1. स्वायंभुव मनु की उत्पत्ति पर विमर्श
अधिकांश हिंदू धर्मग्रंथों में यह वर्णन है कि स्वायंभुव मनु स्वयं ही उत्पन्न हुए थे (इसलिए स्वायंभुव कहलाए)। बिना पुरुष और स्त्री के संयोग के किसी का उत्पन्न होना आज के वैज्ञानिक और तार्किक विचारकों के लिए असंभव है।
ऐतिहासिक निष्कर्ष: हमें यह स्वीकार करना होगा कि स्वायंभुव मनु के भी माता-पिता रहे होंगे, और उनका जन्म भी सामान्य प्रक्रिया से ही हुआ होगा।
अंधकार में छिपा इतिहास: स्वायंभुव से पहले का वंशानुगत इतिहास अतीत के अंधकार में छिपा है। ऐसा प्रतीत होता है कि उनके पूर्वज जंगली, अर्ध-सभ्य या आदिम अवस्था में थे, जिसके कारण उनका कोई व्यवस्थित इतिहास दर्ज नहीं हो पाया। स्वायंभुव मनु के समय से ही मानव सभ्य और सुशिक्षित होना शुरू हुआ, इसलिए उनके बाद का काल ऐतिहासिक काल कहलाया और उनसे पहले का काल प्रागैतिहासिक काल।
भौगोलिक प्रभाव: आज की आदिम जातियों के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि किसी स्थान की भौगोलिक स्थिति और परिस्थितियाँ ही मानव के जीवन को सभ्य या असभ्य बनाने में गहरा प्रभाव डालती हैं।
2. मानव जातियों का वैज्ञानिक वर्गीकरण
मानव विज्ञान विशारदों ने विश्व के मनुष्यों को उनकी शारीरिक विशेषताओं के आधार पर वर्गीकृत करने का प्रयास किया है। सुप्रसिद्ध पश्चिमी विद्वान श्री सी. जी. सेलिग्मान का वर्गीकरण काफी हद तक यथार्थ के निकट माना जाता है, जिसके अनुसार संसार के मनुष्य छह मूल जातियों में बँटे हुए हैं:
नार्डिक
अल्पाइन
मेडिटेरेनियन
मंगोल
काकेशियन
ऑस्ट्रेलियन
काकेशियन समूह में मुख्य रूप से श्वेत वर्ण की जातियां आती हैं। नाडिक, अल्पाइन और मेडिटेरेनियन जातियाँ इसी समूह में आती हैं।
नार्डिक: उत्तरी यूरोप (स्कैन्डेनेवियन, जर्मन, रूसी)।
अल्पाइन: इसमें यूरोपीय अल्पाइन (स्विस, स्लाव) और एशियाई आर्मेनाइट शाखाएँ (ईरानी-वाजिक, पामीर, आर्मेनिया, लेवान्ट, मेसोपोटामिया) सम्मिलित हैं।
निष्कर्ष:
स्वायंभुव मनु के वंशजों (मनुर्भरत वंश) का निवास स्थान कैस्पियन सागर के आस-पास होने से यह स्पष्ट होता है कि वे इसी नार्डिक जाति की ईरानी शाखा के वंशज थे।
मेडिटेरेनियन: भूमध्य सागर के निवासी, सेमाइट अरब, उत्तरी अफ्रीका के लोग।
🟡 मंगोल (पीली) जातियाँ
यह जाति पूर्वी एशिया महाद्वीप में प्रशांत महासागर तक फैली है, जो अपनी पर्यटनशीलता के कारण सबसे अधिक विस्तार पाई।
पहचान: इनका रंग हल्का पीला या भूरापन लिए हुए होता है, आँखें भूरी और छोटी, बाल मोटे और सीधे होते हैं।
शाखाएँ: दक्षिणी मंगोल (तिब्बत, चीन), उत्तरी मंगोल (साइबेरिया, जापान), और समुद्री मंगोल (इंडोनेशिया, फिलीपीन द्वीप समूह)।
विस्तार: मंगोलों ने बेयरिंग जलडमरूमध्य पार करके प्रशांत महासागर के रास्ते उत्तरी अमेरिका में भी बस्तियाँ बनाईं।
⚫ अश्वेत (काली) जातियाँ
अश्वेत जाति दो बड़ी शाखाओं में विभाजित है: अफ्रीकन (अश्वेत) और समुद्री (मेलानेशियन)।
निवास: सहारा मरुभूमि का दक्षिणी प्रदेश इनकी आवास भूमि है।
पिगमी (बौने): छोटे कद वाली (लगभग 4 फीट) आदिम जातियाँ, जैसे अफ्रीका के अक्का और बतवा, तथा अंडमान द्वीपवासी अश्वेतों, इसी श्रेणी में आते हैं।
मूल वंश समुद्री अश्वेतों में मूल वंश वाले पापुआन (न्यू गिनी) माने जाते हैं।
3. आदिम जातियों का भौगोलिक फैलाव
मानव उत्पत्ति का मूल स्थान अब भी विवादित है, लेकिन विश्व के ग्रंथों और ऐतिहासिक साक्ष्यों के मिलान से यह संकेत मिलता है कि कैस्पियन सागर, कृष्ण सागर, अराल सागर के आस-पास का क्षेत्र और भारत का उत्तरी भाग आदि कालीन मानवों की जन्मभूमि रही है।
आज भी विश्व के कोने-कोने में हजारों आदिम जातियाँ फैली हुई हैं
मानव पीढ़ियाँ लाखों वर्षों से निरंतर चलती रही हैं। यह भ्रम है कि स्वायंभुव मनु स्वयं प्रकट हुए। वास्तव में, देश-काल और परिस्थितियों के अनुसार सभ्य या असभ्य होते हुए इन्हीं आदिम जातियों की कड़ी से स्वायंभुव मनु और ब्रह्मा जैसे सभ्य पुरुष निकले, जिनका इतिहास आज विश्व पटल पर अंकित है।
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