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Friday, April 20, 2018

सूर्यवंशी (अर्कवंशी) क्षत्रिय: उत्पत्ति, इतिहास और गौरवशाली परंपरा

भारतीय इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में अर्कवंशी क्षत्रियों का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। यह प्राचीन जाति 'सूर्यवंशी क्षत्रिय' परंपरा का ही एक अभिन्न और प्रमुख अंग है। जैसे सूर्य के बिना दिन की कल्पना नहीं की जा सकती, वैसे ही अर्कवंशी इतिहास के बिना सूर्यवंश का इतिहास अधूरा है।

1. उत्पत्ति और नामकरण: 'सूर्य' से 'अर्क' तक
महर्षि कश्यप के पुत्र भगवान सूर्य हुए। सूर्य के सात पुत्रों में से एक 'वैवस्वत मनु' थे, जिन्हें 'अर्क-तनय' (सूर्य पुत्र) कहा गया। इन्हीं वैवस्वत मनु ने 'सूर्यवंश' की स्थापना की।
प्राचीन ग्रंथों और रामायण में भगवान श्रीराम को 'अर्ककुल शिरोमणि' और 'रविकुल गौरव' कहा गया है।
जिन सूर्यवंशी क्षत्रियों ने सूर्य के पर्यायवाची शब्द 'अर्क' को अपनी पहचान बनाया और अपने कुलदेवता सूर्य को 'अर्क' रूप में पूजा, वे कालांतर में 'अर्कवंशी' कहलाए।
समय के साथ बोलचाल की भाषा में 'अर्क' शब्द बदलकर 'अरक' और फिर 'अरख' हो गया, लेकिन मूल पहचान सूर्यवंशी ही रही।
2. पौराणिक और प्राचीन इतिहास
अर्कवंश का इतिहास स्वयं भगवान राम से जुड़ा है। वनवास जाने से पूर्व प्रभु श्रीराम ने अपने कुलदेवता का आह्वान इसी मंत्र से किया था:
'ॐ भूर्भुवः स्वः कलिंगदेशोद्भव काश्यप गोत्र रक्त वर्ण भो अर्क, इहागच्छ इह तिष्ठ अर्काय नमः'
इसके अलावा, अर्कबंधु गौतम बुद्ध, महाराजा तक्षक, सम्राट प्रद्योत, सम्राट बालार्क और सम्राट नन्दिवर्धन जैसे महापुरुष इसी महान वंश की शोभा बढ़ाते हैं।
3. मध्यकालीन गौरव और राज्य विस्तार
मध्यकाल में अर्कवंशी शासकों ने भारत के बड़े भू-भाग पर धर्म और न्याय का शासन स्थापित किया:
महाराजा कनकसेन: जिनसे चित्तौड़ के सूर्यवंशी राजवंश की नींव पड़ी।
महाराजा भट्ट-अर्क: जिन्होंने गुजरात में सूर्य उपासना को बढ़ाया।
महाराजाधिराज तिलोकचंद अर्कवंशी: जिन्होंने 918 ई. में दिल्ली पर विजय प्राप्त की।
महाराजा खड़गसेन: खागा (फतेहपुर) नगर के संस्थापक।
महाराजा सल्हीय सिंह और मल्हीय सिंह: जिन्होंने क्रमशः संडीला (हरदोई) और मलिहाबाद (लखनऊ) बसाया।
अर्कवंशी क्षत्रियों का प्रभाव संडीला, मलिहाबाद, खागा, अयाह, रायबरेली (अरखा), बहराइच और प्रयागराज तक फैला था। उनकी शक्ति का प्रमाण यह था कि उन्होंने आर्यावर्त में दशाश्वमेघ यज्ञ करवाकर अपनी संप्रभुता सिद्ध की थी।
4. भारशिव क्षत्रिय और अर्कवंशी भेद
अर्कवंशी क्षत्रियों की कई प्रमुख शाखाएं हैं, जैसे—खंगार, गौड़, बाछल, परिहार, सिसौदिया, बैस-तिलोकचंदी, शाक्यवंशी, नागवंशी आदि।
इनमें एक प्रमुख शाखा 'भारशिव क्षत्रिय' हुई।
ये भगवान शिव के परम उपासक थे और शिवलिंग को गले में धारण करते थे।
शिव का 'भार' (वजन) उठाने के कारण ये 'भारशिव' कहलाए।
जब कुषाणों ने काशी पर आक्रमण किया, तो भारशिव वीरों ने ही काशी को मुक्त कराया और गंगा तट पर अश्वमेघ यज्ञ किया। वाकटक राजवंश से इनके गहरे वैवाहिक सम्बन्ध थे।
5. सूर्य उपासना: हमारी संस्कृति
अर्कवंशी समाज में सूर्य उपासना का विशेष महत्व है। 'सूर्य नमस्कार' के 12 मंत्र इस समाज की आध्यात्मिक चेतना के प्रतीक हैं:
ॐ रवये नमः
ॐ सूर्याय नमः
ॐ भानवे नमः
ॐ खगय नमः
ॐ पुष्णे नमः
ॐ हिरण्यगर्भाय नमः
ॐ मारिचाये नमः
ॐ आदित्याय नमः
ॐ सावित्रे नमः
ॐ अर्काय नमः (कुलदेवता मंत्र)
ॐ भास्कराय नमः
ॐ मित्राय नमः
निष्कर्ष:
चाहे 'अर्क' कहें या 'सूर्य', यह वंश भारत की सनातन रक्षा पद्धति का मेरुदंड (Backbone) रहा है। अर्कवंशी क्षत्रियों का इतिहास त्याग, तपस्या और तलवार तीनों का संगम है।
।। जय श्री राम ।। जय अर्कवंश ।।

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