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Sunday, February 23, 2025

इतिहास मनुर्भरत वंश की उत्तनपाद शाखा पर्शिया का एवं यूरोप का इतिहास History of Uttanapad branch of Manurbharat dynasty, and Persia, Europe

मनुर्भरत वंश और उत्तानपाद शाखा: एक गौरवशाली ऐतिहासिक यात्रा

भारतीय इतिहास की जड़ें अत्यंत गहरी और विस्तृत हैं। इसी कड़ी में मनुर्भरत वंश की उत्तानपाद शाखा का विशेष महत्व है। यह न केवल एक वंशावली है, बल्कि उस कालखंड का दस्तावेज है जब भारतीय क्षत्रियों का साम्राज्य सुदूर पश्चिम और यूरोप तक फैला हुआ था। आज हम इसी महान वंश और सम्राट अत्यराति जानन्तपति जैसे महायोद्धाओं के इतिहास पर प्रकाश डालेंगे।

1. उत्तानपाद वंश का विस्तार और सतयुग का भोग काल

​स्वायंभुव मनु के दूसरे पुत्र उत्तानपाद से इस वंश की दूसरी प्रमुख शाखा का आरम्भ हुआ। हरिवंश पुराण के अनुसार, इस वंश में चाक्षुष मनु सहित 45 प्रजापति और अनेक प्रतापी राजा हुए। इतिहासकारों और पौराणिक गणनाओं के अनुसार, इस वंश की लगभग 67 पीढ़ियों का समय 1876 वर्षों का माना गया है। इसे ही 'सतयुग' या 'हीरोइक एज' (Heroic Age) कहा जाता है।

​इस काल में 'अत्यराति जानन्तपति' नामक एक महान चक्रवर्ती सम्राट हुए, जिनका उल्लेख ऐतरेय ब्राह्मण (8/4/1) में मिलता है। इनका साम्राज्य पश्चिम में आर्द्रपुर, आर्द्र सागर और युवन सागर (यूनान/Greece) तक विस्तृत था।

2. ध्रुव और उत्तम के वंशज

​महाराज उत्तानपाद के दो पुत्र थे—ध्रुव और उत्तम।

  • उत्तम के वंशज: ऐसा माना जाता है कि उत्तम के वंशज ही आगे चलकर 'उत्तम जाई पठान' कहलाए। आज भी अफगानिस्तान में जो हिन्दू पठान हैं, वे इसी रक्तसंबध से जुड़े माने जाते हैं।
  • ध्रुव के वंशज: ध्रुव के पुत्र का नाम श्लिष्ट (भव्य) था। श्लिष्ट के पाँच पुत्र हुए—ऋभु, रिपुंजय, वीर, वृकल और वृक।

​ऋभु, जो स्वायंभुव मनु की पाँचवीं पीढ़ी में थे, उनके बाद लगभग 30 पीढ़ियों का इतिहास स्पष्ट नहीं मिलता। सम्भवतः उस दौरान कोई विशेष प्रभावशाली राजा नहीं हुआ।

3. चाक्षुष मनु और उनके छह प्रतापी पुत्र

​स्वायंभुव मनु से 36वीं पीढ़ी में 'चाक्षुष मनु' का जन्म हुआ। इन्हीं के नाम पर 'चाक्षुष मन्वन्तर' की काल गणना की जाती है (सन्दर्भ: ऋग्वेद 10/60, विष्णु पुराण)। चाक्षुष मनु के छह पुत्र हुए जिन्होंने अपनी कीर्ति पताका पूरे विश्व में फहराई। इनके नाम थे—अत्यराति, अभिमन्यु, उर, पुर, तपोरत और सुद्युम्न।

4. सम्राट अत्यराति और वैकुण्ठ धाम का रहस्य

​चाक्षुष मनु के सबसे बड़े पुत्र 'अत्यराति' थे। ये एक चक्रवर्ती सम्राट थे और इन्हें 'जानन्तपति' की उपाधि प्राप्त थी। पर्शिया (फारस) के इतिहास के अनुसार, इनका राज्य यूनान तक फैला था। पर्शिया का पूर्वी भाग, जिसे आज 'सत्यगिदी' कहते हैं, प्राचीन काल में 'सत्य लोक' था।

