Friday, April 20, 2018

सूर्यवंशी (अर्कवंशी) क्षत्रिय: कुलदेवता, वंशावली और महान शासकों का गौरवशाली इतिहास

सूर्यवंशी (अर्कवंशी) क्षत्रियों का इतिहास त्याग, बलिदान और शौर्य की एक ऐसी गाथा है जो सदियों से भारतवर्ष को आलोकित कर रही है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, इस वंश के पूर्वज और वंशज साक्षात भगवान सूर्य नारायण (अर्क देवता) के उपासक रहे हैं और उन्हें ही अपना कुलदेवता मानते हैं। 'अर्क' का अर्थ है सूर्य, और इसी तेज को धारण करने वाले क्षत्रिय 'अर्कवंशी' कहलाए।


1. सत्य और वचन के पक्के: रघुकुल की रीत
इस महान वंश की नींव सत्य और धर्म पर टिकी है।
प्रभु श्री राम: इसी सूर्यवंश (अर्कवंश) में मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री राम ने जन्म लिया, जिन्होंने अपने पिता के वचन को निभाने के लिए राजपाट त्याग दिया और 14 वर्षों का वनवास स्वीकार किया।
महाराजा हरिश्चंद्र: इसी वंश में सत्यवादी महाराजा हरिश्चंद्र हुए, जिन्होंने सत्य के मार्ग पर चलते हुए अपना संपूर्ण राज्य, धन और परिवार तक दान कर दिया, लेकिन धर्म नहीं छोड़ा।
2. साम्राज्य विस्तार और प्रतापी शासक
इतिहास के हर कालखंड में अर्कवंशी राजाओं ने अपनी प्रजा की रक्षा के लिए प्राणों की बाजी लगाई।
महाराजा तिलोकचंद अर्कवंशी: इन्होंने इंद्रप्रस्थ (वर्तमान दिल्ली) पर शासन किया और सत्य मार्ग पर चलते हुए साम्राज्य का विस्तार किया।
अन्य महान शासक: इस वंश की कीर्ति बढ़ाने वाले राजाओं की सूची लंबी है। महाराजा विक्रमचंद, महाराजा मानकचंद, महाराजा रामचंद, महाराजा हरि चंद, महाराजा कल्याण चंद, महाराजा भीमचंद, महाराजा लोकचंद और महाराजा गोविन्द चंद अर्कवंशी जैसे वीरों ने अपने शौर्य से इस वंश को सुशोभित किया।
महारानी भीमा देवी अर्कवंशी: क्षत्रिय वीरांगनाओं में महारानी भीमा देवी का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित है, जिन्होंने कठिन संघर्षों के बीच साम्राज्य की बागडोर संभाली और समाज को नई दिशा दी।
3. संडीला और मलिहाबाद के संस्थापक: दो भाई, दो रियासतें
अर्कवंशी इतिहास का मध्यकाल दो महाप्रतापी भाइयों की वीरता का साक्षी है— महाराजा सल्हीय सिंह अर्कवंशी (बड़े भाई) और महाराजा मल्हीय सिंह अर्कवंशी (छोटे भाई)।
संडीला (हरदोई): बड़े भाई महाराजा सल्हीय सिंह ने संडीला में अपना साम्राज्य स्थापित किया। आज भी पुराने डाक बंगले के पास स्थापित उनकी प्रतिमा उनकी वीरगाथा सुना रही है।
मलिहाबाद (लखनऊ): छोटे भाई महाराजा मल्हीय सिंह ने मलिहाबाद को अपनी राजधानी बनाया और वहां अर्कवंशी ध्वज फहराया।
निष्कर्ष:
सूर्यवंशी (अर्कवंशी) क्षत्रिय सदैव अपनी प्रजा की रक्षा के लिए तत्पर रहे। चाहे वनवास हो, बलिदान हो या युद्ध का मैदान—यह वंश हमेशा सत्य के मार्ग पर अडिग रहा। हमें गर्व है अपने इन पूर्वजों पर।
।। जय सूर्यदेव ।। जय अर्कवंश ।।

👑 अर्ककुल शिरोमणि श्री राम: सूर्यवंश से अर्कवंश तक की गौरव गाथा

जय अर्कवंश! जय सियापति राम चन्द्र की जय!

