और इस शाखा में कुल 5 मनु और 35 प्रजापति हुए।

👑 उत्तानपाद शाखा: चक्रवर्ती सम्राटों का उदय
स्वायंभुव मनु के दूसरे पुत्र उत्तानपाद से यह शाखा चली, जिसमें चाक्षुष मनु समेत 45 प्रजापति हुए।

1. चाक्षुष मनु के प्रतापी पुत्र (6 विजेता)
उत्तानपाद की यह शाखा 67 पीढ़ियों तक चली और इसमें 36वीं पीढ़ी में चाक्षुष मनु हुए। चाक्षुष मनु के छह पुत्र (और अंगिरा) विश्व के महान विजेताओं में गिने जाते थे:
छह अमर उपास्य देव: ये पाँचों भाई और उर के पुत्र अंगिरा को ईरान के इतिहास में "छः अमर उपास्य देव" (Six Immortal Holy Ones) कहा गया है।
2. उर के वंशजों का यूरोपीय प्रभाव
उर के पुत्रों (इलावृट, वेविल, अंगिरा, अंग) ने विभिन्न राजवंशों की स्थापना की:
इलावृट: एलाम वंश (ईरान)।
वेविल: वेविल वंश (बेबीलोनिया)।
अंगिरा: अंगिरावंश (राजधानी अंकारा, टर्की)।
उर के वंशजों (उरपियन) की प्रथाएँ—जैसे महिलाओं का पर्दा न करना, नृत्य-गायन और स्वेच्छा से विवाह करना—आज भी यूरोप की सभ्यता में पाई जाती हैं, जिससे इन वंशों का यूरोपीय कनेक्शन प्रमाणित होता है।

3. अंतिम राजा: दक्ष और सतयुग का अंत
राजा की उपाधि: उर के पुत्र अंग की तीसरी पीढ़ी के बाद प्रजापति के स्थान पर राजा की उपाधि आरंभ हुई।
दक्ष का वंश: उत्तानपाद शाखा के अंतिम राजा दक्ष हुए। पुराणों के अनुसार, स्वायंभुव मनु से सतयुग का आरंभ और राजा दक्ष के बाद सतयुग का अंत माना जाता है, क्योंकि इसके बाद त्रेता युग शुरू हुआ।
दक्ष का पतन: दक्ष की पुत्री सती से विवाह करने वाले रुद्र शिव ने सती के बलिदान के बाद क्रोधित होकर दक्ष का यज्ञ विध्वंस कर दिया और इस प्रकार दक्ष वंश का भी अंत हो गया।

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