Sunday, December 8, 2024

क्षत्रिय धर्म की मिसाल: महाराजा मल्हीय सिंह अर्कवंशी की अमर गाथा


इतिहास के पन्नों में अर्कवंशी क्षत्रियों की तलवार की चमक जितनी तेज है, उतना ही उज्ज्वल उनका चरित्र भी है। यह घटना उस भीषण युद्ध की है जहाँ दो भाई—महाराजा सल्हीय सिंह अर्कवंशी और उनके अनुज महाराजा मल्हीय सिंह अर्कवंशी—रणभूमि में साक्षात काल बनकर शत्रुओं पर टूट पड़े थे।

1. रणभूमि और चक्रव्यूह
युद्ध अपने चरम पर था। दोनों भाई शत्रु सेना को बड़ी ही वीरता से ध्वस्त कर रहे थे। युद्ध के वेग में बड़े भाई महाराजा सल्हीय सिंह अर्कवंशी शत्रुओं का संहार करते हुए काफी आगे निकल गए।
इधर, रणभूमि के दूसरे छोर पर महाराजा मल्हीय सिंह अकेले पड़ गए। मौका पाकर शत्रु सेना ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया। लेकिन वह शेर की भांति डटे रहे। दोनों हाथों में तलवारें लेकर वे बिजली की गति से शत्रुओं का नाश करते हुए आगे बढ़ रहे थे।

2. कायरतापूर्ण आघात (पीठ पीछे वार)
जब शत्रु उन्हें सामने से नहीं रोक पाए, तो उन्होंने कायरता का सहारा लिया। घोड़े पर सवार एक शत्रु ने पीछे से महाराजा मल्हीय सिंह की पीठ पर वार कर दिया।
जिससे वो गंभीर रूप से घायल हो गए और एक बाजू में गहरा घाव लगा। पीड़ा असहनीय थी, लेकिन उस वीर क्षत्रिय के मुख से 'आह' तक नहीं निकली। पलटकर उन्होंने ऐसा भीषण प्रहार किया कि वह कायर शत्रु घोड़े समेत जमीन पर आ गिरा और उसका शस्त्र दूर जा गिरा।

3. अभयदान: क्षत्रिय धर्म का पालन
अब वह शत्रु निहत्था था और महाराजा मल्हीय सिंह की तलवार के नीचे था। वे चाहते तो एक पल में उसका सिर धड़ से अलग कर सकते थे।
किंतु, तभी उन्होंने वह किया जो इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो गया।
महाराजा अपने अश्व से नीचे उतरे। अपनी एक तलवार उस कायर शत्रु की ओर बढ़ाई और गरजते हुए बोले—
"उठा शस्त्र! मैं निहत्थों, कायरों और स्त्रियों पर वार नहीं करता। यह हमारे कुल की मर्यादा नहीं है। पहले तू शस्त्र उठा, फिर हम युद्ध करेंगे।"

4. शत्रु का नतमस्तक होना
मृत्यु को सामने देखकर भी जीवनदान देने वाले इस महामानव के चरणों में वह शत्रु गिर पड़ा। उसकी आँखों में पश्चाताप के आँसू थे।
उसने कहा— "महाराज! मैंने छल से आप पर पीछे से वार किया, फिर भी आपने मुझे जीवनदान दिया? मैं आपकी महानता के आगे हार गया हूँ। अब मैं शस्त्र नहीं उठाऊँगा। जब तक जीवित हूँ, आपका दास बनकर रहूँगा।"

5. भ्रातृ-प्रेम और गौरव
तभी वहां बड़े भाई महाराजा सल्हीय सिंह अर्कवंशी भी आ पहुँचे। उन्होंने दूर से ही अपने छोटे भाई की इस उदारता और क्षत्रिय धर्म को देखा। उनका सीना गर्व से चौड़ा हो गया। उन्होंने दौड़कर अपने घायल लेकिन वीर अनुज को गले से लगा लिया।
यह घटना सिद्ध करती है कि अर्कवंशी क्षत्रिय केवल युद्ध जीतना नहीं, बल्कि दिल जीतना और धर्म निभाना भी जानते थे।

।। जय महाराजा सल्हीय सिंह ।। जय महाराजा मल्हीय सिंह ।।

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