सूर्यवंश (सूर्यवंशम, अर्कवंशम या सौर वंश) आर्यावर्त का वह प्राचीन, पौराणिक वंश है जिसकी नींव अयोध्या में स्थापित हुई और जिसने धर्म, दान, और शौर्य की परंपरा को आगे बढ़ाया।

1. बुद्ध अवतार और 'अर्कवंश' का उदय
द्वापर युग की समाप्ति के बाद जब भगवान श्री हरि विष्णु ने बुद्ध अवतार लिया, तो उनका उद्देश्य मनुष्य समाज में बढ़ती हिंसा को समाप्त करना था। लोग वैदिक यज्ञों के नाम पर पशु बलि को अपना रहे थे, जिससे अनावश्यक रूप से हिंसा की भावना बढ़ रही थी।
धर्म परिवर्तन का आधार: भगवान बुद्ध ने स्वयं सूर्यवंश के शाक्य कुल में जन्म लिया था। उनकी शिक्षाओं ने एक नए युग (कलियुग) में अहिंसापूर्वक शांति से रहने का उदाहरण प्रस्तुत किया।

'अर्क' नाम का कारण: बुद्ध के महत्वपूर्ण संदेश को आगे बढ़ाने और यज्ञों में से पशु बलि को समाप्त करने के लिए, अयोध्या के सूर्यवंशी राजाओं ने 'देव भाषा' संस्कृत के सूर्य रूप अर्थात् "अर्क" रूप को धारण किया।
अर्कवंश की पहचान: अवध और अयोध्या के समस्त सूर्यवंश को एक नए युग (कलियुग) में अर्कवंश के नाम से संबोधित किया जाने लगा।

2. भगवान बुद्ध और 'अर्कबन्धु'
भगवान बुद्ध के अन्य नामों में शाक्य सिंह, गौतमीपुत्र, शाक्यमुनि के साथ एक नाम 'अर्कबन्धु' भी है।
अर्कबन्धु का अर्थ: 'अर्कबन्धु' का अर्थ होता है सूर्य के कुल से संबंध रखने वाला।
सूर्यवंशी राजाओं ने बुद्ध द्वारा दिए गए संस्कारों का पालन अपने अर्कवंशी नाम के रूप में किया, जिसका अर्थ था — यज्ञों में हिंसा का त्याग।
दशाश्वमेध यज्ञों की परंपरा: अर्कवंशी राजाओं ने अवध के विशाल क्षेत्र पर शासन करने के उपलक्ष्य में अनेक दशाश्वमेध यज्ञ किए। इन सभी यज्ञों में किसी भी प्रकार की पशु बलि नहीं दी गई थी, और इसी अहिंसक प्रक्रिया का पालन संपूर्ण अर्कवंश में होने लगा।

3. अर्कवंश के दानवीर और संस्थापक
अर्कवंश में दानधर्म की परंपरा भी अत्यंत प्रबल रही है।
महारानी महादानी भीमादेवी
इसी कुल में सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र ने जन्म लिया, जिन्होंने अपना संपूर्ण राजपाट दान कर दिया था।
इसी परंपरा का पालन करते हुए, महाराजा गोविन्द चन्द्र अर्कवंशी की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी महारानी भीमादेवी ने अपना सारा साम्राज्य अपने आध्यात्मिक गुरु हरगोविन्द को दान में दे दिया, और इस प्रकार दान धर्म की परम्परा का निर्वहन किया।

महाराजा खड़ग सेन अर्कवंशी
इन्होंने फतेहपुर के खागा नगर की स्थापना की थी।
महाराजा खड़ग सेन, महाराजा दलपतसेन के पुत्र और महाराजा कनकसेन की रक्त पीढ़ी से थे, जो स्वयं भगवान श्री राम के ज्येष्ठ पुत्र कुश की रक्त पीढ़ी से संबंध रखते थे।
उन्होंने भी अपने कुल की परम्परा अनुसार दशाश्वमेध यज्ञ किया था।
संडीला और मलिहाबाद के संस्थापक
सण्डीला निर्माता: महाराजा साल्हिय सिंह अर्कवंशी
मलिहाबाद निर्माता: महाराजा मल्हिय सिंह अर्कवंशी
4. इंद्रप्रस्थ (दिल्ली) पर अर्कवंशी शासन

