Monday, July 24, 2023

🌌 सृष्टि की उत्पत्ति: विज्ञान, पुराण और जीवन का आरंभ

सृष्टि की उत्पत्ति का विषय अत्यंत जटिल और अस्पष्ट है। जहाँ धर्मग्रंथ स्वायंभुव और ब्रह्मा जैसे आदि पुरुषों को स्वयं उत्पन्न (Swyambhu) मानकर सृष्टि की रचना का श्रेय देते हैं, वहीं आज का तर्कशील मन इस बात को स्वीकार नहीं करता कि कोई बिना माता-पिता के कैसे अस्तित्व में आ सकता है।
सृष्टि के आरंभ का कोई प्रत्यक्षदर्शी साक्षी उपलब्ध नहीं है, इसलिए हम केवल भौतिक शास्त्र, भू-गर्भ शास्त्र और पुराणों के विचारों के टुकड़ों को जोड़कर ही एक समग्र अनुमान लगा सकते हैं।
1. पृथ्वी का जन्म: सूर्य से सागर तक
वैज्ञानिकों और भू-गर्भ शास्त्रियों के अनुमान प्रस्तरों (चट्टानों) की प्राचीनतम परतों और रेडियोसक्रिय पदार्थों के विघटन पर आधारित हैं, जिनके अनुसार पृथ्वी की आयु लगभग दो अरब वर्ष से अधिक आंकी गई है।
उत्पत्ति: पृथ्वी अपने जनक सूर्य से टूटकर अलग हुई, और शून्य में एक अत्यंत गर्म गैस का गोला बनकर अपनी सुनिश्चित कक्षा में घूमने लगी। इस गति का नियंत्रण किसी विराटतम, शाश्वत अदृश्य शक्ति द्वारा किया जा रहा था।
ठंडा होना: लाखों वर्षों के समय में, पृथ्वी धीरे-धीरे ठंडी हुई। गैसों ने तरल रूप लिया और अंततः यह ठोस अवस्था में आई।
चंद्रमा का निर्माण: वैज्ञानिकों का अनुमान है कि पृथ्वी के ठंडा होकर सिकुड़ने पर उसमें दरारें पड़ीं, और एक दरार युक्त बड़ा भाग टूटकर अलग हो गया। यह भाग पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के कारण उसके चारों ओर घूमने लगा, और चंद्रमा कहलाया। चंद्रमा के अलग होने से जो रिक्त स्थान बना, वह समुद्र का गर्त बन गया।
महावृष्टि: लाखों वर्षों में, वायुमंडल की ऑक्सीजन और हाइड्रोजन गैसों ने मिलकर बादल बनाए। जब प्राणिविहीन पृथ्वी का वातावरण ठीक हुआ, तो महावृष्टि (भारी वर्षा) हुई, जो शताब्दियों तक चलती रही। इससे पृथ्वी के गढ़े भरकर महासागरों का रूप ले लिया।
2. जीवन का रहस्यमय आरंभ
पृथ्वी पर जीवन का आरंभ महासागरों के भीतर हुआ, जो लाखों वर्षों की जटिल रासायनिक प्रक्रियाओं का परिणाम था।
प्ररस (Protoplasm): सागर के गर्म, क्षारीय गुणों में, मंद प्रकाश और ताप के दबाव में, प्रांगार द्विजारेय (Carbon-Dioxide), गंधक, फास्फोरस आदि तत्वों से मिलकर एक रहस्यमय वस्तु की उत्पत्ति हुई, जिसे प्ररस (Protoplasm) कहा गया।
जीवन-कण (Molecules) और प्रजनन: इन तत्वों से जीवन-कण व्यूहाणु (Life-Molecules) पनपे, जिनमें कालान्तर में प्रजनन की सामर्थ्य उत्पन्न हुई, और जीवन का अबाध स्रोत शुरू हो गया।
