Friday, April 20, 2018

👑 अर्ककुल शिरोमणि श्री राम: सूर्यवंश से अर्कवंश तक की गौरव गाथा

जय अर्कवंश! जय सियापति राम चन्द्र की जय!

सूर्यवंश (सूर्यवंशम, अर्कवंशम या सौर वंश) आर्यावर्त का वह प्राचीन, पौराणिक वंश है जिसकी नींव अयोध्या में स्थापित हुई और जिसने धर्म, दान, और शौर्य की परंपरा को आगे बढ़ाया।

1. बुद्ध अवतार और 'अर्कवंश' का उदय
द्वापर युग की समाप्ति के बाद जब भगवान श्री हरि विष्णु ने बुद्ध अवतार लिया, तो उनका उद्देश्य मनुष्य समाज में बढ़ती हिंसा को समाप्त करना था। लोग वैदिक यज्ञों के नाम पर पशु बलि को अपना रहे थे, जिससे अनावश्यक रूप से हिंसा की भावना बढ़ रही थी।
धर्म परिवर्तन का आधार: भगवान बुद्ध ने स्वयं सूर्यवंश के शाक्य कुल में जन्म लिया था। उनकी शिक्षाओं ने एक नए युग (कलियुग) में अहिंसापूर्वक शांति से रहने का उदाहरण प्रस्तुत किया।

'अर्क' नाम का कारण: बुद्ध के महत्वपूर्ण संदेश को आगे बढ़ाने और यज्ञों में से पशु बलि को समाप्त करने के लिए, अयोध्या के सूर्यवंशी राजाओं ने 'देव भाषा' संस्कृत के सूर्य रूप अर्थात् "अर्क" रूप को धारण किया।
अर्कवंश की पहचान: अवध और अयोध्या के समस्त सूर्यवंश को एक नए युग (कलियुग) में अर्कवंश के नाम से संबोधित किया जाने लगा।

2. भगवान बुद्ध और 'अर्कबन्धु'
भगवान बुद्ध के अन्य नामों में शाक्य सिंह, गौतमीपुत्र, शाक्यमुनि के साथ एक नाम 'अर्कबन्धु' भी है।
अर्कबन्धु का अर्थ: 'अर्कबन्धु' का अर्थ होता है सूर्य के कुल से संबंध रखने वाला।
सूर्यवंशी राजाओं ने बुद्ध द्वारा दिए गए संस्कारों का पालन अपने अर्कवंशी नाम के रूप में किया, जिसका अर्थ था — यज्ञों में हिंसा का त्याग।
दशाश्वमेध यज्ञों की परंपरा: अर्कवंशी राजाओं ने अवध के विशाल क्षेत्र पर शासन करने के उपलक्ष्य में अनेक दशाश्वमेध यज्ञ किए। इन सभी यज्ञों में किसी भी प्रकार की पशु बलि नहीं दी गई थी, और इसी अहिंसक प्रक्रिया का पालन संपूर्ण अर्कवंश में होने लगा।

3. अर्कवंश के दानवीर और संस्थापक
अर्कवंश में दानधर्म की परंपरा भी अत्यंत प्रबल रही है।
महारानी महादानी भीमादेवी
इसी कुल में सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र ने जन्म लिया, जिन्होंने अपना संपूर्ण राजपाट दान कर दिया था।
इसी परंपरा का पालन करते हुए, महाराजा गोविन्द चन्द्र अर्कवंशी की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी महारानी भीमादेवी ने अपना सारा साम्राज्य अपने आध्यात्मिक गुरु हरगोविन्द को दान में दे दिया, और इस प्रकार दान धर्म की परम्परा का निर्वहन किया।

महाराजा खड़ग सेन अर्कवंशी
इन्होंने फतेहपुर के खागा नगर की स्थापना की थी।
महाराजा खड़ग सेन, महाराजा दलपतसेन के पुत्र और महाराजा कनकसेन की रक्त पीढ़ी से थे, जो स्वयं भगवान श्री राम के ज्येष्ठ पुत्र कुश की रक्त पीढ़ी से संबंध रखते थे।
उन्होंने भी अपने कुल की परम्परा अनुसार दशाश्वमेध यज्ञ किया था।
संडीला और मलिहाबाद के संस्थापक
सण्डीला निर्माता: महाराजा साल्हिय सिंह अर्कवंशी
मलिहाबाद निर्माता: महाराजा मल्हिय सिंह अर्कवंशी
4. इंद्रप्रस्थ (दिल्ली) पर अर्कवंशी शासन

महाराजा तिलोकचंद अर्कवंशी ने राजा विक्रमपाल को पराजित करके इंद्रप्रस्थ (दिल्ली) पर शासन स्थापित किया। उनके बाद उनकी 9 पीढ़ियों ने इंद्रप्रस्थ पर शासन किया।
5. अर्कवंश की प्रशाखा: 'भारशिव'
अर्कवंश की एक प्रशाखा "भारशिव" है।
भारशिव की उत्पत्ति: वैदिक काल में जिन अर्कवंशी राजाओं ने भगवान शिव को प्रसन्न करके यह उपाधि पाई थी, वे ही भारशिव कहलाए। उन्होंने अपने कंधों पर विशाल शिवलिंग धारण कर तपस्या की, जिससे प्रसन्न होकर उन्हें यह उपाधि प्राप्त हुई।
भारशिव और नागवंश: भारशिव योद्धा वैदिक काल तक अर्कवंश से संबंध रखते थे, परंतु समय के साथ वे नागवंश से संबंध रखने लगे, क्योंकि नागवंश स्वयं सूर्यवंश की उपशाखा है। इन दोनों कुलों में वैवाहिक संबंध भी थे (जैसे भगवान श्री राम के ज्येष्ठ पुत्र कुश का विवाह नागवंश की राजकुमारी से हुआ था)।
राष्ट्र रक्षक महाराजा सुहलध्वज: इसी भारशिव (नागवंश) में राष्ट्र रक्षक महाराजा सुहलध्वज भारशिव ने जन्म लिया। उन्होंने 1034 ईस्वी में बहराइच के युद्ध में 1,50,000 से अधिक विदेशी आक्रमणकारियों  को पराजित कर संपूर्ण देश की रक्षा की। इस युद्ध के बाद अगले 300 वर्षों तक किसी विदेशी आक्रमणकारी ने भारत पर आक्रमण करने का साहस नहीं किया।
6. वंश का कालक्रमानुसार परिचय
सूर्यवंश अपनी मूल पहचान को विभिन्न युगों में धारण करता रहा:
सतयुग: इक्ष्वाकुवंश
त्रेतायुग: रघुवंश
द्वापर युग: सूर्यवंश (मूलनाम)
कलियुग: अर्कवंश (और भविष्य में भी जाना जाएगा)
अर्क शिरोमणि जय श्री राम। जय अर्कवंश!


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