महाराजा तिलोकचंद अर्कवंशी ने राजा विक्रमपाल को पराजित करके इंद्रप्रस्थ (दिल्ली) पर शासन स्थापित किया। उनके बाद उनकी 9 पीढ़ियों ने इंद्रप्रस्थ पर शासन किया।
5. अर्कवंश की प्रशाखा: 'भारशिव'
अर्कवंश की एक प्रशाखा "भारशिव" है।
भारशिव की उत्पत्ति: वैदिक काल में जिन अर्कवंशी राजाओं ने भगवान शिव को प्रसन्न करके यह उपाधि पाई थी, वे ही भारशिव कहलाए। उन्होंने अपने कंधों पर विशाल शिवलिंग धारण कर तपस्या की, जिससे प्रसन्न होकर उन्हें यह उपाधि प्राप्त हुई।
भारशिव और नागवंश: भारशिव योद्धा वैदिक काल तक अर्कवंश से संबंध रखते थे, परंतु समय के साथ वे नागवंश से संबंध रखने लगे, क्योंकि नागवंश स्वयं सूर्यवंश की उपशाखा है। इन दोनों कुलों में वैवाहिक संबंध भी थे (जैसे भगवान श्री राम के ज्येष्ठ पुत्र कुश का विवाह नागवंश की राजकुमारी से हुआ था)।
राष्ट्र रक्षक महाराजा सुहलध्वज: इसी भारशिव (नागवंश) में राष्ट्र रक्षक महाराजा सुहलध्वज भारशिव ने जन्म लिया। उन्होंने 1034 ईस्वी में बहराइच के युद्ध में 1,50,000 से अधिक विदेशी आक्रमणकारियों  को पराजित कर संपूर्ण देश की रक्षा की। इस युद्ध के बाद अगले 300 वर्षों तक किसी विदेशी आक्रमणकारी ने भारत पर आक्रमण करने का साहस नहीं किया।
6. वंश का कालक्रमानुसार परिचय
सूर्यवंश अपनी मूल पहचान को विभिन्न युगों में धारण करता रहा:
सतयुग: इक्ष्वाकुवंश
त्रेतायुग: रघुवंश
द्वापर युग: सूर्यवंश (मूलनाम)
कलियुग: अर्कवंश (और भविष्य में भी जाना जाएगा)
अर्क शिरोमणि जय श्री राम। जय अर्कवंश!


सूर्यवंशी (अर्कवंशी) क्षत्रिय: उत्पत्ति, इतिहास और गौरवशाली परंपरा

भारतीय इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में अर्कवंशी क्षत्रियों का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। यह प्राचीन जाति 'सूर्यवंशी क्षत्रिय' परंपरा का ही एक अभिन्न और प्रमुख अंग है। जैसे सूर्य के बिना दिन की कल्पना नहीं की जा सकती, वैसे ही अर्कवंशी इतिहास के बिना सूर्यवंश का इतिहास अधूरा है।