​हैरानी की बात यह है कि सुमेरू पर्वत के पास स्थित 'वैकुण्ठ धाम' ही सम्राट अत्यराति की राजधानी थी। आज यह स्थान देमावन्द एलबुर्ज (ईरान) में 'इरानियन पैराडाइज' के नाम से जाना जाता है। अत्यराति के वंशजों से ही 'अरात्र' या 'अराट' जाति बनी, जो कालांतर में इस्लाम धर्म में परिवर्तित हो गई। आर्मेनिया देश और ईरान का अराट पर्वत इन्हीं के नाम पर है।

5. अभिमन्यु और ट्रॉय (Troy) का युद्ध

​चाक्षुष मनु के दूसरे पुत्र अभिमन्यु थे। उन्होंने 'अर्जनम' नामक स्थान पर एक विशाल दुर्ग बनवाया, जिसे 'अभिमन्यु दुर्ग' कहा गया। उनकी राजधानी 'सुपा' नगर थी।

  • सुपा नगर: यह विश्व के प्राचीनतम शहरों में से एक है (वर्तमान में पर्शिया की खाड़ी के पास)। पुरातात्विक खुदाई में यहाँ 8000 वर्ष पुरानी वस्तुएं मिली हैं।
  • ट्रॉय का युद्ध: ग्रीक इतिहास और 'ओडिसी' (Odyssey) महाकाव्य में जिस 'मेमनन' (Memnon) नामक योद्धा का वर्णन है, वह असल में भारतीय सम्राट अभिमन्यु ही थे। उन्होंने अपनी सेना के साथ ट्रॉय के युद्ध में भाग लिया था। ओडिसी में उनकी वीरता का बखान करते हुए उन्हें एक श्रेष्ठ कुल का नायक बताया गया है।

​अभिमन्यु के पुत्र 'मन्यु' और 'केशी' थे। मन्यु के वंशज ग्रीक (यूनान) में बसे, जबकि केशी के वंशज 'केशीवर' कहलाए और पर्शिया में बस गए।

6. उर देश और यूरोप का सम्बन्ध

​तीसरे पुत्र 'उर' का साम्राज्य अपने भाइयों से भी अधिक विशाल था। उनके राज्य को 'उर लोक' या 'उरजन' (वर्तमान में ओरमुज्द/चाल्डिया) कहा जाता था।

  • यूरोप का नामकरण: उर के वंशजों को 'उरपियन' कहा जाता था। इतिहासकार मानते हैं कि यही लोग जब पश्चिम की ओर गए तो 'उरपियन' शब्द बिगड़कर 'यूरोपियन' बन गया और उस महाद्वीप का नाम 'यूरोप' पड़ा।
  • उर्वशी और सामाजिक प्रथाएं: उर देश की स्त्रियों को 'उर्वशी' कहा जाता था। महाभारत में कर्ण और शल्य के संवाद से पता चलता है कि उर देश (मद्र देश के आसपास या पश्चिम में) की स्त्रियाँ अत्यंत स्वतंत्र विचारों की थीं। वे सामाजिक बंधनों और पर्दा प्रथा को नहीं मानती थीं। कर्ण ने शल्य को फटकारते हुए वहाँ की जिस खुली सभ्यता का वर्णन किया था, वह आज की पश्चिमी (यूरोपीय) सभ्यता से मेल खाती है।

​उर के चार पुत्र थे—इलावृत, वेविल, अंगिरा और अंग। इनका विस्तृत वर्णन हम अगले भाग में करेंगे।

निष्कर्ष:

यह इतिहास सिद्ध करता है कि भारतीय क्षत्रियों का प्रभाव केवल भारतवर्ष तक सीमित नहीं था, बल्कि ईरान, यूनान और यूरोप की सभ्यताओं की नींव में भी हमारे पूर्वजों का रक्त है।

(शेष भाग अगले लेख में...)

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