वनस्पतियों का जन्म: कुछ जीवकोषों ने पर्णसाद (Chlorophyll) नामक पदार्थ विकसित किया, जिससे वे जलवायु से कार्बन-डाइ-ऑक्साइड ग्रहण कर सकें। इस प्रकार, प्रथम सेलों से काई और वनस्पतियों की अन्य प्रजातियों का निर्माण हुआ।
जलचरों का विकास: अन्य जीवकोषों ने तत्वों को ग्रहण कर अपना रूपांतर किया, जिससे खाने-पीने, श्वास लेने और प्रजनन के अंगों वाले विविध प्रकार के प्राणियों का जन्म हुआ। लाखों वर्षों में, ये प्राणी जल में मछलियों (श्लेप्यक) के रूप में विकसित हुए।
3. मत्स्य अवतार की ऐतिहासिक व्याख्या
वैज्ञानिक मत: भौतिक शास्त्री बताते हैं कि सबसे पहले मछलियों की उत्पत्ति हुई थी।
पौराणिक रूपांतरण: प्राचीन अनुभवी विद्वानों ने इस तथ्य को धर्मग्रंथों में मत्स्य अवतार का रूप दिया था। बाद के भाष्यकारों ने इसमें यह कल्पित कथा जोड़ दी कि जब दैत्यों ने वेदों को समुद्र में फेंक दिया, तो भगवान ने मत्स्य अवतार लेकर वेदों का उद्धार किया। यह इसलिए विचारणीय है क्योंकि दैत्यों के समय तक वेद लिपिबद्ध नहीं हुए थे।
4. महाद्वीप, पर्वत और स्थलचरों का उदय
पर्वत और ज्वालामुखी: पृथ्वी के बाहरी आवरण के कड़ा होने के बाद, आंतरिक भाग सिकुड़ने लगे। इससे ऊपर की सतह नीचे धँसने लगी, और भीषण दबाव से ज्वालामुखी विस्फोट हुए। पिघली चट्टानें लावा के रूप में बाहर आईं और ठंडी होकर पर्वत मालाओं का रूप ले लिया।
रूपांतरण और विकास: समुद्री तूफानों ने जब जलचरों को स्थल पर ला पटका, तो उनमें से अनेक प्राणियों ने उस नए वातावरण में रहने के लिए करोड़ों वर्षों में असाधारण शारीरिक रूपांतरण किया।
पहले स्थलचर पैदा हुए।
फिर जल-स्थल दोनों जगह रहने वाले प्राणी बने।
कुछ ने पंख विकसित कर उड़ना शुरू किया।
कुछ रेंगने वाले प्राणी भी बने।
5. मानव का विकास और सभ्यता का आरंभ
मानव का विकास: करोड़ों वर्षों की इस रूपांतरण प्रक्रिया में, मानव का आदि शरीर भी विकसित हुआ। मानव शरीर लगभग तीस करोड़ वर्षों में रूपांतरित होता हुआ आज की अवस्था तक पहुँचा है।
सभ्यता की यात्रा: लगभग दस लाख वर्ष पहले मानव पशु अवस्था से निकलकर जंगली, असभ्य और फिर अर्ध-सभ्य जीवन जीने लगा। वह अपनी सुरक्षा के लिए गुफाओं में रहता था, और धीरे-धीरे झोपड़ी बनाना सीखा।
मनु का प्राकट्य: लाखों वर्षों में मानव ने पाषाण युग और धातु युग को पार करते हुए अपने मध्य में स्वायंभुव मनु अथवा आदम को उत्पन्न किया। उस समय तक मानव इतना सभ्य हो चुका था कि वह काल गणना कर सकता था और अपने पूर्वजों को याद रख सकता था।
इतिहास का आरंभ: स्वायंभुव मनु या आदम के काल से ही इतिहास का सिलसिला चल पड़ा, जिसका समय आज से लगभग आठ हजार वर्ष पहले माना जाता है। यहीं से संसार के सभी मानव धर्मों ने अपना धार्मिक और ऐतिहासिक संबंध जोड़ना शुरू कर दिया।

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