1. उत्पत्ति और नामकरण: 'सूर्य' से 'अर्क' तक
महर्षि कश्यप के पुत्र भगवान सूर्य हुए। सूर्य के सात पुत्रों में से एक 'वैवस्वत मनु' थे, जिन्हें 'अर्क-तनय' (सूर्य पुत्र) कहा गया। इन्हीं वैवस्वत मनु ने 'सूर्यवंश' की स्थापना की।
प्राचीन ग्रंथों और रामायण में भगवान श्रीराम को 'अर्ककुल शिरोमणि' और 'रविकुल गौरव' कहा गया है।
जिन सूर्यवंशी क्षत्रियों ने सूर्य के पर्यायवाची शब्द 'अर्क' को अपनी पहचान बनाया और अपने कुलदेवता सूर्य को 'अर्क' रूप में पूजा, वे कालांतर में 'अर्कवंशी' कहलाए।
समय के साथ बोलचाल की भाषा में 'अर्क' शब्द बदलकर 'अरक' और फिर 'अरख' हो गया, लेकिन मूल पहचान सूर्यवंशी ही रही।
2. पौराणिक और प्राचीन इतिहास
अर्कवंश का इतिहास स्वयं भगवान राम से जुड़ा है। वनवास जाने से पूर्व प्रभु श्रीराम ने अपने कुलदेवता का आह्वान इसी मंत्र से किया था:
'ॐ भूर्भुवः स्वः कलिंगदेशोद्भव काश्यप गोत्र रक्त वर्ण भो अर्क, इहागच्छ इह तिष्ठ अर्काय नमः'
इसके अलावा, अर्कबंधु गौतम बुद्ध, महाराजा तक्षक, सम्राट प्रद्योत, सम्राट बालार्क और सम्राट नन्दिवर्धन जैसे महापुरुष इसी महान वंश की शोभा बढ़ाते हैं।
3. मध्यकालीन गौरव और राज्य विस्तार
मध्यकाल में अर्कवंशी शासकों ने भारत के बड़े भू-भाग पर धर्म और न्याय का शासन स्थापित किया:
महाराजा कनकसेन: जिनसे चित्तौड़ के सूर्यवंशी राजवंश की नींव पड़ी।
महाराजा भट्ट-अर्क: जिन्होंने गुजरात में सूर्य उपासना को बढ़ाया।
महाराजाधिराज तिलोकचंद अर्कवंशी: जिन्होंने 918 ई. में दिल्ली पर विजय प्राप्त की।
महाराजा खड़गसेन: खागा (फतेहपुर) नगर के संस्थापक।
महाराजा सल्हीय सिंह और मल्हीय सिंह: जिन्होंने क्रमशः संडीला (हरदोई) और मलिहाबाद (लखनऊ) बसाया।
अर्कवंशी क्षत्रियों का प्रभाव संडीला, मलिहाबाद, खागा, अयाह, रायबरेली (अरखा), बहराइच और प्रयागराज तक फैला था। उनकी शक्ति का प्रमाण यह था कि उन्होंने आर्यावर्त में दशाश्वमेघ यज्ञ करवाकर अपनी संप्रभुता सिद्ध की थी।
4. भारशिव क्षत्रिय और अर्कवंशी भेद
अर्कवंशी क्षत्रियों की कई प्रमुख शाखाएं हैं, जैसे—खंगार, गौड़, बाछल, परिहार, सिसौदिया, बैस-तिलोकचंदी, शाक्यवंशी, नागवंशी आदि।
इनमें एक प्रमुख शाखा 'भारशिव क्षत्रिय' हुई।
ये भगवान शिव के परम उपासक थे और शिवलिंग को गले में धारण करते थे।
शिव का 'भार' (वजन) उठाने के कारण ये 'भारशिव' कहलाए।
जब कुषाणों ने काशी पर आक्रमण किया, तो भारशिव वीरों ने ही काशी को मुक्त कराया और गंगा तट पर अश्वमेघ यज्ञ किया। वाकटक राजवंश से इनके गहरे वैवाहिक सम्बन्ध थे।
5. सूर्य उपासना: हमारी संस्कृति
अर्कवंशी समाज में सूर्य उपासना का विशेष महत्व है। 'सूर्य नमस्कार' के 12 मंत्र इस समाज की आध्यात्मिक चेतना के प्रतीक हैं:
ॐ रवये नमः
ॐ सूर्याय नमः
ॐ भानवे नमः
ॐ खगय नमः
ॐ पुष्णे नमः
ॐ हिरण्यगर्भाय नमः
ॐ मारिचाये नमः
ॐ आदित्याय नमः
ॐ सावित्रे नमः
ॐ अर्काय नमः (कुलदेवता मंत्र)
ॐ भास्कराय नमः
ॐ मित्राय नमः
निष्कर्ष:
चाहे 'अर्क' कहें या 'सूर्य', यह वंश भारत की सनातन रक्षा पद्धति का मेरुदंड (Backbone) रहा है। अर्कवंशी क्षत्रियों का इतिहास त्याग, तपस्या और तलवार तीनों का संगम है।
।। जय श्री राम ।। जय अर्कवंश ।।

भगवान शिव की उपासना और षडाक्षरी मंत्र महिमा: संपूर्ण पूजन विधि


संपूर्ण जगत में भगवान शिव के समान कोई नहीं है। उनकी उपासना से बढ़कर कोई उपासना नहीं और उनके मंत्रों से बढ़कर कोई मंत्र नहीं। मनुष्य जीवन की सार्थकता तभी है जब वह शिव की भक्ति में समर्पित हो जाए। भगवान शिव 'भोलेनाथ' हैं, वे भाव के भूखे हैं। जिस व्यक्ति ने शिव को प्रसन्न कर लिया, उसके लिए संसार में कुछ भी अप्राप्य नहीं रहता।
शिव षडाक्षरी मंत्र की महिमा (ॐ नमः शिवाय)
भगवान शिव का 'षडाक्षरी मंत्र' (ॐ नमः शिवाय) सर्वश्रेष्ठ और सर्वशक्तिशाली है।
इस मंत्र के जप से आध्यात्मिक विकास होता है और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है।
शिव साधक के आगे संसार के सभी भोग और ऐश्वर्य नतमस्तक रहते हैं।
शिव योगी सदैव निरोगी रहता है और पूर्ण आयु भोगकर शिवलोक को प्राप्त होता है।
विशेषकर प्रदोष तिथि पर शाम और रात के समय शिव पूजन और इस मंत्र का जाप परम फलदायी माना गया है।
श्री शिव षडाक्षर स्तोत्रम्
(धूप और दीप जलाकर इस अद्भुत स्तोत्र का पाठ करें)
ॐ कार बिन्दुसंयुक्तं नित्यं ध्यायंति योगिन:।
कामदं मोक्षदं चैव ऊँकाराय नमो नम:।।
नमंति ऋषयो देवा नमन्त्यप्सरसां गणा:।
नरा नमंति देवेशं नकाराय नमो नम:।।
महादेव महात्मानं महाध्यानं परायणम्।
महापापहरं देव मकाराय नमो नम:।।
शिवं शातं जगन्ननाथं लोकानुग्रहकारकम्।
शिवमेकपदं नित्यं शिकाराय नमो नम:।।
वाहनं वृषभो यस्य वासुकि: कंठभूषणम्।
वामे शक्तिधरं वेदं वकाराय नमो नम:।।
यत्र तत्र स्थितो देव: सर्वव्यापी महेश्वर:।
यो गुरु : सर्वदेवानां यकाराय नमो नम:।।
षडक्षरमिदं स्तोत्रं य: पठेच्छिवसंनिधौ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते।।
सरल और प्रामाणिक शिव पूजन विधि
भगवान शिव अत्यंत दयालु हैं। वे श्रद्धा मात्र से प्रसन्न हो जाते हैं। गृहस्थ जीवन में 'पारद शिवलिंग', 'स्फटिक' या 'सफेद आक' की प्रतिमा का पूजन सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
1. संकल्प:
हाथ में जल, फूल और चावल लें। वर्ष, वार, तिथि, स्थान और अपना नाम बोलकर अपनी मनोकामना कहें और जल जमीन पर छोड़ दें।
2. गणेश पूजन:
सर्वप्रथम श्री गणेश जी को स्नान कराएं, वस्त्र, गंध और पुष्प अर्पित करें।
3. शिव पूजन (क्रमवार):
आवाहन: 'ऊँ साम्ब शिवाय नमः आव्हानयामि स्थापयामि' (चावल चढ़ाएं)।
आसन: 'ऊँ साम्ब शिवाय नमः आसनार्थे पुष्पाणि समर्पयामि' (फूल चढ़ाएं)।
पाद्यं (पैर धुलाना): 'ऊँ साम्ब शिवाय नमः पादयो: पाद्यं समर्पयामि'।
अर्घ (हाथ धुलाना): 'ऊँ साम्ब शिवाय नमः हस्तयोः अर्घं समर्पयामि'।
आचमन (मुख शुद्धि): 'ऊँ साम्ब शिवाय नमः आचमनीयम् जलं समर्पयामि'।
स्नान: पहले 'ऊँ साम्ब शिवाय नमः पंचामृत स्नानं समर्पयामि' (पंचामृत से) फिर 'शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि' (शुद्ध जल से)।
वस्त्र व गंध: 'ऊँ साम्ब शिवाय नमः वस्त्रोपवस्त्रम् समर्पयामि' (वस्त्र) और 'गन्धं समर्पयामि' (चंदन)।
बिल्वपत्र व पुष्प: 'ऊँ साम्ब शिवाय नमः बिल्वपत्रं समर्पयामि' (बेलपत्र) और 'पुष्पं समर्पयामि' (आक/धतूरा)।
अक्षत: 'ऊँ साम्ब शिवाय नमः अक्षताम् समर्पयामि' (साबुत चावल)।
धूप-दीप: 'ऊँ साम्ब शिवाय नमः धूपम् आघर्पयामि' और 'दीपम् दर्शयामि'।
नैवेद्य (भोग): 'ऊँ साम्ब शिवाय नमः नेवैद्यम् निवेदयामि' (मिठाई/फल/पंचमेवा)।
ताम्बूल (पान): 'ऊँ साम्ब शिवाय नमः तांबूल समर्पयामि'।
आरती व परिक्रमा: धूप-दीप से आरती करें और 'ऊँ साम्ब शिवाय नमः प्रदक्षिणा समर्पयामि' बोलकर आधी परिक्रमा करें।
क्षमा प्रार्थना: अंत में पूजा में हुई किसी भी भूल के लिए महादेव से क्षमा मांगें।
प्रेम से बोलो... ॐ नमः शिवाय!

🔆 सूर्यवंश (अर्कवंश): मर्यादा पुरुषोत्तम राम से लेकर महाराजा कनकसेन तक


🚩 जय सूर्यवंश (अर्कवंश)! जय श्री राम! 🚩
भारतीय इतिहास के दो मुख्य क्षत्रिय वंशों—सूर्यवंश और चंद्रवंश—में, सूर्यवंश का गौरव अद्वितीय है। इसी वंश को अर्कवंश भी कहा जाता है, जो भगवान राम से लेकर महाराजा कनकसेन और अन्य प्रतापी राजाओं की वीरगाथाओं को समेटे हुए है।
1. सूर्यवंश की वंशावली: अयोध्या से रघुवंश तक
सूर्यवंश का उद्गम अयोध्या से हुआ, जो प्राचीन भारतवर्ष की राजधानी थी।
कुक्षि से राम तक: कुक्षि के कुल में आगे चलकर भरत, फिर सगर, भागीरथ, रघु, अम्बरीष, ययाति, नाभाग, दशरथ, और भगवान राम जैसे महान शासक हुए।
निमि और मिथिला: इक्ष्वाकु के दूसरे पुत्र निमि मिथिला के राजा थे, और इसी वंश में आगे चलकर राजा जनक हुए। निमि को जैन धर्म के 21वें तीर्थंकर भी माना जाता है।
गंगा का अवतरण: राजा दिलीप के पुत्र भगीरथ हुए, जिन्होंने अपनी तपस्या से गंगा को पृथ्वी पर उतारा था।
रघुकुल का नामकरण: भगीरथ के पुत्र ककुत्स्थ और ककुत्स्थ के पुत्र रघु हुए। रघु के अत्यंत तेजस्वी और पराक्रमी नरेश होने के कारण, उनके बाद यह वंश रघुवंश कहलाया।
रघुवंश से शाखाएँ
भगवान राम के पुत्र लव से राघव राजपूतों का जन्म हुआ, जिनमें बर्गुजर, जयास, और सिकरवार शामिल हैं। इसी से सिसोदिया राजपूत वंश (बैसला और गुहिल/गैहलोत वंश) की शाखा भी चली।
राम के दूसरे पुत्र कुश से कुशवाह (कछवाह) राजपूतों का वंश चला।
2. अर्कवंश: सूर्य का पर्यायवाची गौरव
'सूर्यवंश' को ही 'अर्कवंश' क्यों कहा गया?
अर्क: 'सूर्य' का एक पर्यायवाची शब्द 'अर्क' है। जिन सूर्यवंशी क्षत्रियों ने अपने कुल-देवता सूर्य को उनके 'अर्क' स्वरूप में पूजते हुए अपनी पहचान स्थापित की, वे ही कालांतर में 'अर्कवंशी क्षत्रिय' कहलाए।
पर्यायवाची: 'अर्कवंश' का इतिहास 'सूर्यवंश' के इतिहास का अभिन्न हिस्सा है, जिसे इससे अलग नहीं किया जा सकता।
नामों का अपभ्रंश: समय के साथ, 'अर्कवंशी' शब्द 'अर्क', 'अरक', और स्थानीय बोलचाल की भाषा में 'अरख' हो गया। इसी प्रकार, 'मित्रवंशी' शब्द भी बिगड़कर 'मैत्रक' हो गया।
रामचंद्र जी ने वनवास जाने से पहले अपने कुल-देवता 'सूर्य' ('अर्क') का आवाहन इस मंत्र से किया था:
'ॐ भूर्भुवः स्वः कलिंगदेशोद्भव काश्यप गोत्र रक्त वर्ण भो अर्क, इहागच्छ इह तिष्ठ अर्काय नमः'
3. अर्कवंश के प्रमुख महापुरुष एवं ऐतिहासिक योगदान
अर्कवंश (सूर्यवंश) का इतिहास अत्यंत गौरवशाली रहा है, जिसमें शस्त्र और शास्त्र दोनों के ज्ञाता हुए।
अर्कवंश के प्रमुख महापुरुष और ऐतिहासिक योगदान
अर्कवंश (सूर्यवंश) का इतिहास महान शासकों और उनके अमूल्य योगदानों से भरा है। इस वंश में ऐसे नायक हुए जिन्होंने शस्त्र और शास्त्र दोनों ही क्षेत्रों में अपनी छाप छोड़ी।
प्राचीन काल के महापुरुष
प्राचीन काल में इस वंश के कुछ सबसे प्रभावशाली व्यक्ति हुए:
भगवान रामचंद्रजी: वह 'अर्कवंश शिरोमणि' और रघुकुल के नायक थे।
अर्कबंधू गौतम बुद्ध: उन्होंने अहिंसा और बौद्ध धर्म का प्रवर्तन किया।
सम्राट प्रद्योत, बालार्क, और नन्दिवर्धन: ये सभी प्राचीन भारत में शासन और शक्ति का प्रदर्शन करने वाले प्रतापी सम्राट थे।
मध्यकाल के महान शासक
मध्यकाल में, अर्कवंश ने भारतीय उपमहाद्वीप के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी सत्ता स्थापित की:
महाराजा कनकसेन: इन्हीं से चित्तौड़ के प्रसिद्ध सूर्यवंशी राजवंश (गुहिल वंश) की उत्पत्ति हुई।
महाराजा भट्ट-अर्क: वह एक सूर्योपासक थे जिन्होंने गुजरात में सूर्य-उपासना को बढ़ावा दिया।
सम्राट हर्षवर्धन: वह भी एक महान सूर्योपासक सम्राट थे, जिन्होंने विशाल साम्राज्य पर शासन किया।
महाराजाधिराज तिलोकचंद अर्कवंशी: उन्होंने सन 918 ईसवीं में राजा विक्रमपाल को हराकर दिल्ली पर अपना राज्य स्थापित किया था।
महाराजा खड़गसेन: उन्होंने मध्यकाल में अवध के दोआबा क्षेत्र पर राज किया और खागा नगर की स्थापना की।
महाराजा सल्हीय सिंह अर्कवंशी: उन्होंने उत्तर-प्रदेश के हरदोई जिले में संडीला नगर की स्थापना की।
महाराजा मल्हीय सिंह अर्कवंशी: उन्होंने मलिहाबाद नगर की स्थापना की।
ये सभी शासक अर्कवंश के गौरव का प्रतीक हैं, जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्रों में नेतृत्व और शौर्य की मिसाल कायम की।
साम्राज्य का प्रभुत्व
प्राचीन काल से मध्यकाल तक, अर्कवंशी क्षत्रियों ने अवध के एक विशाल हिस्से पर अपना प्रभुत्व बनाए रखा, जिनमें संडीला, मलीहाबाद, खागा, अयाह (फतेहपुर), पडरी (उन्नाव), साढ़-सलेमपुर (कानपुर), अरखा (रायबरेली), और बहराइच जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र शामिल थे।
कहा जाता है कि अर्कवंशी क्षत्रिय इतने शक्तिशाली थे कि उन्होंने आर्यावर्त में दशाश्वमेघ यज्ञ करवाकर अपनी शक्ति प्रदर्शित की थी, और किसी भी समकालीन राजवंश ने उन्हें चुनौती देने का साहस नहीं किया।
फतेहपुर (अयाह) में अर्कवंशी क्षत्रियों द्वारा निर्मित एक प्राचीन दुर्ग का खंडहर आज भी उनके गौरवशाली अतीत की कहानी कह रहा है।
जय सूर्यवंश (अर्कवंश)! जय श्री राम!

चित्तौड़ का स्वाभिमान: चिराड़ क्षत्रियों का गौरवशाली इतिहास और संघर्ष की गाथा

चिराड़ क्षत्रियों का बहुत ही गौरवमय इतिहास रहा है क्या आप जानते हैं कि चिराड़ क्षत्रिय कौन हैं? क्या आपको पता है कि यह समाज इतिह...